लिंग महा पुराण
29- श्वेत मुनि द्वारा मृत्यु पर जय पाना
सनत्कुमार बोले –
हे विभो ! दारूवन स्थित तपस्वियों का जो वृत्तान्त है उसे सुनने की हमारी इच्छा है। दारूवन में प्राप्त भगवान नीललोहित ब्रह्मचारी दिगम्बर रूप से प्राप्त हुए, सो वृत्तान्त कहिये।
सूतजी बोले-
सनत्कुमार के ऐसे वचन सुनकर शैलादि बोले – मुनि लोग स्त्री, पुत्र और अग्नि सहित देव देव महादेव के प्रसन्नार्थ दारूवन में घोर तप कर रहे थे। तब प्रसन्न हुए जगन्नाथ वृषभध्वज प्रवृत्ति लक्षण ज्ञान जानने के लिए, निवृत्ति लक्षण ज्ञान की प्रतिष्ठा के लिए, दारूवन वासी मुनियों की परीक्षा से लीला करने के लिए, विकट रूप बनाकर दिगम्बर तीन नेत्र, दो हाथ, कृष्ण शरीर वाले होकर दारूवन में गए और वहाँ मन्द-मन्द मुस्कान से स्त्रियों में कामदेव की उत्पत्ति कराने, गान तथा भ्रूविलास करने लगे। कामदेव को नाश करने वाले शंकर जी मधुर आकृति वाले उस नारी समूहों में काम वृद्धि करने लगे। वन में उस विकृत मूर्ति को देखकर पतिव्रता स्त्रियाँ भी उन नीललोहित शंकर जी के पीछे-पीछे चलने लगीं और उनकी पर्णशाला ( कुटिया ) के द्वार पर जाकर खड़ी हो गईं। भगवान शंकर के मुख से हँसने की चेष्टा से वे सभी ऐसी चेतनाहीन होने लगीं कि उनके वस्त्राभूषण गिरने पर भी ध्यान नहीं था। कोई स्त्री शिव को देखकर घूम रही थी और कोई भौंहों को चढ़ा-चढ़ाकर विलास करने लगीं। कोई नारी जिसके वस्त्र तथा कौंधनी गिर गई हैं, हँसती हुई गान करने लगीं। कोई जिनके नवीन वस्त्र गिर रहे हैं, अपने कंकणों को विचित्र विचित्र बजाकर गान करने लगीं। कोई गा रही है, कोई नाच रही है, कोई धरातल पर गिर पड़ी, कोई हाथी की तरह बैठ गई। परस्पर हँसती हुई, आलिंगन करती हुई शंकर के मार्ग को रोकती अति निपुणता करने लगीं। कोई पूछने लगी- आप कौन हैं ? कोई बोली-
बैठ जाओ ? कहाँ जा रहे हो ?
प्रसन्नचित्त से कहने लगीं-
हम पर ही प्रसन्न हो जाइये।
शंकर जी उनके वचन सुनकर शुभ अशुभ कुछ भी नहीं बोले। तब उनके पति मुनीश्वर अपनी स्त्रियों को व्याकुल देखकर तथा शंकर जी को देखकर कठोर वचन बोलने लगे। उनका तप शंकर के आने पर इस प्रकार अस्त हो गया, जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर आकाश में तारे नाश को प्राप्त हो जाते हैं। सुना जाता है कि ऋषि के शाप से ब्रह्मा का यज्ञ नाश हो गया था और भृगु के शाप से विष्णु को भी १० बार अपना शरीर धारण करना पड़ा था। गौतम के शाप से इन्द्र के वृषण हो गए। ऋषियों के शाप से वसुओं का गर्भ में वास हुआ, ऋषियों के ही शाप से राजा नहुष सर्प योनि को प्राप्त हुआ। हरि भगवान का निवास स्थान क्षीर सागर भी ब्राह्मणों ने अपेय कर दिया। परन्तु बाद में भगवान हरि ने काशी में भगवान शंकर को दूध और अमृत से स्नान कराकर मुनि और ब्रह्मा के साथ उनको अभिषेक किया और क्षीर सागर को पूर्ववत कराया। मांडव्य ऋषि ने धर्म को श्राप दिया तथा दुर्वासा ने कृष्ण जी सहित यादवों को भी श्राप दिया। राम को अनुज सहित दुर्वासा का श्राप हुआ। इस प्रकार ये तथा अन्य बहुत से राजा ब्राह्मणों के वश में होंगे, परन्तु शिव किसी के वश में नहीं हुए।
इस प्रकार वे ब्राह्मण (मुनीश्वर) शंकर की माया से वशीभूत होकर शंकर जी को न जानकर कठोर वचन बोलने लगे। तब उसी क्षण शंकर जी अन्तर्ध्यान हो गये। ब्राह्मण भयभीत चित्त वाले हो गये तथा दारूवन से ब्रह्मा जी के पास गये। उन्हें दारूवन का सब वृत्तान्त सुनाया। तब ब्रह्मा क्षण मात्र ध्यान कर उठकर हाथ जोड़ शिव को प्रणाम करके कहने लगे – हे ब्राह्मणो! तुम भाग्यहीन हो जो अति उत्तम निधि को प्राप्त कर त्याग दिया। दारूवन में जो लिंगी विकृत आकार का आप लोगों ने देखा, वह साक्षात् परमेश्वर शिव ही था। गृहस्थों को अतिथियों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। चाहे वे सुरूप हों या कुरूप हों, चाहे वे मलिन हों और अपण्डित हों। पूर्व में सुदर्शन नामक ब्राह्मण ने अतिथि पूजा से ही काल को जीत लिया था। गृहस्थों के भूमि पर अतिथि पूजन के सिवाय तारने का दूसरा कोई उपाय नहीं है।
