116- अघोरार्चन विधि वर्णन

शैलादि बोले-

शिव भक्त ध्यान में परायण ब्राह्मण लिंग में शिव की पूजा करे। अग्नि होत्र की भस्म को 'अग्निरीति' मन्त्र से ग्रहण कर पाद से मस्तक तक सब अंग में लेपन करे। ब्रह्मतीर्थ के द्वारा आचमन करे। ब्रह्म सूत्र धारण किये हुए उत्तर मुख होकर' ॐ नमः शिवाय' मन्त्र से देव का पूजन करे। सब देवों से अधिक श्रेष्ठ पूजा अघोर देव की है। अघोर भगवान के पूजन में यजन पूजन अग्नि कार्य सब समान है परन्तु अघोर मन्त्र और ध्यान अलग है। अघोर मन्त्र निम्न प्रकार है:- अघोरेभ्योऽथघोरेभ्यो घोर घोर करेभ्यः सर्वेभ्यः

सर्वशर्वेभ्यः नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥

इसके बाद अङ्गन्यास कहता हूँ: अघोरेभ्यः प्रशान्त हृदयायनमः । अथ घोरेभ्यः सर्वात्म ब्रह्म शिर से स्वाहा, चोर घोर करेभ्यः ज्वाला मालिनी शिखायैवषट् । सर्वेभ्य पिंगल कवचाय हूँ। नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः नेत्रत्रयाय वौषट् । सहस्त्राक्षाय द्विभेदाय पाशुपता स्त्राय हुँ फट्।

स्नान करके आचमन करके अघमर्षण करे। विधि पूर्वक पूजन करना चाहिए। पुनः सूर्य का पूजन करके सूर्य को अर्थ प्रदान करे। आत्मा में स्थित मूर्ति का ध्यान करे। ३८ कलाओं वाले तीन तत्वों सहित १८ भुजाओं वाले, गज चर्मधारी बाघम्बर ओढ़े हुए अघोर रूप परमेश्वर ३२ अक्षर रूप और ३२ शक्तियों से युक्त सम्पूर्ण आभूषणों से युक्त, सर्व देवों के द्वारा नमस्कार किये जाने वाले कपालों की माला धारण करने वाले, सर्व बिच्छू के भूषण धारण करने वाला, पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख वाले, करोड़ों चन्द्रमाओं आभूषणों से युक्त, सर्व देवों के द्वारा नमस्कार किये जाने वाले कपालों की माला धारण करने वाले, सर्व बिच्छू के भूषण धारण करने वाला, पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख वाले, करोड़ों चन्द्रमाओं की कान्ति वाले चन्द्ररेखा धारण करने वाले, शक्ति सहित, नीलरूप, हाथों में खड्ग खेटक पाश, अंकुश, नाग कक्षा, धनुष, पाशुपतास्त्र दण्ड, खट्वांग, तन्त्री, घंटा, विपुल त्रिशूल, दिव्य डमरू, वज्र, गदा, टंक, चमकती हुई मुद्गल धारण करने वाले तथा वरद और अभय हस्त वाले परमेश्वर का ध्यान करे तथा पुनः अघोर का पूजन और हवन करे। हवन पूर्व में कही विधि से करना चाहिए। केवल मन्त्र का भेद है सो मैंने तुम्हें अघोर भगवान का मन्त्र बता ही दिया। अष्ट पुष्पांजलि गन्धादि पूजन और स्तुति भगवान को निवेदन करे तथा बाद में बलिदान निम्न मन्त्र के द्वारा करे:-

"रुद्रभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेऽसुरेभ्यो गृहेभ्यो राक्षसेभ्यो, नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यो क्षेत्रपालेभ्यः ।"

अथ वायु वरुण दिग् भागे क्षेत्र पाल बलि क्षिपेत्। ऐसा मन्त्र बोलकर वायव्य दिशा में या वरुण की दिशा में बलिक को रख आवे । अर्थ, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल निवेदन करके आठ पुष्पों की पुष्पांजलि दे और सब विधि पूर्ववत् ही है। इस प्रकार अघोर की अर्चन विधि मैंने तुम्हें संक्षेप से कही। अघोर भगवान की पूजा लिंग में अथवा स्थण्डल में करे। परन्तु स्थण्डल से करोड़ गुना फल लिंगार्चन में तत्पर ब्राह्मण महान पापों में पड़कर भी उनमें लिप्त नहीं होता जैसे जल में पड़कर कमल का पत्र । लिंग के दर्शन से पुण्य होता है। दर्शन से स्पर्शन अधिक श्रेष्ठ है और हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! अर्चन से अधिक तो कुछ है ही नहीं। इस प्रकार यह लिंगार्चन विधि मैंने संक्षेप से कही। विस्तार से तो करोड़ों वर्ष तक भी नहीं कही जा सकती।