96- विघ्न विनायक गणेश जी की उत्पत्ति का वर्णन

सूतजी कहने लगे-

इस प्रकार स्तुति करके देवता शिवजी के सामने उपस्थित हुए तो शंकर भगवान ने उनकी ओर देखा। आनन्दपूर्ण आँसुओं से देवों ने फिर प्रणाम किया।

शिव ने कहा -

कि हे देवो! तुम्हारा कल्याण हो।

देवता बोले-

दैत्यों से हमारा कभी विघ्न न रहे ऐसी प्रार्थना है। देवों का अपकार करने वाले दैत्यों से हमें कभी भी विघ्न प्राप्त न होवे यही हम वरदान माँगते हैं।

फिर पिनाकी शिव ने गणेश्वर का शरीर धारण किया। गणेश्वरों ने और देवताओं ने संसार के दुःख दूर करने वाले, गज के से मुख वाले, त्रिशूल धारण करने वाले गजानन को देखा। उस समय सिद्ध मुनीश्वर देवता आकाश से फूलों की वर्षा करने लगे तथा गणेश को और महेश को प्रणाम किया। फिर मूर्तमान सुन्दर बालक गज के से मुख वाला महेश्वर और अम्बिका को प्रणाम करने लगा और शिव ने उसे सुन्दर हाथों से उसका आलिंगन किया और उसकी मूर्धा में चुम्बन किया और कहा हे पुत्र! तेरा अवतार दैत्यों के नाश के लिए तथा ब्रह्मवादी द्विजों के उपकार के लिए है। दक्षिणा हीन जो यज्ञ करे उसके यज्ञ में तू विघ्न कर। अध्यापन, अध्ययन, व्याख्यान रूपी कर्मों को जो अन्याय से करते हैं उनके प्राणों को हरण कर, जो स्त्री अथवा पुरुष अपने वर्ण से गिरा है और अपने धर्म का पालन नहीं करता उसके प्राणों का हरण कर। हे विनायक ! जो स्त्री या पुरुष तुम्हारा नित्य पूजन करते हैं। उनके लिए सम्पत्ति प्रदान कर। हे गणेश! भक्तों की सदा रक्षा कर, जवान और वृद्धों की भी रक्षा कर। तीनों लोकों में तू ही सर्व पूज्य और वन्दनीय होगा। जो ब्राह्मण मुझको, नारायण को या ब्रह्मा को यज्ञादिकों में पूजेंगे उनमें सबसे पहले तुम्हारा पूजन करेगा। जो तुम्हारा पूजन करके श्रौत, स्मार्त या लौकिक कर्म करेगा उसका कल्याण और तुम्हारा अर्चन न करने वाले का अकल्याण होगा। ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, सिद्धि के लिए अनेक प्रकार के भोजनों का भोग लगाकर शूद्र सर्व तुम्हारा पूजन करेंगे। गन्ध, पुष्प, धूप आदि से तुम्हारा पूजन न करने वाले को चाहे वह देव हो, मनुष्य हो उसको कोई भी फल नहीं मिलेगा। ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्य देवताओं का पूजन करने वाला पुरुष प्रथम में तुम्हारा पूजन करके विघ्न बाधाओं से रहित रहेगा। तब से लेकर जगत में गणेश जी का सब पूजन करते हैं। वे दैत्यों के यज्ञों का ध्वंस करते हैं। इस प्रकार से स्कन्द के बड़े भाई गणेश की उत्पत्ति तुम्हारे सामने वर्णन की। जो इस प्रसंग को पढ़ेगा, सुनेगा और सुनावेगा वही सुखी होगा। इसमें कोई संशय नहीं है। इसका सुनने वाला या प्राप्त करने वाला परम गति को पाता है तथा गणेश्वर के साथ रुद्र लोक में आनन्द प्राप्त करता है।