34- योगियों की प्रशंसा का वर्णन

श्री भगवान बोले -

बार बार अग्नि के द्वारा यह स्थार जङ्गम संसार जलाया गया तब यह उत्तम भस्म बन गया। भस्म के द्वारा मैं वीर्य धारण करके प्राणियों का सिंचन करता हूँ। अग्नि कार्य करके जो मेरे वीर्य रूपी भस्म से 'त्रियांशु' इत्यादि मन्त्रों से भस्म धारण करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। भासित होने, शिव को पैदा करने से और पापों का भक्षण करने से भस्म कहते हैं। उष्मपा ( गरम वस्तु खाने वाले ) पित्रीश्वर होते हैं, देवता अमृत पीने वाले हैं। अग्नि सोम रूप है। मैं महा तेजस्वी अग्नि हूँ और सोम रूपी अम्बिका है। मैं पुरुष रूप हूँ और सोम (अम्बिका) प्रकृति है। इसलिए भस्म मेरा वीर्य कहलाता है। अपने वीर्य को मैं शरीर में धारण करता हूँ। लोक में रक्षा के लिए अशुभ को नाश करने के लिए गृहों में सूतिका आदि की रक्षा करता हूँ, जो जितेन्द्रिय पुरुष मेरे भस्म से स्नान करते हैं और वे मेरे पास आते हैं और संसार में नहीं लौटते। यह पाशुपत व्रत कपिल योग कहा है। शेष आश्रमियों को पीछे शम्भु ने रचा है। लज्जा, मोह, भय आदि वाली इस सृष्टि को मैंने ही रचा है।

देवता मुनि सभी नग्न उत्पन्न होते हैं। संसार में सभी मनुष्य भी बिना कण के पैदा होते हैं। वस्त्र से ढका हुआ आदमी यदि जितेन्द्रिय नहीं है तो वह नग्न ही है। जितेन्द्रिय पुरुष वस्त्र बिना भी नंगा नहीं है, क्योंकि वस्त्र कारण नहीं है। क्षमा, धैर्य, अहिंसा, वैराग्य या कामना की तुल्यता ही उत्तम वस्त्र है।

भस्म के स्नान से लिप्त है मन जिसका, ऐसा शिव का ध्यान करता है उसके हजारों अकार्य भी भस्म हो जाते हैं। जैसे अग्नि अपने तेज से वन को जलाती है उसी प्रकार भस्म सभी पापों को जलाती है। इसलिए तीनों काल में जो भस्म से स्नान करता है वह शिव की गाणपत्य पदवी को पाता है। जो भस्म लगाकर ध्यान करता है वह उत्तर मार्ग से आर्य लोगों के उत्तम वाम अमरत्व को पाता है। जो दक्षिण मार्ग का आश्रय करके श्मशान का सेवन करते हैं वह अणिमा, गरिमा, आदि, आठ सिद्धियों को प्राप्त करते हैं । इन्द्रादिक देवता 'कामिक व्रत' को करने से ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं। अतः मद, मोह को त्याग राग, द्वेष, रजोगुण, तमोगुण से रहित पाशुपत व्रत को धारण करना चाहिए। पाशुपत व्रत सब पापों को नाश करने वाला है। जो शुद्ध होकर जितेन्द्रिय होकर इसको पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रुद्र लोक को प्राप्त होता है। वे सब वशिष्ठ आदिक मुनीश्वर यह सुनकर भस्म से सफेद शरीर वाले होकर कल्पान्त तक रुद्र लोक में निवास करते रहे। इसलिए योगी लोग, विकृताङ्ग हों, मलिन हों या रूप वाले हों, उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिए, बल्कि पूजा करनी चाहिए। हे ब्राह्मणो! अधिक क्या शिव के भक्त शिव के समान ही पूज्य हैं, इसमें संदेह नहीं है। दधीचि जैसे देव, देव नारायण को जीतकर शिव की भक्ति से मुक्त हो गया था। इसलिए सब प्रकार से भस्म से दिव्य शरीर वाले मुनि लोग चाहे वे जटा वाले हों या मुण्डित हों, सभी की कर्म मन वाणी से उनकी पूजा करनी चाहिए।