लिंग महा पुराण
68- सोमवंश के वर्णन में श्री कृष्ण का प्रादुर्भाव
सूतजी बोले-
सात्वत राज के सत्य बोलने वाले चार पुत्र थे। भजन, भ्राजमाद, दिव्य तथा देवावृध नाम के ये चारों पुत्र बड़े पराक्रमी थे। अब अन्धक और वृष्णि के वंशों का विस्तार से वर्णन सुनो।
देवावृध नाम के राजा ने सर्वगुण सम्पन्न पुत्र पाने के लिये तपस्या की। उससे उसको पुण्यवान वभ्रु नाम वाला पुराणों का ज्ञाता पुत्र प्राप्त हुआ। देवावृध और वभ्रु दोनों ने यज्ञ और दान के द्वारा ब्राह्मणों को प्रसन्न करके अमरत्व प्राप्त किया। वृष्णि की गान्धारी और माद्री दो भार्या थीं । गान्धारी ने सुमित्र और मित्रनन्दन दो पुत्रों को पैदा किया। माद्री के अनमित्र और शिनि पुत्र हुए। अनमित्र ने निघ्न, निघ्न के प्रसेन और सत्राजित दो पुत्र हुए। सत्राजित सूर्य का सखा था उसने सूर्य से स्यमन्तक मणि को प्राप्त किया था। सम्पूर्ण पृथ्वी पर वह राजा श्रेष्ठ था और सब रत्नों में उसकी मणि श्रेष्ठ थी। किसी समय शिकार खेलते हुए अकेला प्रसेन सिंह के द्वारा मारा गया। शिनि के सत्यक नाम का पुत्र हुआ, सत्यक के सात्यिकी और युयुधान नाम के दो पुत्र हुए। ये दोनों शिनि के नाती थे। युयुधान का पुत्र असङ्ग उसका पुत्र कुणि, कुणि का युगन्धर नाम का पुत्र हुआ। माद्र के पुत्र वाष्ण कहलाये जिनमें सुफलक विख्यात हुआ उसने गन्दिनी नाम की काशीराज की कन्या से विवाह किया जो बहुत वर्षों तक माता के गर्भ में स्थिर रही थी।
पिता ने गर्भ में स्थित कन्या से कहा -
तू उदर से बाहर क्यों नहीं आती ? तो पिता से इस कन्या ने कहा कि तीन वर्ष तक एक गौ नित्य दान करो तब मैं बाहर आऊँगी। इस प्रतिज्ञा को पूर्ण करने पर यह गन्दिनी नाम की कन्या उत्पन्न हुई थी। सुफलक के द्वारा इसके अक्रूर जी का जन्म हुआ। इसी वंश के एक राजा थे आहुक। उनके देवक और उग्रसेन दो पुत्र हुये। देवक के देववान, उपदेव, सुदेव, देवरक्षित चार पुत्र हुए। देवकी आदिक सात बहिन हुईं। जिनको वसुदेव जी ने ब्याह लिया। उग्रसेन के नौ पुत्र थे जिनमें कंस बड़ा था। वसुदेव की स्त्रियों में रोहिणी ने हलायुध बलराम को पैदा किया। देवकी ने वसुदेव द्वारा भगवान कृष्ण को पैदा किया। उमा के देह से उत्पन्न भगवती योग निद्रा यशोदा के गर्भ से जन्मी। वह साक्षात् प्रकृति और भगवान कृष्ण साक्षात् पुरुष थे, जो धर्म मोक्ष के देने वाले चतुर्भुज वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुये जगत की रक्षा के लिये उत्पन्न हुये उनको वसुदेव जी ने यशोदा को समर्पण किया और कन्या को लाकर कंस के लिये दिया। कंस पुरानी आकाशवाणी को स्मरण करके कन्या को मारने को तैयार हुआ तब कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में अष्टभुजी देवी बनकर उससे कहने लगी कि तू मुझे क्या मारता है, तेरा मारने वाला तो संसार में पैदा हो गया। श्रीकृष्ण की १६१०८ रानियाँ थीं उनमें सबसे प्रिय और श्रेष्ठ रुक्मिणी थी। कृष्ण ने पुत्र के लिये शिव की बहुत समय तक तपस्या की, तब उन्हें चारुदेष्ण, सुचारु, प्रद्युम्न आदि पुत्र शिव की कृपा से प्राप्त हुए। फिर जाम्बवती के आग्रह से कृष्ण ने बहुत तप किया। तब प्रसन्न होकर रुद्र भगवान ने वरदान दिया, तब जाम्बवती के साम्ब पैदा हुआ। इसके पश्चात् भगवान कृष्ण को जब १२० वर्ष बीत गये तब ब्राह्मण के शाप के बहाने से अपने कुल का नाश किया और जरा नाम के व्याध के अस्त्र से शरीर त्याग कर दिव्यलोक को पधारे। अष्टावक्र के शाप से कृष्ण की भार्या चोरों ने अपहरण कर लीं। बलराम जी शरीर को त्याग कर शेषनाग होकर चले गये। कृष्ण की रुक्मिणी आदि पटरानी अग्नि में प्रवेश कर चली गईं। रेवती जी बलभद्र के साथ अग्नि में प्रविष्ट हुईं। अर्जुन भी अपने भाइयों के साथ स्वर्ग को पधारे। इस प्रकार मैंने संक्षेप में आप लोगों को कृष्ण की कथा कही। हे ब्राह्मणो! इस चन्द्र वंश के राजाओं के चरित्र श्रद्धा से पढ़े, सुनावे या ब्राह्मणों के मुख से सुने, वह निःसन्देह वैष्णव लोक को जाता है।