लिंग महा पुराण
84- पंचाक्षर महात्म्य वर्णन
सूतजी बोले -
सभी प्रकार के व्रतों में उमा महेश्वर का पूजन करके पंचाक्षरी विद्या का जप करना चाहिए। जप से ही व्रतों की विशेष समाप्ति होती है अन्यथा नहीं।
ऋषि बोले-
हे सूतजी! पंचाक्षरी विद्या का वर्णन कहिये, हमें बहुत सुनने की इच्छा है।
सूतजी बोले -
पूर्व में एक बार पार्वती जी के पूछने पर शिवजी ने पंचाक्षरी विद्या का वर्णन किया है उसे तुम्हें संक्षेप में कहता हूँ, सो सुनो―
शंकर जी बोले-
हे पार्वती! प्रलयकाल में सब स्थावर जङ्गम के नष्ट हो जाने पर तुम्हारे द्वारा भी प्रकृति को प्राप्त होने पर केवल मैं ही स्थित रहा कोई दूसरा नहीं। इस समय वेद शास्त्र आदि सब केवल पंचाक्षर मन्त्र में ही स्थित रहे। मैं एक ही प्रकृति पुरुष रूप से दो प्रकार का हुआ। वही मेरा नारायण स्वरूप है। फिर योग की शैय्या में जल में शयन करता हूँ, तब नाभि से पाँच मुख वाला ब्रह्मा उत्पन्न होता है। सृष्टि की रचना की इच्छा से दस मानसिक पुत्रों को पैदा करता है। उनको सृष्टि बढ़ाने के लिए ब्रह्मा मुझसे इन्हें शक्ति प्रार्थना करता है, तब मैं पंचाक्षरों का ब्रह्मा को उपदेश करता हूँ। सो हे देवि! उन पंचाक्षरों से वाच्य त्रिलोक पूजन शिव मैं ही हूँ और उनका वचन वह पंचाक्षर मन्त्र है।
ब्रह्माजी ने पाँच मुख से जगत के हितार्थ इस पंचाक्षर का अर्थ उन पुत्रों को वर्णन किया। वे इन पंचाक्षर को प्राप्त करके मेरु शिखर पर मुंजवान के पर्वत पर वायु का भक्षण करते हुए देवताओं के हजारों वर्ष तक तपस्या करने लगे। उनकी भक्ति से मैं प्रकट होकर उनके सामने आया। लोक कल्याण के लिये उनको मैंने मन्त्र के ऋषि, देवता, शक्ति, बीज, व्यास, विनियोग आदि का सम्पूर्ण रूप से उपदेश किया। "ॐ" यह एकाक्षर मन्त्रगत शिव है। इससे युक्त षड् अक्षर ॐ नमः शिवाय मन्त्र है अन्यथा पंचाक्षर ही इसे जानो। जिसके मन में यह मन्त्र स्थित है उसने सम्पूर्ण वेद का अध्ययन कर लिया। जो विद्वान विधान पूर्वक इसका जप करता है वह परम पद को प्राप्त करता है। यही परम विद्या है ॐ सहित यह पंचाक्षर मन्त्र ही मेरा हृदय है। गुह्य मोक्ष प्रदाता यह मन्त्र है। इस मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता आदि तुमसे वर्णन करता हूँ। इस मन्त्र का वामदेव ऋषि पंक्ति छन्द, देवता साक्षात् मैं ही शिव हूँ, नकारादि पाँच बीज पंच भूतात्मक हैं। सर्वव्यापी अव्यय (ॐ) प्रणव उसकी आत्मा में हैं। हे देवि! तुम इसकी शक्ति हो। इस मन्त्र के द्वारा बताये गए विधि पूर्वक न्यास आदि भी करने चाहिए। हे शुभे! इसके बाद मैं तुमसे मन्त्र का ग्रहण करना कहता हूँ। सत्य परायण, ध्यान परायण गुरु को प्राप्त करके शुद्ध भाव से मन, वाणी और कर्म के द्वारा तथा अनेकों द्रव्यों द्वारा आचार्य (गुरु) को सन्तुष्ट करके विधि पूर्वक गुरु मुख से मन्त्र ग्रहण करना चाहिए। शुचि स्थान में, अच्छे ग्रह में, अच्छे काल में तथा नक्षत्र में तथा श्रेष्ठ योग में मन्त्र ग्रहण करना चाहिए। गृह में मन्त्र जपना समान जानना चाहिए। गौ के खिरक में सौ गुना और शिवजी के पास में अनन्त गुना मन्त्र का फल होता है। जप यज्ञ से सौ गुना उपाँशु जप का होता है। जो मन्त्र वाणी से उच्चारण किया जाता है वह वाचिक कहा जाता है। जो धीरे-धीरे ओठों को कुछ हिलाते हुए जप किया जाता है उसे उपाँशु कहते हैं। केवल मन बुद्धि के द्वारा जप किया जाए और शब्दार्थ का, चिन्तन किया जाए वह मानसिक जप होता है। तीनों उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। जप यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं। वे विपुल भोगों को तथा मोक्ष को देते हैं, जप से जन्मान्तरों के पाप क्षय होते हैं, मृत्यु को भी जीत लिया जाता है। जप से सिद्धि प्राप्त होती है परन्तु सदाचारी