गालव-वृत्ताम्त चिचाङ्गदा द्वारा वेदवती से अपने वृसान्त का वर्णन वेदवती वृतान्त इन्द्रघुम्न प्रभूति द्वारा कन्याओ का अन्वेषण वृत्तान्त द्वारा जाबालि की जटाओ से मुक्ति र्कापरुपधारी विश्वकर्मा की शापमुक्ति इन्द्रद्युम्न आदि का सप्तगोदावर मे आगमन, कन्याओ द्वारा शिव की स्तुति, सप्तगोदावर में सभी का एकत्र सम्मेलग घृताची द्वारा चिवाङ्गदा को आश्वासन चारों कन्याओं का विवाह

कटी हुई शाखा के साथ भारवाही तपोधन बाण की सीढ़ियों के मार्ग से वृक्ष के नीचे उतरे । (७८)

राजा के धनुर्धारी पुत्र द्वारा अपने पुत्र की रक्षा हो जाने के उपरान्त ऋतमज भारवाही जाबालि के साथ सूर्य-पुत्री ( यमुना ) नदी के तट पर गए।(७६)

दण्डक ने कहा-हे बाले। इसी धीच यक्ष और अरुर दोनों की कन्याएँ योगियों में श्रेष्ठ श्रीकण्ठ महादेव का दर्शन करने आई।

उन ऋतध्वज के चले जाने के कारण उन दोनों ने देखा कि महादेव के (चतुर्दिक ) म्लान एवं शुष्क पुष्प तथा प्रचुर निर्माल्य पड़ा है।

तदनन्तर उस देवेश का दर्शन कर वे दोनों कम्पाएँ विधिपूर्वक अहोरात्र श्रीकण्ठ को स्नान कराने एवं उनस पूजन करने लगीं। (३)

उन दोनों के घहीं रहते समय गालव नामक ऋषि अव्यक्त स्वरूप श्रीकण्ठ का दर्शन करने के लिए इस वन में आये।(४)

उन्होंने दोनों कन्याओं को देखार 'ये किसकी कन्याएँ है ऐसा सोचते सुए कालिन्दी के विमल जल मे प्रवेश किया। स्नान करने के बाद पवित्र होकर गालव ऋषि ने श्रीकण्ठ महादेव की पूजा की। तदनन्तर यक्ष और असुर दोनों की कन्याओं ने मधुर स्वर से गान किया।

तदुपरान्त (उनके) स्वर को सुनकर गालव ने यह समझा कि ये दोनों निस्सन्देह गन्धर्व की कन्याएँ हैं। (७)

गालव ने विधिपूर्वक श्रीकण्ठदेव की पूजाकर जप

किया। तदनन्तर दोनों ग्याओं से अभिवादित होकर वे बैठ गये।

तत्पश्चात् उन मुनि ने पूछा-यह बतलाओ कि कुला- लकार स्वरूप एवं शंकर मे भक्ति करने वाली तुम दोनों किसकी कन्याएँ हो?

हे शुभानने ! दोनों कन्याओं ने मुनिश्रेष्ठ से यथार्थ वृत्तान्त बतलाया तब श्रेष्ठ तपस्वी गालव यो सम्पूर्ण वृत्तान्त विदित हो गया। (१०)

उन दोनों से पूजित मुनि ने यहाँ रात्रि में निवास किया। प्रातःकाल उठकर उन्होंने विधानपूर्वक गौरीश शंवर का पूजन किया। (११)

तदनन्तर उन दोनों के समीप जाकर उन्होंने कहा- में परमभेष्ठ पुपर घन मे जाऊँगा। मैं तुम दोनों की अनुमति चाहता हूँ। मुझे अनुमति दो। (१२)

तदुपरान्त उन दोनों ने कहा-हे प्रझन् । आपका दर्शन दुर्लभ है। आप आदर पूर्वक पुपरारण्य मे क्यों जा रहे हैं। (१३)

महतार्थ युक्त महातेजस्वी (मुनि) ने उन दोनों से पदा-आगे मासान्त में कात्तिरी पूर्णिमा होगी जो पुपर में दुप्पर पुण्यदायिनी है। (१४)

