48- मर्यादा सहित पर्वतों का वर्णन

सूतजी बोले-

पचास करोड़ योजन विस्तार वाले समुद्र तथा सात द्वीपों और लोकालोक पर्वतों से पृथ्वी युक्त है। मेरु से उत्तर में नील पर्वत, उससे उत्तर में श्वेत तथा उससे उत्तर में शृङ्गी पर्वत है।

यह उस देश के पर्वत हैं। पूर्व दिशा में जठर और देवकूट पर्वत है। मेरु से दक्षिण में निषद, उससे दक्षिण में हेमकूट, उससे भी दक्षिण में हिमवान है, मेरु से पश्चिम में माल्यवान और गन्धमादन दो पर्वत हैं। ये पर्वतराज सिद्ध चरणों से सेवित हैं। यह हेमवत नाम का वर्ष भारत के नाम से प्रसिद्ध है। मेरु पर्वत के पूर्व में मन्दर नाम का पर्वत, दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में विपुल, उत्तर में सुपार्श्व नाम के पर्वतराज हैं। मन्दर पर्वत पर चार लम्बी शाखा के वृक्ष हैं जो केतु के समान हैं। कदम्ब, जामुन, पीपल तथा वट के चार वृक्ष हैं। चारों ओर क्रीड़ा वन हैं। पूर्व में चैत्ररथ, में दक्षिण में गन्धमादन, पश्चिम में वैभ्राज, उत्तर में सवितुर्वन हैं। चार ही उस पर महान सरोवर हैं। इनमें मुनि लोग क्रीड़ा करते हुए विचरते हैं। पूर्व में अरुणोद, दक्षिण में मानस, पश्चिम में सितोद, उत्तर में महाभद्र सरोवर है। अरुणोद सरोवर से पूर्व में बहुत से पर्वत हैं जिन्हें मैं संक्षेप से कहता हूँ। सितान्त, कुरुंड, कुरर, विकार, मणि, शैल इत्यादि पर्वत हैं। मन्दिर पर्वत के पूर्व दिशा में सिद्धों का वास है। वहाँ पर्वतों की गुफा में और वनों में रुद्र क्षेत्र हैं। मानस सरोवर के दक्षिण में बहुत से पर्वत हैं, जिनमें दिव्य रुद्र क्षेत्र स्थापित किये गये हैं। दिव्य पर्वतों के ऊपर देवशंकर के असंख्य धिमान हैं जिनमें शिवजी की कृपा से अनेक सिद्ध और मुनि लोग वास करते हैं।

इसी प्रकार से पातालों की भी स्थिति है। वहाँ भगवान विष्णु की साक्षात् मूर्ति भगवान हलायुध विद्यमान हैं। वहाँ देव देव की शैय्या है। पनस वृक्षों के वन में श्री शुक्राचार्य सहित उरग रहते हैं। मनोहर वन में करोड़ों संख्याओं के वृक्ष हैं। वहाँ गणों के साथ नन्दीश्वर शिव की स्तुति करते हैं। सन्तानक स्थली के मध्य में साक्षात् देवी सरस्वती रहती हैं। इस प्रकार संक्षेप से मैंने वन तथा पर्वतों में रहने वाले इन वन-वासियों की कथा तुमसे कही है। इनका वर्णन विस्तार से मैं नहीं कह सकता।