113- तत्व शुद्धि वर्णन

शैलादि बोले –

स्नान याग आदि करके सूर्य की - पूजा के लिए भस्म स्नान, शिव स्नान करके शिव की अर्चना करनी चाहिए। षष्ट मन्त्र से भक्ति द्वारा मिट्टी को ग्रहण करे और भूमि में रखे। द्वितीय मन्त्र से जल से उसे छिड़के और तृतीय मन्त्र से उसका शोधन करे। चौथे मन्त्र से उसका विभाग करे। षष्ट मन्त्र से शेष मृत्तिका को हाथ में लेकर उसके तीन विभाग करके शरीर पर लेपन करे और फिर स्नान करे। भानु (सूर्य) का अभिषेक करे। सींग से, पत्ताओं के पुट से, पलाश के पत्र से सूर्य को स्नान के लिए जल छोड़े। वाष्कल आदि सूर्य मन्त्र जो वेदों के सार भूत हैं उन्हें मैं तुमसे कहता हूँ।“ॐ भूः ॐ भुँव ॐ स्वः ॐ मह ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतं ॐ ब्रह्म" यह नवाक्षर मन्त्र वाष्कल मन्त्र कहलाता है। जो नाश को नहीं प्राप्त हो और सत्य हो उसे अक्षर कहते हैं। ॐकार से लेकर नमः पर्यन्त सत्य अक्षर कहा गया है इसको सूर्य का मूल मन्त्र कहते हैं। ॐ भूर्भुव स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् ॐ नमः सूर्याय खरखोल्काय नमः।' यह सूर्य का मूल मन्त्र है। इससे या नवाक्षर मन्त्र से प्रकाशित सूर्य की पूजा करनी चाहिए। अंग मन्त्रों को मैं यथा क्रम से कहता हूँ - ॐ भू ब्रह्म हृदयाय, ॐ भुवः विष्णु सिर से, ॐ स्व रुद्र शिखायै, ॐ भूर्भुवस्व ज्वाला मालिनी शिखाय, ॐ मह महेश्वराय कवचाय, ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्य, ॐ तपः तापकाय अस्त्राय फट् ॥