उन दोनों ने पहा-आप जहाँ जायेंगे हम भी यही चलेंगी। हे ब्रह्मन् । आपके बिना हम यहाँ नहीं रह सकतीं। (२५)

पिश्चेष्ट ने कहा-ठीक है। तदनन्तर महेश्वर को प्रणाम कर ऋपि के साथ वे दोनों आदर पूर्वक पुप्फरारण्य (१६)

वहाँ केवल उन ऋतम्बज पो छोड़कर सहस्रों ऋपि, राजा एवं जनपद निवासी एकत्रित हुए। (१७)

तदनन्तर ऋपियों एवं नाभाग तथा इक्ष्याकु आदि महाभाग्यवान राजाओं ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुमर तीर्थ मे स्नान किया। (१८)

गालय भी उन दोनों कन्याओं के साथ धनुप के समान आकार वारे मध्यम पुष्कर तीर्थ में स्नान करने के लिये उतरे।(१९)

(जलम) निमग्न होने पर उन्होंने देखा कि एक महा- मत्स्य जल में स्थित है एवं अनेक मत्स्य-यन्याएँ यारंवार उसे प्रसन्न करने में रगी है। (२०)

उस मस्य ने इन (मठलियों) से कहा-मुग्ध होने के कारग तुम सभी धर्म नहीं जानती। में वीरग एवं भयङ्कर जनापवाद नहीं सहन फर सरना । (२१)

उन सभी (मदलियों) ने कहा-क्या तुम दो कन्याओं

के साथ यथेच्छ विचरण करने वाले तपस्वी गाल्व को नहीं देख रहे हो? (२२)

यदि धर्मात्मा एव तपस्वी होते हुए भी वे जनापवाद से भयभीत नहीं होते तो जल में रहने वाले आप क्यों डर रहे हैं? (२३)

तदनन्तर उस तिमि (मत्स्य) ने उनसे कहा- यह रागान्ध तपस्वी जनापवाद को नहीं जानता एव मूर्खतावश जनापवादजन्य भय को भी नहीं जानता। (२४)

मरस्य के उस पचन को सुनकर गालब लज्जित हो गये। वे जितेन्द्रिय उपर नहीं आये, भीवर ही डूचे रहे। (२५)

वे दोनों सुन्दरियाँ स्नानोपरान्त जल से निकल कर तट पर खड़ी हो गई एव मुनिश्रेष्ठ के दर्शन के लिए उत्सुकता पूर्वक उनकी प्रतीक्षा करने लगी। (२६)

पुष्कर की यात्रा समाप्त होने पर सभी ऋपि, राजा और नगरवासी लोग जहाँ से आये थे वहाँ चले गये। (२७)

वहाँ केवल सुन्दर दातों वाली एव शोभनाङ्गी विश्वकर्मा की पुत्री चिनागदा उन दोनों वृशोदरी (कन्याओं को) देखती हुई खड़ी थी। (२८)

ये दोनों भी देखती हुई एव गालब री प्रवीक्षा करती हुई

निर्जन तीर्थ में खड़ी रहीं एवं गाल्ब जल के भीतर ही रहे। (२९)

तदनन्तर वेदवती नामक गन्धर्य-कन्या यहाँ आई। वह साध्वी घृताची के गर्भ से उत्पन्न पर्जन्य नामक गन्धर्व की पुत्री थी। (३०)

उसने आफर मध्यम पुष्कर तीर्थ के पवित्र जल मे स्नान किया और दोनों तटों पर अपस्थित तीन कन्याओं को देखा।

तदनन्तर चिनागदा के पास जाकर उसने मृदुता पूर्वक पूछा-तुम कौन हो ? किस कार्य से इस निर्जन स्थान मे स्थित हो? (३२)

उस (चित्रागदा) ने उस ( वेदवती ) से कहा-हे सुन्दर नितम्बोंवाली । मुझे देवशिल्पी विश्वकर्मा की चिनागदा नाम से प्रसिद्ध पुनी जानो । (३३)