सुदर्शन ने पूर्व प्रतिज्ञा की और अपनी भार्या से कहा-
हे सुभगे, हे सुव्रते! मेरे वचन सुनकर तुझको गृह पर आये अतिथियों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। सभी अतिथि शिव रूप ही हैं। इससे अपने शरीर को भी समर्पण करके अतिथि पूजा करनी चाहिए। भार्या पतिव्रता थी, पति की आज्ञा शिरोधार्य कर अतिथि सेवा करती रही। एक दिन साक्षात् धर्म ही उन दोनों की श्रद्धा की परीक्षा करने को ब्राह्मण रूप धरकर उनके घर पर आया। उस ब्राह्मणी ने पूजा की सब सामग्री से उस विप्र का पूजन भली प्रकार किया। भली प्रकार पूजा गया वह ब्राह्मण उस सुदर्शन की पत्नी से बोला हे भद्रे! अन्नादि सामग्री की आवश्यकता नहीं, तू अपना शरीर ही अर्पण कर दे। लज्जा से युक्त वह पतिव्रता पति की आज्ञा का ध्यान करके नेत्र मूंद कर उसके पास चली और अपना शरीर उस ब्राह्मण को निवेदन कर दिया।
उसी समय उसका पति सुदर्शन द्वार पर आया और बोला-
हे सुभद्रे! आओ, कहाँ गई हो, तब उस समय वह अतिथि बोला- हे सुदर्शन! तुम्हारी भार्या के साथ मैं मैथुन में लिप्त हूँ। हे विप्र ! सुरत के अन्त में मैं सन्तुष्ट होऊँगा।
सुदर्शन बोला-
हे विप्र ! यथा कामना इसका भोग करो, मैं आ रहा हूँ। ऐसा सुनकर धर्मराज ने प्रसन्न होकर अपना स्वरूप दिखाया और इच्छित वरदान देकर बोले – हे विप्रेन्द्र ! यह सुशोभना मैंने मन से भी नहीं भोगी, इसमें तुम सन्देह मत करो। मैं तुम्हारी श्रद्धा जानने के लिए ही यहाँ आया था। इस तरह के धर्म से तुमने मृत्यु को भी जीत लिया है। अहो तप का कैसा प्रभाव है। ऐसा कहकर धर्मराज चले गए।
इसलिए हे भाग्यहीन ब्राह्मणो! अतिथि सब प्रकार से पूजनीय होता है। तुमने अतिथि रूप शंकर का अपमान किया है, उन्हीं की शरण में जाओ। ब्रह्मा के ऐसे वचन सुनकर वे ब्राह्मण बोले- हे महाभाव! हमने जीवन की अपेक्षा न करके शिव के दर्शन किए और अनिन्द्य शिव की निन्दा की और श्राप भी दिया। पर श्राप की शक्ति हमारी उनके दर्शन मात्र से कुंठित हो गई। अब हमको क्रम से संन्यास का उपदेश करो, तब हम देव देव शिव के दर्शन कर सकेंगे।
ब्रह्मा जी बोले-
पहले गुरु द्वारा बारह वर्ष तक वेदाध्ययन करके फिर अर्थ विचार कर धर्म का ज्ञान करके स्त्री (पत्नी) की प्राप्ति करे। श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न करके और उन पुत्रों को अनुकूल वृत्ति में लगाकर अग्निहोत्रादि यज्ञों द्वारा यज्ञेश्वर भगवान का पूजन करके वन में जाकर १२ वर्ष १ मास अथवा १२ दिन तक मुनि दूध पान करता हुआ अग्नि में सब देवों का पूजन करके मन्त्र द्वारा यज्ञ पात्रों को भी अग्नि में हवन कर दे। मिट्टी के पात्रों को जल में त्याग धातु के पात्रों को गुरु को अर्पण कर दे। धन से ब्राह्मणों को दान दे, तब गुरु को प्रणाम कर मुनि को संन्यास धारण करना चाहिये। चोटी सहित केशों को त्याग दे, यज्ञोपवीत (जनेऊ) भी त्याग कर दे। भू स्वाहा इत्यादि मन्त्र से ५ आहुति जल में छोड़ कर इसके बाद वह यति शिव रूप हो मुक्ति का विचार करे। व्रत करके, जल पीकर, पर्णावृत्ति द्वारा, दूध द्वारा अथवा फल द्वारा जीवन बिताता हुआ १ वर्ष या ६ मास होने पर प्रस्थान करता चलाचल शरीर का अन्त करके शिव सायुज्य मोक्ष को प्राप्त होता है। इस प्रकार की भक्ति से शिव भक्त शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। रुद्र के भक्त को दान से शुभ व्रतों से यज्ञों से विविध प्रकार के होमों से अनेक प्रकार के शास्त्रों और वेदाध्ययन से क्या प्रयोजन है ? महात्मा श्वेत ने तो भक्ति के द्वारा ही मृत्यु को जीत लिया था। ऐसी ही भक्ति परमात्मा शंकर में तुम सबकी ही हो।