लिंग महा पुराण
30- श्वेत मुनि की कथा
शैलादि बोले-
ब्रह्मा ने जब ब्राह्मणों से इस प्रकार कहा तो उन्होंने श्वेत की पुण्य कथा को पूछा, तब ब्रह्मा जी ने उनसे कहा -
श्वेत नाम के मुनि पर्वत की गुफा में 'नमस्ते रुद्र मन्येव ' इस रुद्राष्टाध्यायी से शिव की स्तुति करने लगे। महातेजस्वी काल श्वेत मुनि को लेने के लिए उसके पास आया। श्वेत इस काल को देखकर शंकर भगवान की स्तुति करने लगा। त्रयम्बक, सुगन्धि, पुष्टिवर्धन इत्यादि नामों से शिव को पुकार कर कहने लगे कि मृत्यु मेरा क्या कर सकता है मैं मृत्यु का भी मृत्यु हूँ। यह देखकर काल बोला- हे श्वेत आ, आं, इस पूजा से कुछ फल नहीं होगा। रुद्र विष्णु कोई भी मेरे द्वारा पकड़े हुए तुझको अब बचा नहीं सकता।
जिसको लेने के लिये मैं उठ खड़ा हुआ, उसको क्षण मात्र में यमलोक को पहुँचा देता हूँ। अब तू आयु रहित है और मैं तुझे लेने को आया हूँ, तैयार खड़ा हूँ । उसके इस प्रकार भयंकर वचन सुनकर हा रुद्र, हा रुद्र, इस प्रकार कह के मुनि विलाप करने लगा। महादेव को और काल को देखकर श्वेत मुनि बोला- हे काल! तू मेरा क्या कर सकता है, यह मेरे नाथ वृषभध्वज हैं । इस लिंग में सर्व देवमय शंकर मौजूद हैं। मुझ जैसे शिव भक्तों का तू क्या कर सकता है, जैसा तू आया है, वैसा ही चला जा।
तीक्ष्ण दाढ़ वाले भयंकर काल ने श्वेत मुनि के ऐसे वचन सुनकर पाश हाथ में लेकर सिंह की तरह गर्जना करके मुनि को पाश में बाँध लिया और बोला- हे श्वेत ! - तुझे यमलोक को ले जाने के लिए मैंने पाश में बाँध लिया। देव देव रुद्र ने क्या किया ? तेरी भक्ति और पूजा ने क्या फल दिया ? इस लिंग में स्थित रुद्र बिना चेष्टा वाला है, कैसे पूजनीय है। फिर सदाशिव उस द्विज को मारने के लिए आये हुए इस काल को देखकर हँसते हुए और तीन रूप में (अम्बा, गणपति और नन्दी) प्रकट हुए। उन्हें देखकर काल ने भय से क्षण मात्र में ही जीवित मुनि को छोड़ दिया और मुनि के समीप में ही ऊँचे स्वर से शब्द करता हुआ गिर पड़ा और काल के भी काल शिव को देखकर स्वयं मर गया। देवगण ऊँचे स्वर से महेश्वर, अम्बा की स्तुति करने लगे तथा शिव की मूर्धा पर फूलों की वर्षा करने लगे। काल को मरा हुआ देखकर विस्मित हुए शैलादि ने शंकर को प्रणाम किया। शंकर भगवान भी ब्राह्मण पर अनुग्रह करके तथा काल को भस्म करके क्षण मात्र में अपने गूढ़ शरीर में प्रवेश कर गये। इसलिए हे ब्राह्मणो! मृत्युञ्जय शंकर की पूजा करनी चाहिये। वे कलयुग में सबको भक्ति और मुक्ति देने वाले हैं। हे ब्राह्मण! अधिक क्या कहूँ ? संन्यास धारण करके शिव का भक्ति सहित पूजन करके शोक रहित हो जाओगे।
शैलादि बोले-
ब्रह्मा से इस प्रकार कहे गए वे ब्राह्मण पूछने लगे किस तप से, किस यज्ञ से, किस व्रत से शिव में भक्ति होती है। ब्रह्मा ने कहा कि हे ब्राह्मणो! न दान से, न तप से, न व्रतों से, न योग शास्त्रों से भक्ति होती है किन्तु भगवान की प्रसन्नता से भक्ति होती है। यह सुनकर मुनि लोग बड़े प्रसन्न हुए तथा स्त्री पुत्रों सहित ब्रह्मा को प्रणाम किया। इस प्रकार पशुपति की भक्ति धर्म, अर्थ, काम के देने वाली है। विजय देने वाली मृत्यु से जय प्रदान करने वाली है। पहले दधीचि शिव भक्ति से देवताओं के साथ हरि को जीतकर क्षुप को पैर से मारता हुआ और वज्र के लिए अस्थि को प्राप्त किया।
अतःगत आयु श्वेत मुनि ने भी महादेव की कृपा से मृत्यु को जीत लिया था।