हे भद्रे। वह (मैं) नैमिष में धर्म की जननी काचनाक्षी नाम से विख्तात पवित्र नदी में स्नान करने गई थी) यहाँ जाने पर विदर्भ-वशीय राजा सुरथ ने मुझे देखा और कामात होकर मेरी शरण में आया । (३५)

ससियों के मना करने पर भी मैंने सन्हें आत्मसमर्पण कर दिया। तदनन्तर पिता के शाप से मैं राजा से वियुक्त

हो गयी। (३६)

हे भद्रे । मैंने मरने का विचार किया किन्तु गुह्यक ने मुझे रोक दिया। उसके बाद मैं श्रीकण्ठ के दर्शन हेतु गई और यहाँ से गोदावर जल के निकट गयी। (३७)

यहाँ से मैं इस श्रेष्ठ उत्तम तीर्थ मे आयी। किन्तु ये मन को प्रसन्न करने वाले पति सुरथ मुझे नहीं दिखलाई पड़े। (३८)

पाले। यानाफल समाप्त हो जाने पर आज यहाँ आने वाली आप यौन हैं? हे भामिनि । मुझे सत्य सत्य बताओ। (३९)

उसने पहा-दे पृशोदरि। मैं मन्दागिनी पौन तथा यात्रापल समाप्त होने पर पुष्कर मे क्यों भाइ हूँ, उसे सुनो। (१०)

में पृताची के गर्भ से उत्पन्न वेदवती नामक पर्जन्य को पुत्री हूँ। हे ससि। धनप्रदेश में घूम रही मुसको एक यानर ने देखा। (४१)

उसने समीप आरर कहा-तुम कौन हो । यहाँ जा।। रही हो ? (निश्चय ही तुम) देवरती हो। पृथ्वी पर स्थित थाम से मेरु पर्वत पर तुम्हें कौन लाया है ? (४२)

इस पर मैंने कहा-हे यानर । में देवपती नहीं हूँ

मेरा नाम वेदयती है । में मेरुपर्वत पर ही रहती हूँ। (४३)

तदनन्तर उस अति दुष्ट यानर ने मेरे ऊपर आक्रमण कर दिया। मैं सहसा यन्धुजीव के उत्चम वृक्ष पर चढ गयो। (४४)

उसने भी वेगपूर्वक पैर से प्रहार कर वृक्ष को तोड़ दिया। तदनन्तर में उसरी एक बड़ी शासा को परड़ पर स्थित रही।(४५)

तदुपरान्त वानर ने उस वृक्ष को समुद्र के जल में फेंक दिया। में अत्यन्त व्याकुल होपर उस वृक्ष के साथ ही जल में गिर पड़ी। (४६)

तदनन्तर सभी घराचर प्राणियों ने आगश से गिरने वाले उस वृक्ष को देखा। (४७)

तत्पश्चात् मुझसे गिरता देसार सभी लोग हाहाकार करने लगे। सिद्ध और गन्धयं लोग कहने लगे-हाय । यह कष्ट की पात है। ब्रह्मा ने स्वय कहा है कि यह कन्या मनु के योर पुन सहस यहां के कर्वा इन्द्रद्युम्न की महिषी होगी। (१८-४९)

इस मधुर यागी को सुनने के उपरान मुझे मूच्या आ गई। मैं नही जानी रि क्सिने उस वृक्ष को सहस्रों टुरदों में काट डारा। (५०)

तदनन्तर अग्नि के मित्र पलयान यायु बेगपूर्वक मुझे

यहाँ लाये है । हे सुन्दरी! तुमसे आज यहाँ मेरो भेट हुई है।

इसलिए उठो, हम दोनों चलें, पूँछे और देखें कि पुष्कर तीर्थ के उत्तरी किनारे पर विद्यमान ये दोनों कन्याएँ कौन है? (५२)

ऐसा कहकर कार्य में उत्सुक वह सुन्दरी उस सुन्दर वथा वृश अगवाली कन्या के साथ दोनों कन्याओं को देखने तथा पूछने के लिए यहाँ गयी । (५३)

तदनन्तर वहाँ जारर उसने पूछा। उन दोनों ने अपना यथार्थ वृत्तान्त उन दोनों से कहा । (५४)

