लिंग महा पुराण
49- भगवान की रचना से देशों का वर्णन
सूतजी बोले-
शितान्त पर्वत पर पारिजात वन में इन्द्र, उसके पूर्व में कुमुदाद्रि पर्वत है। वहाँ दानवों के आठ पर्वत हैं। सुवर्ण कोटर में भी राक्षसों के स्थान हैं, नीलक लोगों के भी ६८ नगर हैं। नील पर्वत पर भी १५ नगर हैं। किन्नर और विद्याधरों के महाशैल पर तीन पुर हैं। बैकुण्ठ में श्रीमान गरुड़, करंज में नीललोहित और वसुधार में वसुओं का निवास स्थान है। रत्नघाट पर सप्त ऋषियों के सात स्थान हैं। गजशैल पर दुर्गा आदि के स्थान हैं। सुमेरु पर वसुओं का स्थान है। सुनील पर राक्षसों का वास है। पंचकूट पर पाँच करोड़ नगर हैं। शतशृङ्ग पर यक्षों के सौ पुर हैं। श्वेतोदर पर सुपर्ण का स्थान, पिशाचक पर कुबेर का तथा कुमुद पर किन्नरों का, सहस्त्र शिखिर शैल पर दैत्यों का निवास रहता है। मुकुट पर पन्नगों का, पुष्पकेतु पर मुनीश्वरों का वास है। तक्षक शैल पर चार स्थान हैं। जहाँ पर ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु तथा रुद्र का तथा गुह सुमेर तथा सोम भी स्थान बनाकर रहते हैं। श्री कंठ की पर्वत गुहा में उमा सहित शंकर निवास करते हैं। श्री कंठ के अधिकारी देवेश्वर शंकर ही हैं। इस अण्ड की उत्पत्ति शंकर से हुई है इसमें संशय नहीं है। वैसे अनन्त, ईश आदि को भी अण्ड पालक कहे गए हैं और विद्येश्वर आदि चक्रवर्ती भी हैं। श्री कंठ से अधिष्ठित स्थान मर्यादा पर्वतों पर संक्षेप से मैंने कहा है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत श्री कंठ से ही अधिष्ठित है। प्रलय की अग्नि अर्थात् शिव तक का वर्णन मैं विस्तार से भला कैसे कर सकता हूँ।