ये सूर्य के विविध प्रकार के मन्त्र कहे हैं। इन मन्त्रों के द्वारा सींग आदि के पात्रों से अपनी आत्मा का अभिसेचन करे। ताम्र पात्र में स्थित जल से विप्र क्षत्री अथवा वैश्य रक्त वस्त्र धारण किये हुए विधि पूर्वक आचमन करे। 'सूर्यश्चमेति मन्त्र से दिन में तथा 'अग्निश्चमेति' से रात में तथा 'आपः पुनन्तु' मन्त्र से मध्याह्न में आचमन करे। नवाक्षर या मूल मन्त्र से अंगन्यास और करन्यास करे। इन मन्त्रों के द्वारा "मैं सूर्य स्वरूप हूँ" ऐसा विचार करके वामहस्त पर रखे हुए गन्ध युक्त जल से कुशा पुञ्ज से 'आयोहिष्टादि' मन्त्रों द्वारा शरीर पर छींटा लगावे। शेष जल को नाहीं नासा पुट से सूँघ कर शरीर में शिव की भावना करे। सब देवों का ऋषियों का विप्रों का भूतों का विधिवत् तर्पण करे। सायंकाल, मध्याह्न काल, प्रातः काल तीनों समय लाल चन्दन मिले जल से सूर्य को अर्घ प्रदान करे। सुगन्धी युक्त एक प्रस्थ जल ताम्र पात्र में भरकर रक्त चन्दन तथा तिलों से युक्त कुशा और अक्षत, दूर्वा, अपामार्ग, पंचगव्य अथवा गौ घृत से युक्त उस पात्र को सिर पर रखकर जानुओं से भूमि को स्पर्श करके शिव को प्रणाम करके अर्ध प्रदान करे। हजारों अश्वमेघ से जो फल प्राप्त होता है वह फल सूर्य को अर्घ देने से प्राप्त होता है। भक्ति से सूर्य को अर्घ देकर पुनः त्र्यम्बक भगवान का पूजन करे। भास्कर का पूजन करके आग्नेय स्नान करे। फिर योगी पद्मासन लगाकर प्राणायाम करे। लाल पुष्प तथा कमल पुष्पों को लेकर दक्षिण भाग में स्थित करे। सर्व कार्यों में सर्व सिद्धि करने के लिए ताम्र पात्र श्रेष्ठ कहे हैं पुनः पूजा की सब सामग्री को जल से प्रक्षालन करे। सर्व देवों के द्वारा नमस्कार करने योग्य आदित्य का जप करे। मन्त्र बोलकर सूर्य को नमस्कार करे। दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अघोरा, विकृता आठ शक्तियाँ सूर्य भगवान के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी रहती है। इनके मध्य में सर्वतोमुखी वरदान देने वाली देवी की स्थापना है। वाष्कल मन्त्र से इनका आवाहन और पूजा करे। पद्मनाभ की भास्कर की मुद्रा बनावे। मूल मन्त्र से पाद्य आचमन आदि करावे। रक्त पुष्प, रक्त चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य आदि तथा ताम्बूल वाष्कल मन्त्र के ही द्वारा अर्पण करे। दीपक भी इस मन्त्र से प्रदान करे। कमल की कर्णिका में अष्ट मूर्ति का विन्यास करके ध्यान करे। बिजली की सी चमक वाली शान्त स्वरूप, अस्त्र धारिणी, सब आभरणों से युक्त, रक्त चन्दन, माला व 'से वस्त्र धारण किये हुए, सिन्दूर के समान अरुण वर्ण वाली ऐसी अष्ट मूर्ति भास्कर रूप महेश्वर का ध्यान करे। उसी मण्डल में सोम, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु का भी ध्यान करे। सभी दो भुजा तथा दो नेत्र वाले हैं परन्तु राहु का तो ऊर्ध्व शरीर ही है। इनको इनके नाम से प्रणव आदि में लेकर नमः बाद में लगाकर पूजना चाहिए। जैसे ॐ सोमायनमः इस प्रकार करने से सर्व सिद्धि, धर्म, अर्थ की प्राप्ति होती है। सब देवता, ऋषिगण, पन्नग और अप्सरायें, यातुधान, सप्त अश्व जो छन्दमय हैं, बालखिल्य ऋषियों का गण आदि सबका पृथक-पृथक अर्थ पाद्य आचमन से पूजन करे। पूजन के बाद हजार आधा हजार या १०८ बार वाष्कल मन्त्र का जप करना चाहिए। जप के दशांश पश्चिम दिशा में परिमाण के अनुसार कुण्ड बनाकर हवन करना चाहिए। प्रभावती शक्ति का गन्ध, पुष्प आदि से वाष्कल मन्त्र से पूजन करे पश्चात् मूल मन्त्र से पूर्णाहुति करे। भास्कर रूप देव देव शंकर का अंगों सहित पूजन करके अर्थ और प्रदक्षिणा करनी चाहिए। इस प्रकार मैंने संक्षेप से सूर्य भगवान का पूजन कहा। जो पुरुष इस प्रकार देव देव जगद्गुरु भास्कर का एक बार भी पूजन करेगा वह परम गति को प्राप्त होवेगा। वह पुरुष सर्व ऐश्वर्य युक्त, पुत्र पौत्रादि भाई बन्धुओं से सम्पन्न विपुल भोगों को भोगकर, धन, धान्य युक्त, यान वाहन से सम्पन्न विविध प्रकार के भूषणों से युक्तः काल गति को प्राप्त होकर सूर्य के साथ अक्षय का तक आनन्द को प्राप्त होता है। फिर यहाँ आकर राजा होता है अथवा वेद वेदाँग सम्पन्न ब्राह्मण होता है। फिर पूर्व की वासना के योग से वह सूर्य भगवान की आराधना करके सूर्य की सायुज्यता को प्राप्त होता है।