115- शिव के द्वारा भाषित शिवाग्नि कार्य वर्णन

शैलादि बोले-

शिव से परिभाषित शिवाग्नि कार्य को अब मैं कहूँगा। शुभ देश में तथा शुभ स्थान में यत्न पूर्वक कुण्डों का निर्माण करना चाहिए। नित्य होम का अग्नि कुण्ड तीन मेखलाओं से युक्त हो। मेखला चार, तीन तथा दो अंगुल के बराबर दीर्घ हो। एक हाथ का कुण्ड होना चाहिए। योनी प्रदेश (एक अंगूठा से तर्जनी अँगुली तक लम्बी) मात्र हो। योनी पीपल के पत्ते के समान मेखला के ऊपर बनानी चाहिए। कुण्ड के मध्य में नाभी आठ कली की तथा प्रादेश मात्र की बनावे। षष्ठ मन्त्र के द्वारा उल्लेखन करे। कर्म मन्त्र से प्रोक्षण करे, नेत्र से कुण्ड को अवलोकन करके छः रेखा खींचे। शमी अथवा पीपल की लकड़ी की सोलह आंगुल की अरणी बनावे। वन्हि बीज से शक्ति का न्यास करके उसे मथना चाहिए, उत्पन्न हुई अग्नि को यथाविधि स्थापना करके चुपचाप यज्ञ के काम में आने वाले वृक्षों की समिधा उसमें लगावें। कुशाओं को बखेरे, प्रणोता पात्र जल में पूर्ण करे तथा प्रोक्षणी पात्र को कुशाओं से अच्छादित करे। घी को अग्नि से तपाना चाहिए। कुशाओं को अग्नि में तपाकर तीन परिक्रमा करे तथा फिर उन्हें अग्नि में ही डाल देवे। श्रुक और श्रुवा स्वर्ण का रत्नों का चाँदी का अथवा यज्ञ के वृक्षों की लकड़ी का ही 'के' बना लेना चाहिए। अज्ञस्थाली (घी का पात्र प्रणीता, प्रोक्षणी से तीनों ही सोना, चाँदी, ताँबा अथवा मिट्टी का ही हो। शान्ति कर्म हो या पौष्टिक कर्म हो इनसे अतिरिक्त किसी भी धातु के न बनावे। शान्ति कर्म में मिट्टी के श्रेष्ठ कहे हैं। किन्तु अभिचार कर्म (मारण आदि) में लोहा के बनाने चाहिए। समिधा एक से, अँगुली (कन्नी अँगुली) के समान सीधे चिकने होने चाहिए। टेढ़े तथा छेद वाले न हों। बारह अँगुल प्रमाण के हों। ऐसी समिधा ही शुभ कार्य के लिए शुभ कही है। गौ का घृत अति उत्तम होता है, कपिला का हो तो और श्रेष्ठ है। अक्ष के प्रमाण अन्न तथा शुक्ति के परिमाण में तिल तथा आधे जौ। परिमाण के अनुसार फल, दूध, दही का परिमाण घी के समान है। शान्ति कर्म हो तो केवल शिवाग्नि में हवन करे। लौकिक उपचार की अग्नि में मोहन उच्चाटन आदि का कर्म करे।

ॐ बहुरूपायै मध्य जिह्वायै अनेक वर्णायै दक्षिणोत्तर मध्यगायै शान्तिकपौष्टिक मोक्षादि फल प्रदायै स्वाहा ॥ १ ॥

ॐ हिरण्यायैचामी कराभायै ईशान जिह्वायै ज्ञान प्रदायै स्वाहा ॥ २ ॥ ॐ कनकायै कनक निभायै रभ्यायै ऐन्द्रिजिह्वायै स्वाहा ॥ ३ ॥

ॐ रक्तयै रक्त वर्णायै आग्नेय जिह्वायै अनेक वर्णायै विद्वेषण मोहनायै स्वाहा ॥ ४ ॥

ॐ कृष्णायै नैॠत जिह्वायै मारणायै स्वाहा ॥ ५ ॥

ॐ सुप्रभायै पश्चिम जिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा ॥ ६ ॥

ॐ अभिव्यक्तायै वायव्य जिह्वायै शत्रुच्चाटनायै स्वाहा ॥ ७ ॥

ॐ वहये तेजस्विने स्वाहा ॥ ८ ॥

उपर्युक्त मन्त्रों द्वारा वह्नि का संस्कार कराना चाहिये। नैमित्तिक कर्मों में इनके द्वारा शिवाग्नि कार्य करना चाहिए। इसके बाद बागीश्वरी आवाह्न करना चाहिए। ॐ ह्रीं बागीश्वरीं श्याम वर्णां विशालाक्षीं यौवनोन्मत्तविग्रहां ऋतुमतीं बागीश्वरी शक्तीं आवाहयामि ॥ इस मन्त्र से आवाह्न करके बागीश्वरी देवी का यथायोग्य पूजन करना चहिए इसके बाद इन्द्रादि लोकपालों का पूजन करे।

घी से श्रुवा के द्वारा -

शक्ति बीजदीशानमूर्तये स्वाहा। पुरुष वक्त्राय स्वाहा। अघोर हृदयाय स्वाहा वामदेवाय गुह्याय स्वाहा, सद्योजात मूर्तये स्वाहा, ईशान मूर्तये तत्पुरुष वक्त्राय स्वाहा। तत्पुरुष वक्त्राय अघोर हृदयाय स्वाहा। अघोर हृदाय वाम गुह्याय सद्योजात मूर्तये स्वाहा। आदि मन्त्रों से इस प्रकार हवन करना चाहिये तथा मूल से शिवजी के हवन में पूर्ण आहुति प्रदान करे। हे मुनीश्वरो! यह क्रिया नित्य ही करनी चाहिए। अग्नि का दीपक इससे प्राप्त होगा तथा अन्त में स्वर्ग की प्राप्ति होगी। ऐसा करने वाला पुरुष दुष्कर्म करने पर भी नर्क को नहीं जायेगा। मुक्ति की इच्छा वाले भक्त को अहिंसक हवन करना चाहिए। हृदय में अग्नि का चिन्तन करना चाहिए और ध्यान रूपी यज्ञ से हवन करना चाहिए। सम्पूर्ण प्राणियों के देह में स्थित वह जगत्पति शिव ही हैं। उसको भक्ति के द्वारा जानकर प्राणायाम के द्वारा हवन करना चाहिये। वाह्य हवन करने वाला तो पत्थर पर मेंढक बनता है।