बलिका पाताल वास, सुदर्शन चक्र का पाताल में प्रेवश एव बलि द्वारा उसकी स्तुति, प्राह्राद द्वारा बलि से विष्णु भक्ति तथा विष्णु भक्तों की प्रशसा

बलि ने कहा-आपने सप युथ वर्णन कया।अप आप जनार्दन की आराधना करने से प्राप्त होने याली गति का वर्णन करें। (१)

किस प्रकार की पूजा से घासुदेव थी प्रीति उत्पन्न होती जगद्गुरु यो प्रसन्न करने के लिये किस प्रकार के दान प्रशस्त है? (२)

सिनिधि में उपचास आदि परने से महान् उन्नति होती है। फोन पुण्य कार्य शिशु फे प्रतिजनक फहे गये हैं? (३)

है देरपेन्द्र ' आरस्यरहित होकर इसमनापूर्यफ करने योग्य अन्य कार्यों को भी पूर्णतया आप मुझे पटायें। (४)

मगर ने कहा- परि' मा सम्पन्न और भटियुट होकर जनार्दन के उद्देश्य से जो दान दिये जाने हेपाहे मुनियों ने अभय पहा है।

ऐकोनिया होती है जिनमें मनुष्य विशु की पूजा पाने के अनन्नर उनमें पिरामनगार उपशम पता है।

ब्राह्मणों की पूजा करने से जनार्दन की पूजा होती है। उनसे ट्रैप करने पाले मृद व्यक्ति निश्चय ही नरक में जाने है। (७)

विष्णुभफ मनुष्य यो भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों की पूजा फरनी चाहिये। पूर्यकाल में विष्णु ने यह कहा था कि बामण मेरे शरीर है। (८)

शानी अथया असानी भी मानण की आमानना नही परगी पाहिये। यह विष्णु का दिव्य शरीर होता है। अनु उसी पूजा परनी चाहिये । (६)

हे महामुर! वर्ग, रस एवं गन्ध से युक्त पुष्प दो राम दोन है। (१७)

अब में माघर के प्रीणनार्थ हे गये विशेष पुप्पो, विधियों प्य दानों का वर्णन पाता। अन्पुन फे भनार्थ-मानी, साहा, गुमना, मुन्द यदुपुट, पाए, पम्प, अशोक, करार, (पनेर ), पिन (नदी), पारिभद्र, पारन, कुन (मोसरी), गिरिमारिनी, तिना, जपा, पनर नागर नामा पुप प्रभ है।

इनके अतिरिक्त केतकी को छोड़कर अन्य मुगन्धित पुष्प भी प्रशस्त हैं। (१२-१४)

केशव के पूजन मे बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृङ्ग एवं मृगाङ्क के पत्र, तमाल तथा आमलकी के पत्र प्रशस्त है।

अच्युत के अर्चन मे जिन वृक्षों के पुष्पों का प्रयोग होता है उनके पल्टय एवं पत्र भी हरिपूजनार्थ प्रशस्त (१६)

वीरुधों के किसलय एव कुश तथा जल में उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के कमल एव इन्दीवरादि से विष्णु का पूजन करना चाहिए।

हे बलि। वनस्पतियों के चिकने, पवित्र एवं जल से प्रक्षालित कोपलों तथा दूर्वाग्रपल्लवों से (विष्णु का) पूजन करना चाहिए। (१८)

प्रयत्नपूर्वक चन्दन, कुडकुम, उशीर, पद्मक एवं कालयकादि से विष्णु का अनुलेपन करना चाहिए। (१५)

श्रीविष्णु को महिप नामक कण, दारु, सिहक, अगरु,सिता,राक्ष एवं जातीपल का धूप प्रिय होता है।(२०)

घृत से संस्कृत यव, गेहूँ, शालिधान्य, तिल, मूंग उद और अन्न हरि को प्रिय हैं। (२१)

हे अनघ! मधुसूदन को गौ, पवित्र भूमि, वस्त्र, अन्न एवं स्वर्ण के दान प्रिय होते हैं। (२२)

हे दानव । माधव के प्रीणनार्थ माघमास मे तिल, तिलधेनु एवं इन्धनादि का दान करना चाहिए । (२३)

श्रेष्ठ पुरुषों को गोविन्द के प्रोणनार्थ पाल्गुन मास मे चावल, मूंग, वस्त्र एव वृष्णमृग का चर्म दान करना चाहिए। (२४)

