लिंग महा पुराण
79- पाशुपत व्रत महात्म्य वर्णन
ऋषि बोले-
हे सूतजी! जैसे पशुपति को देखकर पशुपाश से विमुक्त देवों ने पशुपने को त्यागा, सो हमसे कहिये।
सूतजी बोले-
प्राचीन काल की बात है कि कैलाश पर्वत की शिखर पर भोगाख्य नाम वाले स्वस्थान में विराजमान शिवजी के पास सब देवता मिल कर गये। वहाँ सब देवताओं के हित के लिए विष्णु भगवान भी गरुड़ पर चढ़ कर गये। सब देवताओं ने कैलाश पर पहुँच कर प्रणाम किया तथा विष्णु भगवान भी गरुड़ से उतर कर सुमेरु पर्वत पर चढ़े। सुमेरु पर्वत कितना रम्य है उसकी शोभा को कहते हैं कि वह दुरित रहित है तथा भोगों से युक्त है, अनेक मृग आदि से सेवित है, अनेकों नाग पुङ्गणाद वृक्षों से युक्त, भ्रामरों के गुन्जार से युक्त, धब, सिदिर, पलाश, चन्दनादि से युक्त बड़ा ही रमणीक है। उस सुमेरु पर्वत के ऊपर पूर्व में विश्वकर्मा ने शिव के क्रीड़ा का स्थान बनाया है। उस स्थान को देखकर इन्द्र आदि देवताओं ने दूर-दूर से ही प्रणाम किया।
उसी समय देव देव महादेव ने अपने गणों और गणेश आदि के साथ कैलाश पर प्रवेश किया। ब्रह्मा आदि सब ही द्वार पर उपस्थित हैं तथा मणि और स्वर्ण आदि से निर्मित अनेक विमान वहाँ व्याप्त हैं, द्वार पर अनेक भवन रचे हुए हैं। सब देवों ने इस प्रकार के भवन देखकर प्रसन्न हो पुर में भीतर प्रवेश किया। वहाँ नाना प्रकार के मृदंग वेणु आदि बाजे बज रहे थे। अप्सरायें नृत्य कर रही थीं। वह स्थान अत्यन्त रमणीक था। वहाँ भी नाना वस्तुओं तथा मणियों के द्वारा सूर्य के समान तेजस्वी विमान रखे हैं। अनेकों तड़ाग, वापी, कूप आदि हैं तथा जिनकी सीढ़ियाँ वगैरह मणियों से जड़ी हैं।
इन्द्र आदि देवगण ने पुर के मध्य में सूर्य के सदृश प्रकाश वाला विमान देखा। विमान के द्वार पर नन्दीश्वर तथा गणेश को देखकर सभी ने प्रणाम किया।
गणेश्वर ने कहा-
हे देव! तुम निष्पाप हो। कहो कैसे आगमन हुआ ?
देवता बोले-
हे देव! पशुपाश विमोक्षण के लिये महेश्वर महादेव के दर्शन कराओ ? प्रभु ने पूर्व में त्रिपुर को भस्म करने के लिये पशुत्व का वर्णन किया था। उस पशुत्व के प्रति हम सब शंका युक्त बने रहे। शिव ने ही पाशुव्रत कहा था इस व्रत से पशुत्व नहीं रहता। यह व्रत १२ वर्ष या १२ मास या १२ दिन का है सो इस व्रत के करने से सब पाप पशुपाश से मुक्त हो जायेंगे। ऐसा कहने पर नन्दी ने उन देवों को गण सहित साम्ब शिव का दर्शन कराया। देवों ने भव को प्रणाम कर स्तुति की। देव देव ने पशुत्व का विमोचन किया और स्वयं महेश्वर ने पाशुपत व्रत का उपदेश दिया। तब से सब देव पाशुपत कहलाये। उन्होंने तप किया। फिर १२ वर्ष के अन्त में सब देवता ब्रह्मा और विष्णु अपने-अपने स्थान को चले गये। हे मुनियो! यह वृत्तान्त मैंने ब्रह्मा के मुख से सुना था सो तुमसे कहा। पूर्वकाल में सनत्कुमार से व्यास जी ने सुना था। इस प्रकार मनुष्य पशुपाश से मुक्त हो जाता है।