32- शिव की अपरा स्तुति

ऋषि बोले-

हे दिगम्बर! हे नित्य! हे कृतान्त ! हे शूल पाणि! हे विकट! हे कराल! हे भयंकर मुख वाले ! हे प्रभो! आपको नमस्कार है।

आपका कोई रूप नहीं फिर भी आप सुन्दर रूप वाले हो। हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। हे रुद्र! आप ही स्वाहाकार हो, आपको नमस्कार है। सभी देहधारियों के आप रक्षक हो और स्वयं ही प्राणियों की आत्मा हो। हे नीलकण्ठ! हे नील शिखिण्ड! हे अंगों में भस्म लगाने वाले! हे नीललोहित! आपको नमस्कार है। हे सर्व प्राणियों के आत्मा रूप! आपको सांख्य शास्त्र पुरुष कहकर उच्चारण करता है। पर्वतों में आप मेरु पर्वत हो, नक्षत्रों में आप चन्द्रमा हो, ऋषियों में वशिष्ठ तथा देवताओं में वासव (इन्द्र) हो, वेदों में ॐकार हो, जंगली पशुओं में हे परमेश्वर! आप सिंह हैं और हे लोक पूजित प्रभो! ग्रामीण पशुओं में आप बैल रूप हो।

वर्तमान में भी आप जिस जिस रूप में होंगे उन उन स्वरूपों को भी हम सब देखें, जैसा कि ब्रह्मा जी ने आपको बताया है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, विषाद आदि से रहित आपको नमस्कार है। आप संहार के समय जिस अग्नि को प्रकट करते हो, उस विकृत अग्नि से ही समस्त विश्व भस्म होता है और उसी की सभी लोक अर्चना करते हैं। उसी अग्नि से काम, क्रोध, लोभादिक उपद्रव तथा स्थावर जङ्गम आदि सभी प्राणी मात्र जल जाता है। उस कालाग्नि को हम नमस्कार करते हैं। हे सुरेश्वर! आप उस अग्नि से हमारी रक्षा कीजिये। हे महेश्वर! हे महाभाग! हे शुभ देखने वाले! लोकहित के लिए सभी प्राणियों की रक्षा कीजिए। हे प्रभो! हमको आज्ञा प्रदान कीजिए। हम आपकी आज्ञा का पालन करेंगे। करोड़ों प्राणियों के मध्य करोड़ों रूपों में भी आपको नहीं पहचाना जा सकता। अतः हे देव देव! आपको नमस्कार है।