तदुपरान्त चारों कन्यायें सप्तगोदावर के जल के निकट जार हाटकेश्वर की पूजा करती हुई वीर्थ में रहने लगी।

तदनन्तर शकुनि, जाबालि और ऋतचज ये तीनों व्यक्ति उन कन्याओं के लिए अनेक वर्षों तक भ्रमण परते रहे।

तदुपरान्त एक सइस वर्ष व्यतीत हो जाने पर भार पाही खिन्न (जाबालि) उदास होकर पिता के साथ शाकल जनपद में चले गये। (५७)

वहाँ मनु के पुत्र श्रीमान् राजा इन्द्रद्युम्न नियास कर रहे थे। समाचार जानकर वे अर्धपात्र हाथ मे लिए  बाहर निकले।

उन्होंने जाबालि और ऋतधज की विधि पूर्वक सुन्दर ढग से पूजा की तथा उस इक्ष्वाकुनन्दन बुद्धिमान भतीजे शकुनि की भी पूजा की। (५६)

तदनन्तर अउत्तध्वज मुनि ने इन्द्रद्युम्न से कहा- राजन् । नन्दयन्ती नाम से विख्यात हम रोगों की अबला कन्या खो गयी है। (६०)

हे राजन् ! उसके लिए हमलोगों ने वसुधा का भ्रमण किया है। इसलिए उठिए, खोजिए और हमारी सहायता कीजिए।(६१)

सदुपरान्त राजा ने कहा-हे ब्रह्मन् । मेरी भी एक उत्तम कन्या खो गयी है। उसको सोजले मे में परिश्रम कर चुका हूँ। मैं उसके विषय में किससे कहूँ। (१२)

सिद्धों का वचन सुनकर आकाश से गिरने वाले पर्वताफार श्रेष्ठ वृक्ष को मैने घाणों से सहस्रों टुकड़ों मे काट डाला।

मैने कुशलता से उस सुन्दरी कन्या को चोट नहीं आने दी। मैं नहीं जानता कि यह कहाँ है ? अत उसे खोजने के लिए में चल रहा हूँ। (६४)

ऐसा कहने के उपरान्त वे राजा शीघ्रता पूर्वक उठे

वे रथों पर आरूढ होकर शीघ्रता से क्रमानुसार पृथ्वी पर अन्वेषण करने लगे। घरिवाश्रम मे पहुँच कर उन लोगों ने तप से कृश, धूल मिट्टी से भरे, जटाधारी जोर-जोर से साँस ले रहे एक तपोनिधि युवक को देखा। (६६-६७)

उसके समीप जाकर महापाहु राजा इन्द्रद्युम्न कहा-हे तपस्विन् । यह बतलाओ कि युवावस्था मे ही तुम सुदुश्चर घोर तप क्यों कर रहे हो? यह भी बतलाओं कि तुम्हारा क्या अभीष्ट है ? उसने कहा-आप मुझे यह पतलायें कि शोरा, अतिसिन्न एव तपोन्वित मुमसे सौहार्द पूर्वक पूछने पाने आप कौन है ? एराने पहा-दे वरस्विर । हे विभो ! में मनु फा पुन एवं इस्या का प्रियभ्राता शारटपुर का राजा हूँ। सस राजा ने भी एनसे समरा पूर्व वृत्तान्त कह दिया । (६८-७२)

उपर्युक घातों को सुनकर राजर्षि ने कहा-शरीर मत छोड़ो। तुम मेरे भतीजे हो। आओ उस मुन्दरी का अन्वेपण करने चलें।(७२)

इतना पहफर उन्होंने उभरी शिराओं से आच्छन्न राजा फा आलिङ्गन किया एवं उन्हें रथ पर चढ़ा पर शीघ्र उन दोनों तपस्वियों के सामने पहुंचा (७३)

पुत्र के साथ ऋनभ्यज ने उन राजा को देखकर कहा-हे राजन् । आइये आइये, मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा। (७४)

आपने नैमिपारण्य मे जिस चित्राङ्गदा को देसा था उसे में ही सप्तगोदावर नामक तीर्थ में छोद आया (७१)

इस लिए आइए, हमलोग सुदेव के पुन के ही निमित्त चले । यहाँ पर हम लोगों की अन्य तीन कन्यायें मिलेगी।

