66- सोम वंश के वर्णन में ययाति का चरित्र

ययाति बेला -

ब्राह्मणो! आप सभी मेरी बात सुनिये। जिससे मैंने अपने बड़े पुत्र को राज्य नहीं दिया है। मेरा ज्येष्ठ पुत्र यदु ने मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया। जो विपरीत मति वाला हो वह पुत्र नहीं है, ऐसा सन्तों का मत है। माता पिता की आज्ञा पालन करने वाला पुत्र ही प्रशंसा का पात्र होता है। छोटे पुत्र पुरु ने मेरी आज्ञा का पालन किया तथा विशेष रूप से माना है। उसने मेरी जरा ( बुढ़ापे ) को धारण किया है तथा शुक्राचार्य ने भी ऐसा ही वरदान दिया था कि जो तुम्हारे बुढ़ापे को धारण करेगा वहीं राज्य का अधिकारी होगा। इसलिये आप जान लें कि पुरु राज्य का अधिकारी है।

ऋषि बोले-

जो पुत्र गुणों से सम्पन्न हो तथा माता पिता की आज्ञा मानने वाला हो वह छोटा होने पर भी राजा बनने योग्य है और सभी प्रकार के कल्याण को पाता है। अतः शुक्राचार्य के वरदान से वही राज्य का अधिकारी है इसमें अन्यथा नहीं करना चाहिये। सूतजी बोले इस प्रकार सन्तुष्ट हुए जनपद के द्वारा राजा ययाति ने अपने प्रिय छोटे पुत्र पुरु को राज्य में अभिषेक किया। दक्षिण पूर्व दिशा में शासन का भार वसु को सौंप दिया। दक्षिण दिशा में राजा ने बड़े पुत्र यदु को नियोजित किया। पश्चिम दिशा में द्रुह्य नामक पुत्र को तथा उत्तर दिशा में अनु को राज्य का भार सौंपा। इस प्रकार सात द्वीपों और समुद्रों वाली पृथ्वी को राजा नहुष ने सौंप दिया। इस प्रकार राज्य देकर वह राजा प्रीतिमान होकर उपदेश करने लगा कि सभी कामनाओं को इस प्रकार दबाकर रखना चाहिए, जिस परकार कछुआ अपने अंगों को अपने में समेट कर रख लेता है। कामनायें उपभोग करने से शान्त नहीं होतीं उससे तो वे और अधिक बढ़ती हैं, जिस प्रकार हवन की अग्नि घी डालने से और अधिक प्रज्वलित होती है। पृथ्वी, धन, धान्य, सोना, पशु, स्त्री एक मनुष्य की भी कामना के बराबर हैं ऐसा मानकर कामनाओं का दमन करना चाहिए। मनसा वाचा कर्मणा जो सब प्राणियों में पाप कर्म नहीं करता वह ब्रह्म को प्राप्त करता है। जो दूसरे से नहीं डरता तथा न दूसरों को डराता है, जो दूसरों से न तो बैर करता है और न दूसरों की निन्दा करता है, वह ब्रह्म सम्पत्ति को प्राप्त करता है। चाहे केश जीर्ण हो जायें, दाँत जीर्ण हो जायें, आँखें जीर्ण हो जायें, कान जीर्ण हो जायें, लेकिन जीवित रहने की आशा, धन की आशा कभी भी जीर्ण नहीं होती। संसार के जितने भी सुख हैं वह तृष्णा के नाश होने पर जो सुख मिलता है उसकी बराबरी कभी नहीं कर सकते। अतः तृष्णा का  त्याग ही परम सुख है। ऐसा कहकर राजा बन को तप के लिए चला गया। वहाँ अत्यन्त तप करके पत्नी सहित उसने स्वर्गलोक को प्राप्त किया। ययाति के इस वंश में बड़े-बड़े कीर्तिमान तथा धर्मात्मा राजा हुए जिनके शासन में पृथ्वी हमेशा सूर्य की किरणों से चमकती रही। जो मनुष्य ययाति के इस पवित्र चरित्र को पढ़ेंगे-सुनेंगे, वह बुद्धिमान पुरुष शिवलोक को प्राप्त करेंगे।