लिंग महा पुराण
1- सूतजी तथा नैमिषेय ऋषियों का सम्वाद
सृष्टि के सृजन, पालन और संहार करने वाले प्रधान पुरुषेश्वर ब्रह्मा विष्णु तथा रुद्र रूप परमात्मा के लिये नमस्कार है।
एक समय नारद जी भगवान शंकर का पूजन कर शैलेश, संगमेश्वर हिरण्य गर्भ, स्वर्लीन, अविमुक्त, महालय, रौद्र, गौप्रेक्षक पाशुपत, विघ्नेश्वर, केदारेश्वर, गोमायुकेश्वर, चन्द्रेश, ईशन, त्रिविष्टप और शुक्रेश्वर आदि स्थानों में यथायोग्य शिवजी की पूजा करते हुये नैमिषारण्य में पहुंचे। उन्हें देखकर नैमिषारण्य वासी सभी ऋषियों ने प्रसन्नचित्त होकर उनकी पूजा की तथा उच्च आसन दिया। आसन पर बैठकर नारद जी ने लिंग पुराण के महात्म्य को बताने वाली विचित्र कथायें सुनाईं । उसी समय समस्त पुराणों के ज्ञाता सूतजी ने सभी तपस्वियों को आकर प्रणाम किया। नैमिषारण्य वासी मुनियों ने उन्हें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास के शिष्य जानकर पूजा और वन्दना की। तब उन अत्यंत विद्वान और विश्वास योग्य लोम हर्षण को देखकर सभी मुनियों को पुराण सुनने की इच्छा हुई और उनसे लिंग महापुराण के महात्म्य के विषय में पूछा।
ऋषि बोले-
हे सूतजी! आपने श्रीकृष्णद्वैपायन मुनि की उपासना करके उनसे पुराण संहिता प्राप्त की है। इसलिये हे सभी पुराणों के ज्ञाता सूतजी! हम सभी आपसे दिव्य लिंग संहिता को पूछते हैं। इस समय मुनियों में श्रेष्ठ नारद जी भी रुद्र भगवान के अनेक क्षेत्रों में भगवान की पूजा करते हुये यहां पधारे हैं। आप भी शिव के भक्त हैं तथा नारद भी और हम सब भी शिवजी के भक्त हैं।
इस प्रकार नैमिषारण्य के ऋषियों द्वारा पूछे जाने पर सूतजी उन नैमिषारण्य वासी मुनियों को तथा ब्रह्मा पुत्र नारद जी को प्रणाम करके कहने लगे।
सूतजी बोले-
मैं लिंग पुराण का वर्णन करने के लिये भगवान शंकर, ब्रह्मा और विष्णु को नमस्कार करके मुनीश्वर व्यास जी का स्मरण करता हूँ। शब्द ब्रह्म का शरीर है और साक्षात् शब्द ही ब्रह्म का प्रकाशक है। अकार, उकार और मकार अर्थात् ओ३म्कार ही स्थूल सूक्ष्म और परात्पर ब्रह्म का स्वरूप है। उसका ऋग्वेद मुख है, सामवेद जीभ है, यजुर्वेद ग्रीवा है और अथर्ववेद हृदय है। वह ब्रह्म ऐसे प्रधान पुरुषातीत हैं तथा प्रलय और उत्पत्ति से रहित हैं वही तमोगुण के आश्रय से कालरूपी रुद्र, रजोगुण से ब्रह्म और सतोगुण से विष्णु हैं और निर्गुण रूप में भी महेश्वर हैं। जीव और अव्यक्त रूपी प्रधान अवयवों में व्याप्त होकर (महत्तत्व, अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) सात रूपों से (५ ज्ञानेन्द्री, ५ कर्मेन्द्री, ५ महाभूत, १ मन) १६ प्रकारों से अव्यक्त, ध्याता और ध्येय इन २६ भेदों में युक्त, ब्रह्म से उत्पन्न सर्ग (सृष्टि) प्रतिष्ठा (पालन) और संहार लीला के लिये लिंग रूपी भगवान शिव को प्रणाम करके लिंग पुराण की पावन कथा को कहता हूँ ।