71- त्रिपुर दहन के आरम्भ में रुद्र के रथ निर्माण का वर्णन

सूतजी बोले-

विश्वकर्मा ने रुद्र भगवान का सर्वलोकमय दिव्य रथ का निर्माण किया। जिसमें दाई ओर का पहिया सूर्य और बाई ओर का चन्द्रमा था। दक्षिण में बारह तथा उत्तर में (बाईं ओर) १६ अरा थे। अराओं में एक तरफ १२ आदित्य तथा दूसरी तरफ १६ चन्द्रमा की कला थीं। सब नक्षत्र बाईं तरफ भूषण थे तथा ६ ऋतु नेमी थीं। पुष्कर अन्तरिक्ष, रथ, नील, मन्दराचल, था, अस्ताचल और उदयाचल दोनों उसके जुआ थे। सुमेरु उसका अधिष्ठान था। सम्वत्सर उसका वेग था। उत्तरायण तथा दक्षिणायन उसके चक्र संगम थे। स्वर्ग तथा मोक्ष दोनों ध्वजा थे। धर्म और विराग दोनों दण्ड थे। यज्ञ दण्ड का आश्रय, दक्षिण सन्धि, पचास अग्नि उसमें लोहे के स्थान पर थीं। सब इन्द्रियाँ उसमें भूषण थीं। श्रद्धा गति थी, वेद उस रथ के घोड़ा थे, पद भूषण थे, छै अंग उपभूषण थे, पुराण, मीमांस, धर्म, शास्त्र इत्यादिक उसके वस्त्र थे, दिशायें पैर थीं, वह रथ सभी प्रकार के राग और स्वर्ण से भूषित था। चारों समुद्र उसके चारों ओर के कम्बल थे। सरस्वती देवी घण्टा थीं। विष्णु भगवान बाण थे, सोम शल्य थे। इस प्रकार दिव्य रथ और धनुष को तैयार करके ब्रह्मा को सारथी बनाया। ऐसे दिव्य रथ पर पृथ्वी और आकाश को कँपाते हुए शंकर भगवान विराजमान हुए। भगवान शंकर ने यह देखकर पशुओं का आधिपत्य (ब्रह्मा) को दिया। जो पाशुपत दिव्य योग को धारण करे और १२ वर्ष, ६ वर्ष या तीन वर्ष तक नियम से व्रत का पालन करे तो वह निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त होगा। इसके बाद विनायक बालक रूप में प्रकट हुए। देवताओं ने उनका पूजन किया।

विनायक बोले-

इस संसार में भक्ष भोज्य आदि पदार्थों से पूजा नहीं करेगा वह देव हो या दानव हो सिद्धि को प्राप्त नहीं करेगा। ऐसा सुनकर इन्द्रादिक सभी देवताओं ने विनायक भगवान का पूजन किया फिर गणेश्वर तथा नन्दी आदिक भगवान शंकर के पीछे चले। भगवान शंकर आगे आगे शस्त्र आदिक लेकर चले। वह जगत के हित के लिए दहन को नन्दी पर सवार हुए उनके पीछे सभी गण व देवता थे। यम, पवन, गरुड़, वायु ही सब भगवान के पीछे थे। दुर्गा सिंह पर चढ़ी हुईं, अंकुश, शूल, खड्ग आदि धारण किए हुए साथ-साथ चलने लगीं। शिवजी पर फूलों की वर्षा होने लगी। देवता जय-जयकार करने लगे। सकल लोक के हित के लिए त्रिपुर दहन के लिए त्रिशूली (शिवजी) इस प्रकार से चले। यदि चाहें तो वे त्रिलोकी को क्षण मात्र में भस्म कर सकते हैं परन्तु लीला हेतु इस त्रिपुर दहन को बाण आयुधों से युक्त देवताओं के साथ इस प्रकार चल रहे हैं। तब महादेव के धनुष तानने पर तीनों पुर एक साथ इकट्ठे हो गए। देवताओं को बड़ा हर्ष हुआ और जय हो! जय हो! की ध्वनि करने लगे तथा भगवान शंकर की स्तुति करने लगे।

तब ब्रह्माजी बोले-

इस समय पुष्य योग है। अब आप लीला त्याग दो, आपको विष्णु या मुझ से क्या प्रयोजन है ? इस पुष्य योग में तीनों पुरों को दग्ध कर दो। तब भगवान ने हँसते हुए एक ही बाण को छोड़ा। वह बाण उसी क्षण त्रिपुर को भस्म कर पुनः देव देव शंकर जी के पास लौट कर आ गया। यह लीला बड़ी विचित्र हुई। इसको देखकर सभी देवता एवं विष्णु आदि सभी स्तुति करने लगे।

ब्रह्मा ने कहा-

हे देव! देव देवेश्वर! आप प्रसन्न होइये। पाँच आपके भयंकर मुख हैं। आपका कोटि सूर्य के समान तेज है। रुद्र रूप हो, आप ही अघोर रूप हैं। शिव रूप भी आप ही हो। आप को नमस्कार है। आप सहस्त्र शिर तथा सहस्त्र पाद वाले हो। हे अघोर ! हे वाम! हे तत्पुरुष ! आपको नमस्कार है। आपकी स्तुति हे नाथ! कौन कर सकता है। देखने मात्र से ही आप तीनों पुरों को दग्ध करने की क्या तीनों लोकों को भी लय कर सकते हो। हे देवेश! आपका दिव्य तेज कहाँ और हमारी लघु स्तुति को भी सामर्थ कहाँ। तो भी हमारी भक्ति से पुकारते हुओं की आप रक्षा करो। सूतजी कहते हैं कि ब्रह्मा के द्वारा की गई स्तुति के स्तोत्र को जो भी पढ़ता है वह सब प्रकार के बन्धन से मुक्त हो जाता है।

तब शिवजी ब्रह्मा से प्रसन्न होकर पार्वती जी की ओर देख कर बोले- हे ब्रह्मा! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ वरदान माँगो।

ब्रह्मा बोले –

हे देवेश! हे त्रिपुरारी! आप में मेरी भक्ति हो और मेरी भक्ति तथा सारथीपने से आप प्रसन्न हों। तब भगवान विष्णु भी साम्ब सदा-शिव की हाथ जोड़कर वन्दना करने लगे और बोले कि हे देव देवेश! आप में मेरी दृढ़ भक्ति हो, आपको बारम्बार नमस्कार करता हूँ। सूतजी कहते हैं कि इस प्रकार ब्रह्मा विष्णु आदि की स्तुति से प्रसन्न हुये त्रिपुरारि पार्वती सहित अन्तर्ध्यान हो गये। देवता भी विस्मित हुए प्रणाम करके अपने अपने लोक को चले गये। त्रिपुरारि का यह ब्रह्मा कृत स्तोत्र दैव कार्य एवं श्राद्ध कार्य में पढ़ेगा या सुनेगा वह ब्रह्म लोक को प्राप्त होगा। मानसिक, कायिक, वाचिक, स्थूल, सूक्ष्म आदिक सभी पापों से इस अध्याय को पढ़कर सुनकर मनुष्य पवित्र हो जाएगा तथा कोई भी बाधा एवं रोग नहीं सतायेगा। उसे धन, आयु, यश, विद्या अतुलनीय प्राप्त होंगे।