46- भारतवर्ष का वर्णन

सूतजी बोले-

राजा प्रियव्रत ने अपने महा बलवान बड़े पुत्र को जम्बूद्वीप का स्वामी बनाया। वह शिव का भक्त, बड़ा तपस्वी श्रीमान् इन्द्र विजयी तथा बुद्धिमान था। उसके पुत्र नौ प्रजापति के समान महादेव जी में परायण हुए। बड़ा पुत्र नाभि, दूसरा किंपुरुष, हरीवर्ष, इलाव्रत, रम्य, छटवाँ हिरण्यमान, सातवाँ कुरु, आठवाँ भद्राश्व, नौवाँ केतुमाल नाम वाले थे। इनके जम्बू द्वीप में देशों का अब वर्णन करूँगा। पिता ने नाभि को दक्षिण देश हेमाख्य दिया, हेमकूट नाम का देश किंपुरुष को, हरी को नैषध, इलाव्रत के लिये मेरु, रमय को नीलाचल पर स्थित देश, श्वेत, नाम का देश जो उत्तर में है वह हिरण्यमान को, शृङ्गवर्ष को कुरु पुत्र के लिये, मालवान देश को भद्राश्व को, गन्धमादन केतुमाल नामक पुत्र को दिया।

आग्नीघ्र अपने देश को पुत्रों में अभिषेक करके तपस्या किए चला गया। स्वाध्याय में तत्पर होकर शिव ध्यान में मग्न हो गया। किंपुरुष आदि के आठ देशों में बिना ही सिद्धि के सुख की वृद्धि तथा जरा मृत्यु का भय नहीं है। इन आठ रुद्रक्षेत्र में मरे हुए स्थावर जङ्गम प्राणियों को रुद्र की समीपता मिलती है और अन्त में परागति को प्राप्त होते हैं।

नाभि के पुत्र और मेरुदेवी पत्नी से सर्वश्रेष्ठ, बुद्धिमान ऋषभ नाम वाला पुत्र हुआ। ऋषभ के सौ पुत्र हुए, जिनमें सबसे बड़े भरत थे। ऋषभ भरत को अभिषेक करके ज्ञान वैराग्य में मग्न होकर नग्न जटाधारी तथा निराहारी शिव के बड़े भारी भक्त हुए और शैव पद को प्राप्त हुए। हिमाचल से दक्षिण देश को भरत के लिए दिया गया था इसलिए विद्वान उसे भारतवर्ष नाम से जानते हैं। भरत का पुत्र भी बड़ा बुद्धिमान बलवान सुमति नाम वाला हुआ। भरत उसे राज्य का भार सौंप कर तपस्या के लिये जंगल में चले गये।