लिंग महा पुराण
69- अव्यक्त से महत् तत्व आदि की उत्पत्ति तथा अनेक प्रकार की सृष्टि का वर्णन
ऋषि बोले-
हे सूतजी! आपने आदि सृष्टि रचेना तो कही परन्तु उसका विस्तार से वर्णन नहीं किया। हे सुव्रत ! उसे आप विस्तार से कहने में समर्थ हों, सो हमें कृपा करके विस्तार से कहिये।
सूतजी बोले-
महेश्वर महातेज प्रकृति और परमेश्वर से परे परमात्मा स्वरूप है। ईश्वर से परम कारण अव्यक्त जिसको प्रधान प्रकृति कहते हैं तथा जो जगत की योनि महाभूति का विग्रह जो अनादि अज सूक्ष्म त्रिगुणात्मक अविज्ञेय ब्रह्म पहले कहा है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। सर्ग काल में पुरुष या क्षेत्रज्ञधिष्ठित अव्यक्त से महत तत्व उत्पन्न हुआ। महत तत्व से अहंकार। वह तीन प्रकार का सात्विक राजस तामस हुआ। तामस से भूत और तन्मात्र की उत्पत्ति हुई। तामस अहंकार से शब्द लक्षण आकाश की उत्पत्ति हुई फिर उससे स्पर्श मात्रा वाली वायु की उत्पत्ति, वायु से रूपवान अग्नि की उत्पत्ति, तेज से समान जल की उत्पत्ति, जल से गन्धमात्रा पृथ्वी की उत्पत्ति। इस प्रकार कारण के गुण कार्य में आ जाने से पृथ्वी में पाँचों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) गुणों का संघात है। पंचभूत अहंकार और महत तत्व इन सात आवरणों से व्याप्त अण्ड बहुत समय तक जल में शयन करता रहा। उस अण्ड से सूर्य के समान प्रभाव वाला पुरुष उत्पन्न हुआ। वह प्रथम शरीरी अथवा पुरुष कहलाता है। उस पुरुष के वामांग से लक्ष्मी और विष्णु उत्पन्न हुए। दायें अंग से ब्रह्मा और सरस्वती पैदा हुये। इस अण्ड के भीतर ही सम्पूर्ण जगत, लोक, सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र, तारा आदि स्थित हैं। यह सृष्टि के प्रसङ्ग में जब तक सृष्टि रहती है, तब तक परमेश्वर का दिन होता है तथा प्रलय उसकी रात्रि होती है। इन्द्री, इन्द्री के विषय पंच महाभूत, बुद्धि देवता ये सब परमेश्वर के दिन में ठहरते हैं तथा रात्रि में प्रलय को प्राप्त होते हैं। जैसे तिल में तेल, दूध में घी स्थित है, वैसे ही तमोगुण और रजोगुण में संसार स्थित है। ब्रह्मा कमल गर्भ के समान, रुद्र कालाग्नि के समान, विष्णु कमल के समान नेत्र वाले तीनों देव परमेश्वर शिव के ही स्वरूप हैं। अण्ड के नष्ट होने पर जल मात्र ही शेष रहता है। स्थावर जङ्गम सब सृष्टि नष्ट हो जाती है। ब्रह्मा नारायण नाम से जल में शयन करता है। जल को नार में शयन करने के कारण भगवान का नाम नारायण है। हजार चतुर्युग तक रात्रि का घोर अन्धकार होता है जिसमें नारायण जल में शयन करते हैं। फिर सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयंभू ब्रह्मा विविध प्रकार की रचना करता है। प्राकृत और वैकृत नाना प्रकार की सृष्टि होती है।
भगवान वाराह रूप से पृथ्वी का उद्धार कर जल के ऊपर स्थापित करते हैं। तब ब्रह्मा, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, स्वर्ण, समुद्र, नदी, शेल, वनस्पति, औषधि, काष्ठा, मुहूर्त, लव काल की रचना करते हैं। ब्रह्मा के मन से मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, दक्ष, अत्रि, वशिष्ठ ये सभी मानस पुत्र उत्पन्न होते हैं। सुर और असुर, यक्ष, गन्धर्व तथा पितरों आदि की रचना होती है और सृष्टि का विकास होता है। नर, किन्नर, यक्ष, पिशाच, अप्सरा, गन्धर्व आदि की उत्पत्ति होती है। इतनी सृष्टि के बाद भी ब्रह्मा को शान्ति नहीं मिली। तब उनके शरीर के दो भाग हुये। आधे से पुरुष आधे से स्त्री पैदा हुई। पुत्र स्वायंभू मनु और पुत्री शतरूपा हुईं। इन दोनों से प्रियव्रत और उत्तानपाद दो पुत्र तथा आकृति, प्रसूति दो पुत्री पैदा हुईं। मनु ने प्रसूति को दक्ष के लिये तथा ऋचीक को आकृति प्रदान की। आकृति के यज्ञ और दक्षिणा दो सन्तानें हुईं। प्रसूति के श्रद्धा, घृति इत्यादि २४ कन्यायें हुईं। जिनके वंशों से यह संसार व्याप्त हुआ है। अर्धनारी नर शरीर वाले शंकर जी दो रूप में होते भये । जो महादेवी सती थी वह जगत के कल्याण के लिये दक्ष से आराधना की गई शुक्ल और यजुरूप से दो प्रकार से हुई। उनके नामों को मैं तुमसे कहता हूँ, उन्हें सावधान होकर सुनो - स्वाहा, स्वधा, महाविद्या, मेधा, लक्ष्मी, सरस्वती, सती, दाक्षायणी, विद्या, शक्ति, क्रियात्मका, अपर्णा, एकपरर्णा, एकपटला, उमा, हेमवती, एकमात्रिका, ख्याति, महाभागा, गौरी, अम्बिका, महादेवी, सावित्री, परदा, पुण्या, पावनी, लोकविश्रुता, अपराजिता, बहुभुजा, प्रगल्भा, सिंहवाहिनी, शुम्भादि दैत्य हन्त्री, महा महिष मर्दिनी, अमोघा, विंध्याचल वासिनी, विक्रान्ता, गणनायिका, भद्रकाली के जो यह नाम हैं वे भली प्रकार श्रेष्ठ फल देने वाले हैं। जो मनुष्य इनको पढ़ते हैं उनके पापों का क्षय हो जाता है। वन में, पर्वत, गृह, जल, थल, आदि में रक्षा के लिए इन नामों का प्रयोग करना चाहिये। सिंह के भय और सब प्रकार की आपत्ति में इन्हीं देवी के नामों का प्रयोग करना चाहिये। भूत, ग्रह, पूतना, मातृकादि से पीड़ित बालकों की रक्षा के लिये इनका प्रयोग करना चाहिये। महादेवी ही प्रज्ञा और श्री रूप से कही गई हैं। इन्हीं दोनों रूपों से हजारों नाम से युक्त वह संसार में व्याप्त हैं। इस देवी के 'से सहित महेश्वर सब लोकों की रक्षा और कल्याण के लिये उपस्थित हैं। रुद्र ही पशुपति हैं। उन्होंने ही तीनों पुरों को दग्ध किया था। उसके तेज से सब देव पशुरूप हो गये थे। जो इस चरित्र को पढ़ता है या सुनता है वह सभी कल्याण को प्राप्त करता है।