पुरुष को सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं दुराचारी को नहीं, क्योंकि उसका साधन निष्फल है। अतः आचार ही परम धर्म है। आचार ही परम तप है तथा आचार ही परम विद्या है। आचार से ही परम गति है। आचारवान पुरुष ही सब फलों को पाता है तथा आचारहीन पुरुष संसार में निन्दित होता है। इसलिये सिद्धि की इच्छा वाले पुरुष को सब प्रकार से आचारवान होना चाहिए। संन्ध्योपासना करने वाले पुरुष को सब कार्य तथा फल प्राप्त होते हैं । अतः काम, क्रोध, लोभ, मोह किसी प्रकार से भी संध्या को नहीं त्यागना चाहिए। संध्या न करने से ब्राह्मण ब्राह्मणत्व से नष्ट होता है। असत्य भाषण नहीं करना चाहिये। पर दारा, पर द्रव्य, पर हिंसा मन वाणी से भी नहीं करनी चाहिए। शूद्रान, बासा अन्न, गणान्न तथा राजान का सदा त्याग करना चाहिए। अन्न का परिशोधन अवश्य चाहिए। बिना स्नान किये, बिना जप किये हुए, अग्नि कार्य न किए हुए भोजन न करें। रात्रि में तथा बिना दीपक के तथा पर्णपृष्ठ पर फूटे पात्र में तथा गली में, पतितों के पास भोजन नहीं करना चाहिए। शूद्र का शेष तथा बालकों के साथ भोजन न करे। शुद्धान्न तथा सुसंस्कृत भोजन का एकाग्र चित्त से भोजन करना चाहिए। शिव इसके भोक्ता हैं ऐसा ध्यान करना चाहिए। मुंह से, खड़ा होकर, बायें हाथ से, दूसरे के हाथ से जल नहीं पीना चाहिए। अकेला मार्ग में न चले, बाहुओं से नदी को पार न करे, कुआं को न लांघे, पीठ पीछे गुरु या देवता अथवा सूर्य को करके जप आदिक न करे।
अग्नि में पैरों को न तपावे, अग्नि में मल का त्याग न करे। जल में पैरों को न पीटे, जल में नाक, थूक आदि मल का त्याग न करे। अज, स्वान, खर, ऊँट, मार्जार तथा तुष की धूलि का स्पर्श न करे। जिसके घर में बिल्ली रहती है वह अन्त्यज के घर के समान है। उस घर में ब्राह्मणों को भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि वह चाण्डाल के समान है। पाद की हवा, सूप की हवा, मुख प्राण और की हवा मनुष्य के सुकृत का हरण करती है अतः इनसे सदा बचना चाहिए। पाग बाँध करके, कंचुकी बाँधकर, केश खोलकर, नंगे होकर, अपवित्र हाथों से, मैल धारण किये हुए जप नहीं करना चाहिए। क्रोध, मद, जंभाई लेना, थूकना, प्रलाप, कुत्ता का या नीच का दर्शन, नींद आना ये जप के द्वेषी हैं। इनके हो जाने पर सूर्य का दर्शन करना चाहिए तथा आचमन, प्राणायाम करके शेष जप करना चाहिए। बिना आसन पर बैठकर, सोकर, पर बैठकर जप न करना चाहिए। खाट आसन पर बैठकर, रेशमी वस्त्र या बाघ चर्म या लकड़ी का या ताल पर्ण का आसन पर बैठकर मंत्रार्थ का विचार करते हुए जप करना चाहिए। त्रिकाल गुरु की पूजा करनी चाहिए। गुरु और शिव एक ही हैं। शिव विद्या और गुरु भक्ति के अनुसार फल मिलता है। श्री की इच्छा वाले पुरुष को गुरु की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। गुरु के सम्पर्क से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं। गुरु के सन्तुष्ट होने पर सब पाप नष्ट होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभी देव गुरु की कृपा से ही उस पर सन्तुष्ट होते हैं। अतः कर्म, मन, वाणी से गुरु को क्रोध नहीं करना चाहिए। गुरु के क्रोध से आयु, ज्ञान, क्रिया सब नष्ट होते हैं। उसके यज्ञ निष्फल होते हैं। शिवजी कहते हैं जो इन्द्रियों का दमन करके पंचाक्षर मन्त्र का जप करता है वह पंच भूतों से विजय को प्राप्त करता है। मन का संयम करके जो चार लाख जप करता है वह सभी इन्द्रियों को विजय कर लेता है। जो पच्चीस लाख जप करता है वह पच्चीस तत्वों को जीत लेता है। बीज सहित संपुट सहित सौ लाख जप करने वाला पवित्र आत्मा परम गति को प्राप्त होकर मुझे पाता है। जो इस पंचार विधि को देव या पितृ कार्य में ब्राह्मणों से सुनेगा या सुनायेगा वह परम गति को प्राप्त होगा।