59- सूर्य की प्रभा का वर्णन

सूतजी बोले-

शेष पाँच ग्रह भी स्वतन्त्र सामर्थवान - ईश्वर ही है। देवताओं का सेनापति स्कन्द है वह मङ्गल ग्रह है। ज्ञानी लोग बुध को नारायण रूप कहते हैं। यमराज महाग्रह मन्दगामी शनिश्चर है। देवताओं के और असुरों के गुरु महा कान्ति वाले वृहस्पति और शुक्र ग्रह कहे हैं। अखिल लोक का मूल सूर्य है, इसमें कोई संशय नहीं है। इसी से सम्पूर्ण देव, दानव और असुर आदि उत्पन्न होते हैं। रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्र, अग्नि आदि सब देवताओं में कान्ति सम्पूर्ण तेज, जो भी है वह सर्वात्मा महादेव जी ही का है। तीनों लोकों का स्वामी सब देवताओं का मूल सूर्य ही है। उसी में सब लय होता है और उसी से सब उत्पन्न होता है। उसी से क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, संवत्सर, काल, संख्या का ज्ञान होता है। काल के बिना न नियम है, न दीक्षा है, न क्रम है। ऋतु विभाग यदि न हो तो पुष्प, फल, मूल आदि कैसे हों ? धान्य, तृण और औषधियों की उत्पत्ति आदि का अभाव हो जाएगा। जगत को प्रकाशित करने वाला भास्कर रुद्र रूप ही है। वही काल रूप है, वही अग्निरूप है, वही बारह प्रकार का प्रजापति है, वही चराचर तीनों लोकों को तपाता है, जैसे प्रभाकर दीपक गृह मध्य में रहकर ऊपर नीचे तथा आस पास के अन्धकार को दूर करता है, उसी प्रकार हजारों किरणों वाला सूर्य जगत को प्रकाशवान करता है। सूर्य की हजारों प्रकार की किरणों का वर्णन मैंने पहले कहा है उनमें सात किरणें अति श्रेष्ठ हैं वे ग्रहों की योनि है। सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, अन्नद्ध, सर्वावसु, स्वराट ये सात किरणें मुख्य हैं। इस प्रकार सूर्य के प्रभाव से ही नक्षत्र ग्रह और तारे आकाश में सब दीखते हैं। फिर यह संसार इसी प्रकार होता रहता है। ये नक्षत्र क्षय को प्राप्त नहीं होते, इससे नक्षत्र कहा जाता है।