45- भुवन कोष में द्वीप और द्वीपेश्वरों का वर्णन

सूतजी बोले-

सात द्वीप वाली पृथ्वी नदियों और पर्वतों से युक्त और सात समुद्रों से सुशोभित है। जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर नाम वाले क्रम से सात द्वीप हैं। सातों द्वीपों में गण से युक्त अम्बिका के साथ नाना वेष धारण किये हुये शिवजी विराजमान हैं। क्षारोद, रसोद, सुरोद, घटोदधि, दध्यर्णव, क्षीरोद, स्वदूद ये क्रम से सात समुद्र हैं। इन समुद्रों में भी शिवजी जल रूप होकर गणों सहित बाहुओं से क्रीड़ा करते हैं। क्षीरार्णव में विष्णु भगवान शिव ध्यान में तत्पर योगनिद्रा में शयन करते हैं। जब वे जागते हैं तो अखिल संसार प्रबुद्ध होता है और सोने पर जब संसार सुप्त हो जाता है।

श्रीमान् सनन्दन, सनातन, बालखिल्य, मित्रावरुण ये सदा विष्णु भगवान का यजन किया करते हैं। अतीत अनागत सभी मन्वन्तरों में पृथ्वी के स्वामियों के नाम अब आप से कहता हूँ। स्वायंभुव मन्वन्तर में मनु के पौत्र और राजा प्रियव्रत के दस पुत्र कहे हैं। अग्नीध, अग्निबाहु, मेधातिथि, वसु, वपुष्पान, जोतिष्मान, द्युतिमान, हव्य, सवन आदि हुए। प्रियव्रत ने जम्बूद्वीप का स्वामी अग्नीन्द्र को बनाया और प्लशद्वीप का मेधातिथि को शल्मली का वपुष्मान किया, कुशद्वीप में ज्योतिषमान, क्रौंच में द्युतिमान, शाल्वद्वीप में हव्य को और पुष्कर का सवन को अधिपति बनाया। हव्य के जलद, कुमार आदि सात पुत्र हुए। इन्हीं के नाम से अलग-अलग देशों के विभाग हुए। इसी प्रकार प्लक्षादि द्वीपों के अधिपतियों के भी पुत्र हुए जिनके नाम पर उस द्वीप के देशों के तथा वर्षों के नाम पड़े। प्लक्षादि द्वीपों में धर्म और वर्णाश्रम विभाग, सुख, आयु, स्वरूप, बल सर्व साधारण रूपों में थे। ये सब मनुष्य महेश्वर में, ध्यान में एवं पूजा में तत्पर रहते थे । अन्य पुष्कर आदि द्वीपों में उत्पन्न हुए राजा लोग रुद्र के भाव रूपी सुख में तत्पर रहते थे।