प्रह्राल-तीर्थयात्रा में त्रिकूटगिरि पर स्थित सरोवर में प्राह गज का प्रहण, गजेन्द्र द्वारा विष्णु की स्तुति, गज ग्राह की उद्धार एव दोनों को वरदान, गजेन्द्रमोक्षण, स्रोत की प्रशसा

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नारद ने पहा-दानव प्रहलाद ने भगवद्भफिपूर्वक जिन गजेन्द्रमोक्षणादि जपनीय स्तोत्रों का जप किया था उन चार जपों को आप मुझे पतलायें ।

पुलस्त्य ने पहा-हे तपोधन। मैं उन स्तोतों फा वर्णन करता हूँ, आप सुनें । इनके कहने, सुनने और स्मरण करने से दुसानों का नाश होता है। (२)

प्रथम गजेन्द्रमोक्षण स्तोत्र सुनिए । तदनन्तर सारस्वत स्तोत्र एवं तत्पश्चान् दो पवित्र पापप्रशमन स्तयों का वर्णन याँगा।

सर्यररनमय सुन्दर नियूट नामक पर्यंत, सूर्य के समान प्रभायाने पर्वतराज सुमेर या पुत्र है।

श्रीरसागर फेजलरङ्गों से प्रभाविनिर्मलशिलातलगला यह पर्वत समुद्र का भेदन कर ऊपर निग्ला है एवं देवता और शपिगण पहा सर्वदा निवास करते हैं। (५)

अप्सराओं से परिपृत, झरनों से परिपूर्ण, गधों, पिनरों, यशों, सिद्धों,पारगों, पन्नगों, पत्नीयुक्त विद्याधरों, संयमी तपक्षियों और यूक,व्याघ्र एवं गजेन्द्रों से भारतशरीर याला यह श्रीमान् पर्वन अत्यन्त सुशोभित होता है। (६-७)

पुनाग, यर्णिकार, विल्य, आमलक, पाटल, आम्र, नीप, क्दम्य, चन्दन, अगुरु, चम्पक, शाल, ताल, तमाल, सरल, अर्जुन, पर्पट एवं अन्य अनेक प्रार के वृक्षों से यह पर्यंत पूर्णतया अलड्कृत है। (८-8)

यह पर्वत अनेक प्रकार के धातुओं से ललित घोटियों, चारों ओर से यहने पारे झरनों और अत्यन्त सचिर सथा विस्तृत तीन शिसरों से शोभित है। (१०)

यह पन निरन्तर मृग, यानर, सिंह, मदमस हायी, घातक, घोर एवं मयूर आदि पे शब्दों से निनादित होता रहता है। (११)

अनेक प्रकार के पुप्पों से ज्यात एवं पिविध मुगन्धों से सुवासिन उसके एक सुवर्गमय राम का सूर्य सेवन (१२)

शुक्लवर्ण मैप की तरह एवं तुपार-समूह-सटश उसके

दूसरे रजतमय रङ्ग का सेवन चन्द्रमा करते है। (३)

हीरा, इन्द्रनील, वेडूर्य आदि रत्नों की ज्योति से दिशाओं से प्रकाशित करने वाला उसका अत्यन्त उत्तम तृतीय शृङ्ग ब्रह्मा का निवास स्थान है। (१७)

कृतघ्न, क्रूर, नास्तिक, तपस्या से हीन एवं लोक में पापकर्म करने वाले मनुष्य उसे नही देग सकते। (१५)

उस पर्वत के पृष्ठभाग मे सुवर्णकमों से युक्त, कारण्डयों से आकीर्ण, राजहसों से सुशोभित, कुमुद, उत्पल, पहार, पुण्डरीक आदि नाना जातीय घमरों से मण्डिन, शतपनों यारे सुवर्ण कमलों से अरकृत तथा मरक्त के सदृश पत्रों पाले पाचन के समान पुष्पों एवं कौचक नामा घाँस के गुल्मों से चारों ओर से परिवेष्टित एक सरोवर है। (१६-१८)

उस सरोयर ये जल मे गजेन्द्रों का एक पुरूप दुरात्मा अर्थनिमीलित नेत्रोयाला माह रहता था। (१६)

एक समय दोतों से चल मुख्यारा, मदसावयुक्त, जराभिलाषी, पादचारी पर्वत तुल्य, ऐसयत के सदृश, थान-तुल्य, मद के कारण पशल नेत्रों पारा, सुपायुक्त एक गजबूथपति अपने मन की मुगन्ध से पर्वत यो मुवासित करते हुए जल पीने की इच्छा से उस सरोवर के जल में उतरा एव यमलों के समूह में अपने झुण्ड के साथ क्रीडा करने लगा। (२०-२२)

