वामन महा पुराण
27 वेनकृत शिवस्तुति का माहात्म्य स्थागुतीर्थ का माहात्म्य एवं वेन आदि की स्वर्ग-प्राप्ति
सनत्कुमार ने कहा-तदनन्तर त्रैलोक्याधिपति याक्यविद् शकर देव ने उससे (वेन से) आश्वासनकारी उत्तम वचन कहा- (१)
हे राजन् ! हे सुव्रत । तुम्हारी इस स्तुति से मैं सन्तुष्ट हूँ। अधिक कहने से क्या लाम ? तुम मेरे समीप निवास करोगे। (२)
चिरकाल तक निवास करने के उपरान्त पुन मेरे शरीर से उत्पन्न सुरों के नाशक अन्धक नामक असुर होगे। (३)
वेद-निन्दा करने से उत्पन्न पूर्वकालिक घोर अधर्म के कारण हिरण्याक्ष के गृह मे उत्पन्न होकर वृद्धि प्राप्त (४)
जब तुम जगज्जननी (पार्वती) की अभिलापा करोगे उस समय मैं शूल द्वारा तुम्हारी देह की हत्या कर अरबों यों तक के लिए पवित्र करूँगा।
तदनन्तर यहाँ पुन पाप-रहित होकर भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करने के उपरान तुम मृगिरिटि नामक प्रसिद्ध गणाधिप बनोगे।
तदुपरान्त मेरे निकट रहकर तुम सिद्धि प्राप्त करोगे। वेन द्वारा कथित इस स्तुति का कीर्तन एव श्रवण करने वाले का कोई अशुभ नहीं होगा एव वह दीर्घायु प्राप्त करेगा। जैसे सभी देरों में भगवान शिव विशिष्ट है वैसे ही वेन निर्मित यह स्तव सभी स्तवों मे श्रेष्ठ है। इसका कीर्तन यश, राज्य, सुख, ऐश्वर्य, धन एवं मान का साधक है। (७-९)
विद्या की कामना रखने वाले को यत्नपूर्वक श्रद्धा से यह स्तव सुनना चाहिए। व्याधिप्रस्त, दुसित, दीन, चोर या राजा से भयभीत अथरा राजकार्य से विमुक्त पुरुष (इसके द्वारा) महान भय से मुक्त होकर इसी देह से गणों में श्रेष्ठता प्राप्त कर निर्मल होकर सेज एय यश से युक्त होता है। इस स्तव का जहाँ माठ होता है या उस गृह में राक्षस, पिशाच, भूत या विनायकगण
विघ्न नहीं करते। पति की आमा प्राप्त कर इस स्तव का प्रयण करने पाली नारी मातृपक्ष एवं पितृपक्ष में देयतुल्य पूज्या हो जाती है। एकाप्रतापूर्वक इस दिव्य स्तय को सुनने या कीर्तन करने वाले पुरुष के सभी कार्य नित्य सिद्ध होते हैं। इस स्तव या कीर्तन करने पाले मनुष्य की मनोभिलपित एवं पाणी से पथित सभी यातुएँ पूर्ण होती हैं तथा उसके मन, याणी और कर्म से किये गये पाप विनष्ट होते है। तुम्हारा कल्याण हो, तुम मनोमिलपित वर माँगो। (१०-१६)
वेन ने कहा-इस लिग फे माहाल्य, उसके दर्शन तथा नसे में सरस में नुक दो नपाहूँ (१७)
है देव ! यदि भाप मुन्न पर प्रसन्न है और मुझ पर देना पाहते है तो देशर! अपने सस सेवक पर अनुमद करें जो देवस्य का भक्षण करने से दुचेको योनि में हुआ है। पहले स्नानार्थ देषों के मना करने पर भी इसके मय से मैंने सपेयर में निमन्जन किया। इसने मेरा उपशर पिया है। इसीलिए में इसके लिए वर माँगता हूँ। (१८-२०)
उसके इस पचन को सुन पर सन्तुष्ट झार ने कहा-हे महायाहु ! यह भी मेरी कृपा से नि सन्देह पाप से मुक्त हो जायेगा एवं शिश्लोक प्राप्त करेगा। इस स्तर को सुनकर मनुष्य सभी पापों से मुक्त होगा। हे राजन् ! कुरुक्षेत्र तथा इस सरोवर के माहात्म्य तथा मेरे लिङ्ग की उत्पत्ति का वर्णन सुन पर मनुष्य पाप से विमुक्त होंगे। (२१-२३)
सनत्कुमार ने कहा-ऐसा कह पर सर्व लोक-नमस्त भगवान् सभी लोगों के देखते हुए यहीं अन्तर्हित (२४)
पद श्यान भी तत्क्षण ही पूर्व जन्म पो स्मरण कर दिव्यशरीरधारी होकर उस राजा के सम्मुख उप- हो गएस्थित हुआ। (२५)
तदनन्तर सानोपरान्त पितृदर्शन की लाटसा से स्पा- तीर्थ में आने पर वेन का पुत्र प्रभु कुटी घे मूनी देख शोध- युक्त हो गया। (२६)