चैत्र मास मे विष्णु के प्रीत्यर्थ ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के वस्त्र, शय्या एच आमनों का दान करना चाहिए।

मधुसूदन की तुष्टि हेतु वैशास मास में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सुगन्धित गन्ध एवं माल्यों का दान (२६)

त्रिविक्रम की प्रीति हेतु सम्जन व्यक्ति जल का पड़ा, जलधेनु, ताल वा पसा तथा सुन्दर चन्दन का चाहिए। (२७)

वामन की प्रीति हेतु आपाढ़ मास मे भक्तिपूर्वक जूते या जोदा, छत्र, लवश एवं आमलकादि का दान करना चाहिए। (२८)

बुद्धिमान मनुष्य को श्रीधर की प्रसन्नता हेतु प्रायण करना दान करे।

मास में घृत, दुग्ध का पुम्भ, घृतधेनु एय फलों का दान करना चाहिए। (२९)

भाद्रपद मास में हपीयेश घे प्रीणनार्थ पायस, मधु, घृत, पण पय गुदयुक्त ओदन पा दान करना चाहिए। (३०)

मनुष्यों को पद्मनाभ पी प्रीति हेतु आश्विन मास में तिल, अध, वृषभ, दधि, तान एव सह आदि का दान करना चाहिए। (३१)

मनुष्य दामोदर की तुष्टि हेतु फार्तिक मास में रजत, स्वर्ण, दीप, मणि, मुक्ता एवं पलादि का दान करे। (३२)

मनुष्यों को पेशव की प्रीतिहेतु मार्गशीर्ष मास में सर, उष्ट्र, सयर, हाथी, यानाइक परा प्य भेद का दान करना चाहिए।

नाराया पी तुष्टि हेतु पोप मास में भक्तिपूर्वक प्रासाद, नगर, गृह य द्वापरयादि का दान करना पाहि (३४)

पुरुशेत्तम की तुष्टि हेतु सभी समय पासी, दास, अलद्वार पद रसों से पुरु अन्न पा दान करना चाहिए। (३५)

चक्रधारी देवाधिदेय की प्रीति हेतु अपना जो सांघिय  दो भयया गृह में जो पानु पवित्र हो उमरा दान करना चाहिए। (३६)

केशव या मन्दिर बनवाने याला मनुष्य शाश्वत पुण्य- रोकों को प्राप्त करता है। पुप्प एय फ्रों से युक्त उद्यानों का दान करने वाला इच्छापूर्वक श्लाघ्य भोगों का उपभोग करता है। (३७)

विष्णु के मन्दिर का निर्माण परयाने पाला पुरप अपने पितामह से आगे ये आठ पुल पुरुषों का उद्धार करना है। (३०)

हे दैत्य ! यदुष्ठ योगयुक्त तपस्वी ज्यामघ के सम्मुग्य पितरों ने इस गाथा का गान किया था। (३९)

पया हमारे कुल में पवित्र प्रतधारी ऐसा योई विन्यु भरू उत्पन्न होगा जो हरि का मन्दिर यनगयेगा? (४०)

पया हमारी सन्तति में पोई विष्णुमन्दिर में भक्ति- पूर्वक लेप और साडू देन पाटा धर्मारमा उत्पन्न होगा? (४१)

क्या हमारी सानियों में ऐमा पोई होगा जा फैशय मन्दिर में प्यना दान करेगा एवं यदेकारको

दीप, पुष्प और अनुलेपन प्रदान करेगा ? (४२)

महापातकी, पातकी अथवा उपपातकी व्यक्ति विष्णु मन्दिर को चित्रित कर पापमुक्त हो जाता है। (४३)

हे असुर! पितृगण के इस प्रकार के वचन को सुनकर उस नृपश्रेष्ठ ने पृथ्वी पर मन्दिर निर्माण करवाया एवं स्वयं उसमें लेप करता था।

यह फेदाप की विभूतियों, नाना प्रकार की धातुओं से निर्मित वस्तुओं तथा पाँच वर्ण के चित्रकों से केशव की पूजा करने लगा। (४५)

हे बलि! उसने वासुदेव के मन्दिर में स्वयं विधिपूर्वक सुगन्धित तेल एवं घृत से पूर्ण दीप का दान किया । (४६)

(उसने विष्णु मन्दिर मे) कुसुम्भ मञ्जिष्ठा के रस में रजिन श्वेत ए' रक्त वर्ण के तथा नव रगों वाले विविध प्रभार के ध्वजों का आरोपण किया। (४७)

