लिंग महा पुराण
13- तत्पुरुष (ब्रह्म) का महात्म्य
सूतजी बोले-
इकत्तीसवाँ कल्प पीतकल्प कहा गया है। इस कल्प में ब्रह्मा जी पीले वस्त्र धारण करते हैं। परमेष्ठि ब्रह्मा के द्वारा शिव का ध्यान करते हुए महान तेजस्वी पीले वस्त्र धारण किये हुए एक कुमार का जन्म हुआ। वह कुमार पीले गन्ध का लेपन किए हुए तथा पीले रंग की माला को धारण किए था। सुनहरा जनेऊ तथा पीले रंग की पगड़ी पहने हुए था, उस युवक की बड़ी लम्बी भुजायें थीं। तब ध्यान के द्वारा ब्रह्मा जी ने उन लोक के विधाता महेश्वर को जान लिया और उनकी शरण को प्राप्त हुए।
इसके अनन्तर ध्यान करते हुए ब्रह्मा जी ने महेश्वर [?????]इसके बाद महादेव जी ने कहा-
हे देवी! तुम रुद्राणी होओगी और ब्राह्मणों के हित के लिये परमार्थ स्वरूपिणी होओगी। इस चार पैर वाली गाय की पुत्र की इच्छा से ध्यान करने वाले परमेष्ठि ब्रह्मा ने परिक्रमा की और ध्यान के द्वारा उसे परमेश्वरी जानकर संसार के गुरु महेश्वर ने यह बताया कि यह गायत्री तथा रुद्राणी है। उस वैदिकी, विद्या, रुद्राणी, गायत्री तथा लोकों के द्वारा नमस्कार की हुई को जपकर ध्यान योग के द्वारा ब्रह्मा ने महादेव जी को प्रसन्न किया। तब महादेव जी ने उन्हें दिव्य योग, ऐश्वर्य, ज्ञान, सम्पत्ति और वैराग्य दिया। उसी समय उनके पास से (शरीर में से ही) पीले वस्त्र पहने हुए, पीली माला धारण किये हुए तथा पीले चन्दन का लेप लगाये हुए दिव्य अनेकों कुमारों का प्रादुर्भाव हुआ। उनके पीले ही सिर के वस्त्र पगड़ी आदि थे तथा पीले ही रंग के वे सभी कुमार थे, उन्होंने हजारों वर्षों तक निर्मल यश को प्राप्त करके अपने को योग में लगाकर तपस्या का आनन्द प्राप्त किया। ब्राह्मणों का कल्याण करते हुए धर्म, योग और बल से युक्त, बहुत समय तक मुनियों की रक्षा करके, महान योग का उपदेश देकर वे महादेव जी में ही लीन हो गये। इस प्रकार वे सभी कुमार महेश्वर भगवान को प्राप्त हुए। अन्य भी जो ध्यान योग के द्वारा अपने को नियमित करके तथा इन्द्रियों को जीतकर महादेव को प्रसन्न करते हैं वे सभी ब्रह्मचर्य पूर्वक निर्मल होकर और सभी पापों से छूटकर रुद्र जो महादेव जी हैं उनमें प्रवेश करते हैं और फिर न होने वाले मोक्ष को प्राप्त करते हैं।