प्रच्छन्न शरीर वाले प्राद ने उसे पकड लिया। करुण रूप से आर्तनाद कर रही हथिनियों के देसते ही देखते अशिबलवान् प्राह उसे पङ्कजवन में खींच ले गया २ वरुण के पाशों से बाँधार उसे निष्प्रयत्न तथा गतिहीन कर दिया। (२३ -२४)

बद्द गजराज दृढ और भयङ्कर पाशों से आरद्ध हो जाने के कारण यथाशक्ति फड़फड़ाकर ऊँचे स्वा से चीत्कार करने लगा। (२५)

फर वम वाले (उस प्राइ) के द्वारा पकड़े जाने पर यह व्यथित तथा निरस्साह दो गया। अत्यन्त विपत्ति मे पहार यह मन से भगरान हरि का ध्यान करने लगा। (२६)

यह सुन्दर गजराजनारायण का भक्त था। अन उस समय यह सर्वात्मना उन्ही देव की पारण में गया । (२७)

यह हाथी जन्म-जन्मान्तर फे अभ्यास से एकाप्र और संयन चित्त होकर विशुद्ध अन परण से गरुयज विष्णु का भक्त हुआ। (२८)

उसने महान् देय ऐशय के अतिरिक अन्य देवता

वरदाता एच वरस्वरूप सर्वेश्वर को नमस्कार है। (४१)

भक्तिप्रिय, श्रेष्ठ दीप्ति से सम्पन्न, सुन्दर दिखलाई देने वाले, विकसित कमल के समान विशाल नेत्रों वाले, देवेन्द्र के विघ्नों का नाश करने के लिये पुरुषार्थ करने को उद्यत, वरस्वरूप, विरज योगेश्वर को नमसार है।

ब्रह्मा वा अन्य देशों के अप' स्वरूप, लोकधिनाया, भवहर्ता, नारायण, आत्महित के आश्रयस्थान महावराद को नमस्कार करता हूँ। (४३)

मैं कूटस्थ, अव्यक्त, अचिन्त्य रूप वाले, कारणस्वरूप, आदिदेव नारायण, युगान्त मे शेप रहने वाले पुराण पुरुप, देवाधिदेव की शरण प्रहण करता हूँ। (४४)

में योगेश्वर, सुन्दर विचित्र वर्णयुक्त मुकुटधारी, अज्ञेय, सर्वश्रेष्ठ, प्रकृति के परे अवस्थित क्षेत्रज्ञ, आत्मप्रभव, वरेण्य उन घासुदेव की शरण प्रहण करता हूँ। (४५)

ब्रह्मर्षि रोग जिसे अदृश्य, अव्यक्त, अचिन्तनीय, अव्यय, ब्रह्ममय और सनातन पुरुष कहते हैं, उन देव गुह्य की शरण ग्रहण करता हूँ। (४६)

( ब्रह्मवेत्ता ) जिसे अक्षर एय सर्वव्यापी ब्रह्म कहते तथा जिसके श्रवण से मृत्यु के मुख से मुक्ति प्राप्त होती है

में उसी श्रेष्ठ गुणों से युक्त, आत्मतृप्त, शाइयत आश्रय स्वरूप ईशा की झारण ग्रहण करता हूँ। (४५)

मैं कार्य, क्रिया और कारणस्वरूप, प्रमाण से अगम्य, हिरण्यबाहु, नाभि मे श्रेष्ठ कमल धारण करने वाले,

महाबलशाली, वेदनिधि, सुरेश्वर जनार्दन विष्णु की शरण में जाता हूँ। (४८)

मैं क्रीिट, केयूर एव अतिमूल्यवान श्रेष्ठ मणियों से अलकृत समस्त शरीर वाले, पीताम्बरधारी, स्वर्णिम पत्र रचना से सुशोभित, माला धारण करने वाले केशय की शरण में जाता हूँ। (४१)

मैं ससार के उत्पादक, वेद के जानने वालों में श्रेष्ठ,

योगात्माओं तथा सांग्यमों में श्रेष्ठ,आदित्य,रद,अश्विनीकुमार एय पमुओं के प्रभार से युक्त, अच्युत, आत्मस्वरूप प्रभु पी शरण प्रहण परता हूँ। (५०)

मैं श्रीयत्स चिह धारण करने वाले, महान् देय, देवताओं में गुप, उपमा रहित, सूक्ष्म, अपल तथा अभय देनेवाले परेण्य देय फी भरण प्रहण यरसाहूँ।(५१)

में समस्त प्राणियों में उत्पादक, निर्गुण, निसा यतियों की परम गति स्यरूप परमेश्वर की शरण महण करताहूँ। (५२)

में गुणाध्यक्ष, अभर, पालोचन, आभयणीय, भरण देने याने भत्तयरसन्न भायान् की भक्तिपूर्वक कारण प्रहण पाता हूँ। (५३)

