लिंग महा पुराण
80- द्वादश लिंगाख्य पाशुपाश विमोक्षण व्रत वर्णन
ऋषि बोले-
हे सूतजी! आपके द्वारा पाशुपत के पाशुपाश विमोक्षण व्रत को सुना अब प्राचीन काल में देवताओं के द्वारा उसका किस प्रकार अनुष्ठान किया गया, यह आप हमारे लिए कहिए।
सूतजी बोले-
पहले सनत्कुमार ने शैलादि से पूछा था। नन्दी ने उनको जो संक्षेप में कहा है देव, दैत्य, सिद्ध मुनियों ने उसका अनुष्ठान किया है, वह यही द्वादश लिंगाख्य पशुपाश विमोक्षण व्रत है। यह भोग काम और मुक्ति को देने वाला है। छः अंगों सहित वेद को मथकर के इसको निकाला है। संसार रूपी वृक्ष के जीवों को मोक्ष देने वाला है। ब्रह्मा, विष्णु ने भी इसका अनुष्ठान किया है। शिव का पूजन साधारण रूप से सभी महीनों में करने की विधि का वर्णन करता हूँ। चैत्र में सोने की, वैशाख में वज्र की (हीरे) की, जेष्ठ में मर्कत मणि की, आषाढ़ में मुक्ता की, सावन में नील मणि निर्मित, भादों में पद्मराग मयी, आश्विन में गोमेद की, कार्तिक में प्रवाल, मार्गशीर्ष में वैदूर्य की, पूष में पद्मराग की, माघ में सूर्यकान्त मणि की, फागुन में स्फटिक मणि की लिंग मूर्ति बनाकर पूजा करें। सभी महीनों में सोने का कमल बनाने या चाँदी से अथवा केवल कमल से ही पूजा करें। रत्नों के अभाव में सोना चाँदी उनके अभाव में ताम्र व लोहे से कार्य किया जाना चाहिए अथवा पत्थर की लकड़ी की या मिट्टी की या सर्वगन्धमय शिव की मूर्ति बना लेनी चाहिए।
हेमन्त ऋतु में महादेव की श्री पत्र (बेल पत्र) से पूजा करे। सभी महीनों में चाँदी का कमल जिसमें सोने की कली बनी हों ऐसे कमल से पूजा करे अभाव में केवल बेल पत्र से पूजा करे। बेल पत्र में सदा लक्ष्मी निवास करती है। नील कमल में अम्बिका, उत्पल में षडमुख तथा महादेव पद्म में रहते हैं। श्री पत्र को कभी भी त्यागना नहीं चाहिए। गूगुल से उत्पन्न धूप सदा सर्व पापों का नाश करती है। अतः धूप दीप हमेशा अर्पण करना चाहिए। सर्व रोगों का नाश करने वाला सर्व सिद्धि देने वाला चन्दन कहा है। श्वेत आक के फूल में साक्षात् ब्रह्मा का वास है, कन्नेर में साक्षात् मेधा, करवीर में गणाध्यक्ष, वक में साक्षात् नारायण, सर्व सुगन्धित पुष्पों में गंगाजी निवास करती हैं।
शुद्ध अन्न एक या अधिक आढ़क शक्ति से निवेदन करना चाहिए। प्राणियों को अन्न दान करने से शंकर जी की तृप्ति होती है। इससे प्रति मास देव का पूजन करना चाहिए। पूर्णमासी को महादेव जी का व्रत करना चाहिए। इससे सर्व कार्य की सिद्धि होती है। सत्य, अहिंसा, शौच, दया, शान्ति, सन्तोष, दान धारण करके व्रत करना चाहिए। वर्ष के अन्त में गोदान तथा बैल की सवारी का त्याग तथा वेद पाठी ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। शिव क्षेत्र में शिव लिंग की स्थापना करनी चाहिए या उसे ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए। इस प्रकार शिव की पूजा करने वाला मनुष्य उत्तम तपस्वी हो जाता है और करोड़ों सूर्य के समान प्रकाश युक्त उत्तम विमान में बैठकर शिव लोक को प्राप्त होता है। यह भक्त, शिवपने को, देवपने को, पित्रीश्वरपने को, गाणपत्यपने को पाता है। विद्यार्थी विद्या को, भोगार्थी भोगों को तथा जो जो भी कामना करता है यह उसको प्राप्त करता है। एक माह का व्रत करने पर भी मनुष्य रुद्रपने को पाता है। यह शुभ पवित्र व्रत देव, किन्नर विद्याधरों को रुचता है। विधि पूर्वक ईश का पूजन करने और मूर्धा से प्रणाम करके इस स्तवन का जप करता है वह शिवधाम को प्राप्त होता है। पूर्व में ब्रह्मा ने इस स्तोत्र को तीनों लोकों के हित के लिए कहा था। अतः यह स्तोत्र अमूल्य है।