( उसने ) पुष्पों, फलों, स्तापल्लयों तथा देवदार आदि विविध प्रकार के वृक्षों से पूर्ण उद्यानों का निर्माण (१८)

( उसने ) पाक्शालाध्यक्ष के विधान को जानने वाले एव रत्नसस्कार करने वाले अत्यन्त दुशल पुरुषों से अधिष्टित पड़े-पड़े मनों का निर्माण करवाया।उनमें प्रतिदिन यतियों, ब्रह्मचारियों, ज्ञानसम्पन्न | 4

श्रोत्रियों, दीनों, अन्धों एवं विश्लेन्द्रिय पुरुपों का पूजन होता था। (५०)

हम लोगों ने सुना है कि ऐसा कार्य करने से श्रद्धालु एवं जितेन्द्रिय राजा ज्यामघ विष्णु लोक गये। (५१)

हे बलि । विष्णुलोक जाने की कामना वाले पुरुप आज भी ज्यामघ द्वारा प्रदर्शित उसी मार्ग का अवलम्बन करते हैं। (५२)

अतः हे राजेन्द्र । तुम भी हरि का मन्दिर बनाओ एवं यत्नपूर्वक उन इरि, बहुश्रत ब्राह्मणों एवं विरोप रूप से सदाचारपरायण पवित्र पौराणिकों का अर्चन करो। (५३)

ऐश्वर्य रहने पर वस्त्र, आभूषण, रत्न, गौ, पृथ्वी एवं स्वर्णादि द्वारा चक्रधर देव को प्रसन्न करो। (५४)

तुम्हारे इस प्रकार की क्रिया करने में रत रहने पर मुरारि निश्चय ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। हे घलि ! अनन्त अच्युत विमु जगन्नाथ का आश्रय प्रहण  करने वाले व्यक्ति दुसी नहीं होते। (५५)

पुलस्त्य ने कहा-पलि से इस प्रकार सत्य एवं भेट वचन कहने के उपरान्त पूर्णकाम, हरिवरणानुरागी

दितीश्यर प्रहलाद बलि द्वारा की गयी पूजा स्वीकार कर विमुक्तिमार्गगामी हो गए।

प्रसन्न पितामह प्रहलाद के चले जाने पर बलि का भवन चन्द्रवन् प्रकाशित होने लगा। महामहिम उस (पलि ने) विश्वकर्मा से केशर का मन्दिर बनवाया। (५७)

बलि स्वयं अपनी पत्नी के साथ उस देयालय में मार्जन, लेपन आदि क्रियाएँ परने लगा। मधुसूदन के लिए महात्मा पलि ने जी एवं शाकर आदि का उत्तम नैवेद्य अर्पित किया।(५८)

विशालाक्षी विध्यारली स्वयं विष्णुमन्दिर में दीपदान करने लगी। पुरिमान मलि पुराणवेता श्रेष्ठ सामगों से धर्मयुक्त प्रवचन परयाते थे। (५९)

उस प्रपार के धर्ममार्ग में स्थित असुरभेष्ट पलि के रक्षणार्थ दिव्यशरीरधारी जगत्पति महात्मा जनार्दन स्थित हुए।(६०)

वे द्वार पर रहते हुए अयुत सूर्यों के तुज्य आभा याले मुसल को लेकर दुष्ट शत्रुओं के यूथपतियों का विनाश करते एवं प्रासरों से रक्षित बलि के गृह में किसी को प्रवेश नहीं करने देते थे। (६१)

सर्वगुणाभिराम विधाता नारायण के द्वारपाल होने पर पलि अपने प्रासाद के मध्य निरन्तर मुरों एवं ऋपियों में सर्वश्रेष्ठ नियामक हरि का अर्चन फरने लगा। (६२)

असुरराज बलि इस प्रकार हरि के पादपङ्कजों या पूजन करते हुए नित्य हरि के यचनों को स्मरण परता था। पद (नियम) उसके लिये विनयादृश हो गया। (६३)

इन्द्रतुल्य श्रेष्ठ अपने पितामह के कल्याणपद इस लोक तथा परलोक में हितगरी एवं तथ्य सुन्दर पचनों का स्मरण करते हुए यह धीर देत्यराज इस पृत्त (६४)

पूर्व में कठोरता पूर्वक कहे गए ए बाद में नवनीत के सरश निग्य एवं शुद्ध वृदयाश्यों का अवश्य कर