लिंग महा पुराण
89- यतियों के पाप शोधन प्रायश्चितों का वर्णन
सूतजी बोले –
हे मुनीश्वरो! इससे आगे मैं शिव का कहा हुआ यतियों के लिए पाप शोधन और प्रायश्चित कहूँगा। मन वाणी और शरीर से होने वाले पाप तीन प्रकार के होते हैं। जो रात दिन होते रहते हैं। इनसे जगत लिपट रहा है। प्रमादी जन का योग ही बल है। योग से श्रेष्ठ मनुष्यों को और शुभ नहीं है। इससे धर्मात्मा मनीषी अविद्या को विद्या से जीतकर उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त कर योग की ही प्रशंसा करते हैं। यतियों के व्रत, उपव्रत के व्यतिक्रम में प्रायश्चित विधान होता है। यती यदि कामना से स्त्री को पाता है तो उसे सौ प्राणायाम से युक्त सान्तपन नामक व्रत करना चाहिये और फिर सावधान हो अन्त में कृच्छ व्रत करना चाहिए। यती यदि प्रमादी होकर पूर्व आश्रम में आकर विषयों में प्रवृत्त होता है तो वह असत् (झूठा) है और हिंसा करने वाला है तो उसे ऐसा दारुण कार्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि ऐसे कार्यों से वह अधर्मी बन जाता है। यती को अधर्म में फंसाकर झूठ नहीं बोलना चाहिए।
परम आपत्ति आने पर भी यती को चोरी नहीं करनी चाहिए। चोरी से अधिक और कोई अधर्म नहीं है। ऐसा श्रुति कहती है। चोरी को परम हिंसा कहा गया है। क्योंकि जो जिसका द्रव्यं है वह उसके वहिश्चर (बाहर रहने वाले) प्राण हैं। जो उसके धन को हरता है वह उसके प्राणों को हरता है। ऐसा करने वाले को एक वर्ष तक चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। यती को कर्म से, मन से, वाणी से किसी भी जीव की हिंसा नहीं नहीं करनी चाहिए। यदि बिना कामना के भी यती पशु, कीट आदि की हिंसा करता है तो उसे कृच्छ, अति कृच्छ तथा चान्द्रायण व्रत करने चाहिये। यदि यती इन्द्रियों की दुर्बलता से स्त्री को देखकर वीर्य का त्याग करता है तो उसे सोलह प्राणायाम करने चाहिए। यदि दिन में वीर्य स्खलित होता है तो उसको तीन रात्रि उपवास कर सौ प्राणायाम करने चाहिए। यदि रात्रि में स्खलित होता है तो स्नान कर १२ प्राणायाम करने से ही शुद्धि हो जाती है। यती को एकाकी भो करना, मधु मांस खाना तथा अभक्ष भोजन करना, क्षार, लवण खाना वर्जित है। इनके भी प्रायश्चित करने चाहिए। इसलिए सत्पुरुषों द्वारा निश्चय कर प्रजापत्य, कृच्छ आदि व्रत करने चाहिए और विशुद्ध होना चाहिए। यती को सोने व मिट्टी में समान भाव और सब भूतों में आत्मभाव समझकर विचरना चाहिए। ऐसा यती ध्रुव अव्यय परम पद को पाता है और फिर यहाँ जन्म नहीं लेता है।