मैं प्रिमियम, भिटोपेपर, ममी के प्रपितामह, योगात्मा, मदारमा जनार्दन की शरण ग्रहण करता।

मैं आदिदेव, अजन्मा, शान, व्यकाव्यपवरूप, सनातन, परम पदम, मापयप्रिय नारायण की शरण मदन परगा।

भेट देय पो समरसर है। सर्वशकिमान को नमस्कार है। सदा सूक्ष्म से गरम देवदेवेश प शरणागा हूँ। (५६)

प्येकास्ययरूप, एकमात्र, परात्पर परमात्मा, सदानी मदारमा मननपो नमरगर है।

वेदपारगामी पिगण आपसे ही परम देय एवं ब्रह्मादि देयों का आप्रयस्थान कहते हैं। (५८)

दे पुण्डरीराक्ष । हे भक्तों के अभयदाता। आपको नमरगर है। हे मुबदण्य । आपको नमस्कार है। आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।

पुरस्त्य ने पहा-शव-पक एवं गदा धारण करने वाले अमोघसम्भर विष्णु उस गजेन्द्र की मपि का विचार कर प्रसन्न हो गए। (६०)

सदनन्तर रोपाधार जगरायामी तपोधन पेश गरम पर सवार होकर उस मरोपर ये समीप गये। (६१)

अप्रमेयात्मा मधुसूदन ने माह से परा उस गोन्द्र तथा उस माह पो बेगपूर्वक जलाशय से बाहर निगला। (६२)

माधव ने पयो पर स्थित प्राह को एक द्वारा पिदीर्ण पर दारणागत गजेन्द्र को पारों में मुख (६३)

देपल के शाप में प्रदपना मा गमभटर समे मुरयु पास एवर्ग पा गया। (१५)

विष्णु का स्पर्श होने से वह हाथी भी दिव्यशरीरधारी पुरुष हो गया। इस प्रकार हाथी एष गन्धर्वश्रेष्ठ दोनों एक ही साथ आपत्ति से मुक्त हो गए। (६५)

तदनन्तर उन दोनों से पूजित होकर शरणागतवत्सल पुण्डरीशक्ष देवेश प्रसन्न हुए।

हे मुनिशाईल। योगी भगवान मधुसूदन ने शरणागत गजेन्द्र से यह मधुर वचन कहा- (६७)

श्रीभगवान ने कहा-जोस्थिरबुद्धि से शुचित्रत मनुष्य प्रयत्नपूर्वक मेरा तुम्हारातथा सरोवर, प्राह के विदारण,गुल्म, वीचक, रेणु एघ मेरु पुत्र के रूप, अश्वत्य, भास्कर, गगा स्था नैमिपारण्य का स्मरण एवं भक्तिपूर्वक कीर्तन तथा श्रवण करेंगे उनके दुस्वप्न का विनाश एवं सुस्वप्न की सष्टि होगी। (६८-७०)

जो मनुष्य प्रातः काल मठपर मत्स्यावतार, पूर्भावतार, घराहावतार, यामनावतार, गरड, नरसिंहावतार, गजेन्द्र और सुप्टिप्रलयकारक (मगवान्) का स्मरण करेंगे ये समस्त पापों से मुक्त होकर पुण्य लोक को प्राप्त करेंगे। (७१-७२)

पुलस्त्य ने कहा-गजेन्द्र से ऐसा कहकर गरुडध्वज हपीकेश ने हाथ से गजेन्द्र और गन्धर्थ दोनों का स्पर्श किया। (५३)

हे विप्र! तदनन्तर नारायणपरायण गजेन्द्र दिव्य शारीर धारण कर मधुसूदन की शरण मे गया। (७४)

तदुपरान्त श्रीमान् अद्भुतकर्मा नारायण ने गजोत्तम एवं प्राह को पापबन्ध एवं शाप से मुक्त किया । (७५)

मगवद्भक्त ऋषियों द्वारा स्तुत हाते हुए वे वे अविज्ञेय गति वाले प्रभु भगवान् विष्णु चले गये।

गजेन्द्र के मोक्ष को देखकर इन्द्रादि देवों ने महात्मा प्रभु नारायण हरि की वन्दना की। (५७)

गज-विमोक्षण को देखकर विरमय से उत्फुल्ल नेत्रों वाले महपियों एवं चारणों ने जनार्दन की स्तुति की। (५८)

गजेन्द्रमोक्षण रूपी चक्रपाणि के वर्म को देखकर प्रजापति ब्रह्मा ने यह वचन कहा- (७९)

जो मनुष्य प्रात' काल ठकर प्रतिदिन इसे सुनेगा, पद परमसिद्धि प्राप्त करेगा और उसरा दुःस्वप्न विनष्ट हो जायेगा। (८०)