लिंग महा पुराण
85- ध्यान यज्ञ वर्णन
ऋषि ने पूछा-
हे सूतजी ! विरक्त और ज्ञानियों के द्वारा ध्यान योग श्रेष्ठ कहा गया है। सो आप हमें ध्यान योग को विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए।
सूतजी ने कहा-
एक बार एक गुफा में शिवजी महाराज भवानी के साथ सुखपूर्वक विराजमान थे। तब वहाँ पर मुनीश्वरों ने आकर उन्हें प्रणाम किया और स्तुति की। हे वृषभध्वज! अत्यन्त कालकूट नाम के विष को आपने नष्ट कर दिया। आप में ही सम्पूर्ण जगत स्थित है। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा- हे ऋषियो! कालकूट विष नहीं है किन्तु यह संसार ही विष है। इससे सब प्रकार इस संसार से बचना चाहिए। देखा हुआ तथा सुना हुआ दोनों प्रकार का जो त्याग कर देता है वही संसार कहा है। निवृत्त लक्षण धर्म है और अज्ञान मूलक संसार है। उद्भिज, स्वेदज, अण्डज और जरायज चार प्रकार के जीव हैं। विषयों की निवृत्ति भोग से नहीं होती किन्तु भोगने से तो वे इस प्रकार बढ़ते हैं जैसे अग्नि घी द्वारा और बढ़ती है। राग द्वेष भय आदि नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त प्राणी छिन्न मूल वृक्ष की तरह विवश होकर गिर जाते हैं। पुण्य रूपी वृक्ष का क्षय होने से देवता भी स्वर्ग से पतित होकर अनेकों कष्टों को भोगते हैं। कीट, पक्षी, मृग, पशु आदि सबको इस संसार में दुखी ही देखा है। देवता, दैत्य, नृप, राक्षस सबको दुःखमय देखा है। उस तप से, नाना प्रकार के दानों से आत्मा लब्ध नहीं होती जैसी कि ज्ञानियों को लब्ध होती है। पर और अपर दो विद्यायें हैं। अपर विद्या वेद, शिक्षा, कल्प व्याकरणादि है। परा विद्या अक्षर (ब्रह्म) है जो शब्द रूप रस है। किन्तु शिवर्ज ने कहा है कि मैं सब कुछ हूँ। जगत मुझ में ही लय होता है तथा मुझसे ही उत्पन्न होता है। मेरे सिवाय कुछ नहीं। ऐसा जानना चाहिए। मोक्ष का हेतु ज्ञान है। आत्मा में स्थित पुरुष ही मुक्त होता है। अज्ञान होने से क्रोध, लोभ, दम्भ, मोह की उत्पत्ति है। गुरु के सम्पर्क से उत्पन्न ज्ञान रूपी अग्नि उन्हें इस प्रकार जला देती है जैसे सूखे ईंधन को आँच जला देती है। जिस शिव की आज्ञा से भीत हुआ सूर्य उदय होता है, वायु बढ़ती है, चन्द्रमा चमकता है, वह्नि जलती है, भूमि धारण करती है, आकाश, अवकाश देता है सो हे विप्रो! उसी शिव का चिन्तन करो। संसार रूपी विष से तप्त मनुष्यों को ज्ञान और ध्यान के बिना कोई उपाय नहीं है। जो सब द्वन्दों को सहने वाला, सरल स्वभाव, अमानी, बुद्धिमानी, शान्त, ईर्ष्या रहित, सब प्राणियों में समान भाव वाला, तीनों ऋणों से रहित, पूर्व जन्म में पुण्य करने वाला, श्रद्धा से गुरु आदि की सेवा करने वाला, स्वर्ग लोक में प्राप्त होकर वहाँ के भोगों को भोगकर वह मनुष्य भारतवर्ष में जन्म लेकर ब्रह्म को जानना वाला बनता है। हे ब्राह्मणो! मल युक्त मनुष्य को ज्ञान प्राप्ति का वही क्रम है। इसलिए इसी मार्ग से दृढ़व्रत होकर सबका त्याग करके, संसार रूपी कालकूट से मुक्त होता है। इस प्रकार संक्षेप में मैंने ज्ञान योग महात्म्य और पाशुपत योग को कहा। हे विप्र ! यह शिव के द्वारा कहा ज्ञान हर किसी को नहीं देना चाहिए यह योगियों को देने योग्य है। जो इस प्रसंग को पढ़ेगा या सुनेगा वह संसार से मुक्त होगा और ब्रह्म सायुज्य को प्राप्त होगा। इसमें संशय नहीं।