ऐसा कहने के उपरान वे ऋपि सुदेव के पुत्र को सान्त्वना देकर एय शकुनि को आगे फर इन्द्रद्युम्न और पुत्र के साथ अश्र युक्त रथ से सप्तग्मेदापर वीर्य में जाने का उपक्रम किये जहाँ वे कन्यायें गयी थी। (७७-७८)

इसी योर कृशाद्गी घृताची शोकान्वित होरर अपनी कन्या सोलनी हुई उदयगिरि पर विचरण कर रही थी। (७९)

यहाँ अप्सरा यो यह यन्दर मिला। अप्सरा ने उससे पूछा-हे कपि! मुझसे सत्य यहो कि क्या तुमने बाटा को देखा है? (८०)

उसके उस पचन को सुनार उस कपि ने कहा-मैंने देववती नामक पालिस को देखा है एवं उसे कालिन्दी के मृगपक्षि समन्वित विमल तीर्थ में श्रीकण्ठ के मन्दिर के सम्मुस स्थित महाश्रम मे रक्खा है। मैंने तुमसे यह सत्य बात कही है। (८१-८२)

उसने (घृताची ने) महा-हे धानरराज । यह वेदवती नाम से प्रसिद्ध है देववती नहीं है। अस्तु, आओ, हम दोनों यहाँ पलें। (८३)

घृताची पी मात सुनकर वानर उछलता हुआ उसके पीछे-पीछे कौशिकी नहीं की ओर चला। (८४)

घे तीनों श्रेष्ट राजपि भी दोनों तपस्वियों (जापालि और तभ्यज) के साथ अत्यधिर वेगशाली रथों पर चढ़कर पौशिकी नदी के समीप पहुँचे।

वे लोगग्य से उतर पर स्नान करने के लिए नदी के समीप आये। घृताची भी उस परम पवित्र नदी मे स्नान करने थायी। (८६)

पानर भी एनरे पीछे पीछे आया और जावालि ने उसे देखा। देसमे ही उन्होंने पिता और महापली राजा से कहा-

हे तात! यह पही घेगयाम् पानर पुन आ रहा है जिसने पहले बलपूर्वक जटापाश के द्वारा मुझे वृक्ष मे बाँध (८८)

जापालि के उस पचन को सुनर अत्यन्त मुद्ध शकुनि ने वाणयुक्त धनुप लेकर यह वचन कहा- (८९)

हे वहन् ! मुझे आज्ञा दीजिए, हे तात! मुझसे कहिए कि क्या में अभी एक बाण से इस वानर को मार डाल। (९०)

ऐसा वचन कहने पर समस्त प्राणियों के हित मे तत्पर मपि ने शकुनि से अत्यधिक युक्ति-युक्त ४ वचन कहा- (६१)

हे तात! कोई किसी को न तो पाँधवा और न मारता ही है। हे नृपतिनन्दन  और पन्धन पूर्व- वर्माधीन होते हैं। (६२)

शकुनि से ऐसा कह कर मुनि ने वानर से कहा- हे वानर ! आओ, आओ। तुम हम लोगों को सहायता पर सस्ते हो। (९३)

हे याले। मुनि के ऐसा कहने पर सस श्रेष्ठ फपि ने हाथ जोद कर प्रणाम करसे हुये यह कहा-हे ब्रह्मन् ! मुझे आशा दीजिए कि मैं क्या करूँ? (९४)

उसके ऐसा कहने पर मुनि ने उस पानरपति से यह

वे पांचो श्रेष्ठ लोग भी प्रसन्नमन से रथ द्वारा मध्याह के समय सप्तगोदावर जल के उस तीर्थ में पहुंचे। (१११)

यहाँ जाफर वे शीघ्रता पूर्वक विश्राम करने के लिए नीचे उतरे। उनके सारथियों ने भी स्नान किया एवं घोडों को जल पिलाकर रमणीय वन प्रदेश में विचरण करने के लिए छोड़ दिया । मुहूर्त भर में ही हरियाली से पूर्ण स्थान मे वे घोड़े वृत हो गये। तदनन्तर वे सभी (घोड़े) उत्तम देवायतन के निकट दौडने लगे। घोड़ों के खुर काशब्द सुनकर श्रेष्ठ स्त्रियां 'यह क्या है ऐसा पहपर हाटकेश्वर (फे मन्दिर में) गई एवं छत पर चढ़कर सभी ओर देखने लगीं। (११२-११५)

