90- योगियों को अपने लक्ष्य प्राप्ति में आये हुये अरिष्टों का तथा मृत्यु सूचकों का वर्णन

सूतजी बोले-

अब मैं आपके प्रति अरिष्टों को कहूँगा जिससे योगी लोग मृत्यु को देखते हैं। अरुन्धती को, ध्रुव तारे को तथा महापथ को जो नहीं देखता वह मनुष्य एक वर्ष से अधिक नहीं जीता है। सूर्य को बिना किरणों के तथा अग्नि को किरणों से युक्त देखता है वह ग्यारह महीना से अधिक नहीं जीता है। मूत्र और पुरीष को सोने और चाँदी के रूप में देखता है तथा वमन करता है, चाहे स्वप्न में ऐसा देखे या प्रत्यक्ष, वह दस महीने में मृत्यु को पाता है। सोने के वर्गों का वृक्ष अथवा गन्धर्व नगर तथा प्रेत पिशाचों को स्वप्न में देखता है वह नौ महीना से ज्यादा नहीं जीता। जो अचानक अत्यन्त स्थूल या अत्यन्त कृशकायकों को देखता है वह आठ महीना तक मृत्यु को पाता है। धूली या कीच में जिसके पर आगे या पीछे से खण्डित रूप में दिखते हैं वह सात महीने तक जिन्दा रहता है। काक, गिद्ध, कपोत अथवा दूसरा माँस खाने वाला पक्षी जिसके सिर पर बैठ जाता है वह छः मास तक जीता है। धूल की वर्षा में कौआ पंक्तियों में उड़ता हो तथा अपनी छाया को विकृत देखता है वह चार या पाँच महीने तक जीता है। बिना बादल के जो बिजली को देखता है और दक्षिण दिशा में अपने को स्थित देता है तथा जल में इन्द्रधनुष को देखता है वह केवल दो-तीन महीने ही जीता है। जल में अथवा दर्पण में जो अपनी आत्मा को नहीं देख पाता अथवा बिना सिर के देखता है वह एक मास से ऊपर नहीं जीता। मुर्दे की सी अथवा चर्बी की सी गन्ध अपने शरीर में देखता है वह १५ दिन से ज्यादा नहीं जीता। रीछ, बन्दरों से युक्त रथ में बैठकर जो दक्षिण दिशा को नाचता गाता हुआ जाता है उसकी मृत्यु उपस्थित ही समझिये। काले वस्त्र पहने हुए, काले रंग की स्त्री जिसको स्वप्न में दक्षिण दिशा की ओर ले जाय वह नहीं जी सकता। अपने कण्ठ में जो मनुष्य छेद देखता है या नंगे संन्यासी को देखता है उसकी मृत्यु उपस्थित ही है। जो दिन में या रात्रि में बार बार डरता है, दीप की गन्ध जिसको नहीं आती जिसकी जीभ काली और कड़ी हो गई हो तथा मुख कमल का सा लाल हो और कपोलों पर पीली पीली फुन्सी उठ आवे उसकी मृत्यु शीघ्र हो जाती है। दिन या रात्रि में प्रत्यक्ष पीटा जाता हो परन्तु उसे वह नहीं देख पाता उसे गत आयु जानना चाहिए। ऐसे अरिष्टों को देखकर बुद्धिमान मनुष्य विषाद और खेद को छोड़कर पूर्व अथवा उत्तर दिशा में चला जाय वहाँ एकान्त से पूर्व या उत्तर मुख बैठकर आचमन करे तथा महेश्वर को प्रणाम करके सीधा शान्त बैठे जैसे निर्वात स्थान में दीपक स्थिर हो जाता है ऐसे स्थिर बैठे और महेश्वर का ध्यान, नाक, कान, आँख, मन, बुद्धि के द्वारा करता रहे। ओंकार से देह को पूर्ण करे। ॐकार को तीन मात्रा वाला जानना चाहिए। व्यंजन इसमें ईश्वर है। पहली मात्रा विद्युती, दूसरी तामसी तथा तीसरी निर्गुणा जाननी चाहिए। प्रणव धनुष आत्मा बाण, ब्रह्म लक्ष्य कहा गया है। सावधान होकर के सर्वत्र लक्ष्य का भेदन करना चाहिए। ॐ में तीन मात्रायें, तीन लोक, तीन वेद अथवा तीन अग्नि, विष्णु के तीन डग है। अकार, उकार और मकार सहित ॐकार तीन मात्रा वाला कहा है। अकार भूलोक, उकार भुव लोक, व्यंजन सहित मकार स्वर लोक कहा है। ॐकार त्रिलोक मय है। उसका सिर त्रिविष्टप (स्वर) मय है। इसकी प्रथम मात्रा ह्रस्व, दूसरी दीर्घ तथा तीसरी प्लुत कही है।

प्रतिमाह सैंकड़ों अश्वमेघ यज्ञ करे उससे जो फल प्राप्त होगा वह प्रणव की मात्रा के ज्ञानी को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार योग से युक्त, पवित्र, जितेन्द्रिय, आत्मा को प्राप्त करता है। इसलिये पाशुपत योग के द्वारा बुद्धिमान को आत्मा का चिन्तन करना चाहिए। जो आत्मा को जानते हैं वह सब प्रकार से पवित्र हैं। योग के ज्ञान से ब्राह्मण, ऋण, यजु, साम और उपनिषदों  को स्वयं जान जाता है। सर्व देव मय होकर योनी क्रम को त्याग कर शाश्वत पद (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है। जैसे वृक्ष से पका हुआ फल वायु के वेग से गिरा दिया जाता है वैसे ही रुद्र को नमस्कार करने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। रुद्र को नमस्कार सर्व कर्मों के फल को निश्चय ही देता है अन्य देवों का नमस्कार इतना फल नहीं देता। अतः रुद्र को नमस्कार करनी चाहिए। ध्यान में परायण योगी जो अपने शरीर को त्यागता है वह तीन कुलों का उद्धार करता हुआ शिव सायुज्य को प्राप्त होता है। अरिष्ट को देखकर तथा मृत्यु को उपस्थित देखकर वाराणसी में अविमुक्तेश्वर पर जाकर जो नर शरीर को त्यागता है वह संसार से मुक्त है। हे ब्राह्मणो! जो श्री पर्वत पर अपने शरीर को छोड़ता है वह शिव सायुज्य को पाता है इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। अविमुक्तेश्वर जीवों को मुक्ति देने वाला परम क्षेत्र है। बुद्धिमानों को उसका सदा सेवन करना चाहिए, मुक्ति के समय तो विशेष रूप से सेवन करे।