लिंग महा पुराण
64- आदित्य वंश वर्णन में तण्डिकृत शिव सहस्त्रनाम
ऋषि बोले-
हे सूतजी! आदित्य वंश का और सोम वंश का हमारे प्रति वर्णन कीजिये।
सूतजी बोले-
अदिति ने कश्यप ऋषि के द्वारा आदित्य नामक पुत्र को उत्पन्न किया। आदित्य की चार पत्नी हुईं। वे संज्ञा, राज्ञी, प्रभा, छाया नाम वाली थीं। संज्ञा ने सूर्य के द्वारा मनु को उत्पन्न किया, राज्ञी ने यम यमुना और रैवत को पैदा किया। प्रभा ने आदित्य के द्वारा प्रभात को पैदा किया। छाया ने सूर्य से, सावर्णि, शनि, तपती तथा वृष्टि को पैदा किया। छाया अपने पुत्र से भी ज्यादा यम को प्रेम करती थी। मनु ने सहसका और क्रोध में आकर दाहिने पैर से उसे मारा। तब छाया अधिक दुखी हुई और यम का एक पैर खराब हो गया जिसमें राध रुधिर और कीड़ा पड़ गए। तब उसने गोकर्ण में जाकर हजारों वर्ष शिव की आराधना की। शिव के प्रसाद से उसे पितृ लोक का आधिपत्य मिला और शाप से छूट गया। प्रथम मनु से नौ पुत्र पैदा हुए। ये इक्ष्वाकु, नभग, धृष्णु, शर्वाति, नारिश्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, करुष, पृषध्र थे। इला, जेष्ठा, वरिष्ठा ये पुरुषत्व को प्राप्त हुईं। ये मनु की पुत्री थीं। इला का नाम सुद्युम्न हुआ। मनु यह सुद्युम्न नाम का पुत्र सोम वंश की वृद्धि करने वाला हुआ। उत्कल, गय, विनितास्व नामक इसके पुत्र उत्पन्न हुए। हरीश्व से दृशदवती में बसुमना नाम का पुत्र हुआ। उसका पुत्र त्रिधन्वा नाम का हुआ। ब्रह्मा पुत्र तण्डि के द्वारा वह शिष्यता को प्राप्त हुआ। ब्रह्म पुत्र तडित ने शिव सहस्त्रनाम के द्वारा गाणपत्य पदवी को प्राप्त किया। ऋषि बोले – हे सूतजी! शिवजी के सहस्त्रनाम को हमारे प्रति वर्णन करो। जिसके द्वारा तण्डि गाणपत्य पद को प्राप्त हुआ।
सूतजी बोले-
हे ब्राह्मणो! वह १०८ नाम से अधिक एक हजार (१९०८) नाम वाला वह स्तोत्र मैं तुम्हें कहता हूँ सो सुनो। तब सूतजी ने शिव के स्थिर, स्थाणु, प्रभु, भानु, प्रवर, वरद, सर्वात्मा, सर्व विख्यात, सहस्त्राक्ष, विशालाक्ष, सोम, नक्षत्र, साधक, चन्द्र, शनि, केतु, ग्रह इत्यादि ११०८ नाम वाला महा पुण्यकारक स्तोत्र सुनाया। जिसको पढ़ने तथा ब्राह्मणों को सुनाने से हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। ब्रह्महत्या, शराब पीने वाला, चोर, गुरु की शैय्या पर शमन करने वाला, शरणागतघाती, मित्र विश्वास घातक, मातृ हत्यारा, वीर हत्यारा, भ्रूण हत्यारा आदि घोर पापी भी इसका शंकर के आश्रय में रहकर तीनों कालों में एक वर्ष तक लगातार जप करने पर सब पापों से छूट जाता है।