लिंग महा पुराण
86- शिव शक्ति तत्व निरूपण में मुनि मोह नाश का वर्णन
सूतजी बोले-
पूर्व कहे हुये इस ध्यान यज्ञ या पाशुपत योग को सुनकर शिवजी को मुनीश्वर सनत्कुमार आदि प्रणाम करके पुनः महेश्वर से बोले- हे प्रभो ! आप हिमवान की पुत्री पार्वती जी के साथ जो क्रीड़ा करते हो उसका रहस्य भी हमें कहने की कृपा करिये। ऐसा सुनकर नीललोहित पिनाकी अम्बिका की ओर देखकर और प्रणाम करके ब्राह्मणों से बोले स्वेच्छा - से शरीर धारण करने वाले मुझको बन्धन मोक्ष कुछ नहीं है। यह यज्ञ जीव माया और कर्मों के बन्धन में युक्त होकर भोगता है। आत्मरूप मुझे ज्ञान, ध्यान, बन्ध, मोक्ष कुछ भी नहीं है। यह प्रकृति पहले मेरी आज्ञा से मेरे मुख को देखने लगे और भवानी शंकर की तरफ देखने लगीं। माया मल से निर्मुक्त वह मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उमा एवं शंकर में भेद वास्तव में नहीं है तथा शंकर ही दो प्रकार के रूप में स्थित हैं इसमें सन्देह नहीं। परमेश्वर की आज्ञा से यह विज्ञान उत्पन्न होता है तब क्षण मात्र में ही मुक्ति होती है। करोड़ों कर्मों द्वारा नहीं। प्राणी गर्भ में हो, बालक हो, तरुण हो, वृद्ध हो सब परमेष्ठि शिवजी की कृपा से क्षण मात्र में मुक्त हो जाते हैं। यही जगन्नाथ शिव बंध मोक्ष करने वाले हैं। भू भुवः स्वः मह, जन, तप, सत्य आदि लोकों सातों द्वीपों में, ब्रह्मांड में, सब पर्वत तथा वनों में सम्पूर्ण जीव जो भी रहते हैं वह चराचर प्राणी सब शिव का ही रूप हैं। सब ही रुद्र स्वरूप हैं। अतः ऐसे रुद्र पुरुष को नमस्कार है। रुद्र की आज्ञा से यह देवी अम्बिका स्थित है। यह सुनकर सब देवता और मुनीश्वर प्रसन्न हुए और अम्बिका के प्रसाद से शिव सायुज्य को प्राप्त हुये।