38- ब्रह्मा की सृष्टि का कथन

शैलादि बोले-

महेश्वर के चले जाने पर विष्णु भगवान पद्मयोनि ब्रह्मा से बोले जगन्नाथ शंकर भगवान हम दोनों के तथा अखिल विश्व के सर्वस्व हैं। मैं उनके वामाँग से तथा आप दक्षिण अंग से उत्पन्न हैं। ऋषि लोग मुझे प्रधान प्रकृति कहते हैं आपको पुरुष। महादेव ही हम दोनों के कारण हैं और सब जगत के प्रभु हैं। ब्रह्मा भी भगवान की बात सुनकर रुद्र भगवान की स्तुति करके प्रणाम करने लगे। इसके अनन्तर विष्णु भगवान ने जल में डूबी हुई पृथ्वी को वाराह बनकर पूर्ववत् स्थापित किया। नदी, नाले, पर्वत सभी स्थापित किए। पृथ्वी को ऊँची नीची सतह से रहित क्रिया 'भू' आदिक चारों लोकों की कल्पना की तथा स्थापित किये। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की इच्छा करके पशु-पक्षी देव योनि तथा मनुष्यों की रचना की। पूर्व में कुमारों को उत्पन्न किया सनत्, सनन्दन, सनातन उत्पन्न हुए जो निष्कर्म मार्ग से परम गति को प्राप्त हुए।

पुलस्त, पुलह, कृतु, दक्ष, अत्रि, वशिष्ठ आदि ऋषियों को योग विद्या से रचा। संकल्प, धर्म, अधर्म, इत्यादि १२ प्रकार की प्रजा ब्रह्मा से उत्पन्न हुई। ऋभु और सनत्कुमार आदि रचे। ये दोनों ऊर्ध्व रेता और दिव्य सृष्टि को रचकर पद्मयोनि ब्रह्मा ने अशेष युग धर्म को बनाया।