एन कन्याओं ने तीर्थ सलिल में स्नान करते हुए उन श्रेष्ट पुरुषों को देखा। तदनन्तर चित्राङ्गदा ने जटामडल-धारी सुरथ नृपति को देखा एवं रोमाचित होकर हँसती हुई ससी से कहा- (११६)

नील मेघ के वर्ण वाटा यह जो दीर्घबाहु सुन्दर युवा पुरुप दिसलाई पड़ता है निश्चय ही उसी राजपुत्र पो मैंने पहले पतिस्प से परण किया था।

इसमे कुछ विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि स्वर्णतुल्य वर्ण वाले जो व्यक्ति श्वेत जटाभार को धारण कर रहे है वे निश्चय ही तपस्वियों मे श्रेष्ठ ऋतध्वज्ञ है। (११८)

तदनन्तर नन्दयन्ती ने ससियों से प्रसन्न होकर कहा- वह दूसरा व्यक्ति निस्सन्देह इन्हीं ऋतधज का पुन जापालि है। (११६)

ऐसा रहार वे सभी छत से उतरी एव शंकर के सम्मुख बैठार कल्याणकारी (निम्न) गीत गाने लगी। (१२०)

हे शर्व! हे शम्भु। हे त्रिनेत्र ! हे चारुगात्र! हे त्रैलोक्यनाथ । हे उमापति। है दक्षयज्ञविध्वंसकर! कामाङ्गनाशन ! हे घोर ! हे पाप प्रणाशन ! हे महापुरुष ! हे महोप्रमूर्ति। हे समस्त प्राणियों के क्षयकारी ! हे शुभकर! हे महेश्वर ! हे त्रिशूलघारिन् ! हे रमरारि ! हे गुहार सिन् ! हे दिगम्बर- हे महाशशेखर ! हे जटाधर ! हे कपालमाला विभूषित शरीर! हेपामचक्षु! हे घामदेष ! हे प्रजाभ्यक्ष ! हे भगाक्षि के क्षयकारी! हे भीमसेन ! है

महासेननाथ । हे पशुपति ! हे कामागदहन ! हे चत्वर- यासिन् ! हे शिव ! हे महादेव ! हे ईशान ! हे शङ्कर ! हेभीम ! हे भव !हे वृपमध्यज! हे जटिल ! हे प्रौढ़ ! हे महानाट्येश्वर ! हे भूरिरत्न ! हे अविमुक्तक! हे रद्र! हे रुद्रेश्वर ! हे स्थाणु ! हे एक लिङ्ग ! हे कालिन्दीप्रिय ! हे श्रीकण्ठ! हे नीलकण्ठ ! हे अपराजित! हे हे रिपुभयङ्कर ! हे सन्तोपपति! हे वामदेव! हे अघोर ! हे तत्पुरप! हे महाघोर! हे अघोरमूर्ति ! हे शान्त ! है। सरस्वतीकान्त ! हे कीनाट ! हे सहसमूनि ! हे महोद्भव ! हे विमो! हे काराग्निस्ट! हे रुद्र! हे हर! हे महीधरप्रिय ! हे सर्व तीर्थाधिवास ! हे हंस! हे कामेश्वर ! है केदाराधिपति ! हे परिपूर्ण ! हे मुचुकुन्द ! हे मधु-निरासिन् ! हे कृपाणपाणि! हे मयङ्कर! हे विद्याराज! हे सोमराज!हे कामराज!हे रसक ! हे अजनराजकन्याहृद- पलयसति ! हे समुद्रशायी ! हे गजमुख ! हे घण्टेश्वर ! हे गोकर्ण! हे प्रायोनि! हे सहस्रपत्राक्षिचरण! हेहाटकेश्वर! आपको नमस्कार है।

इसी बीच समस्त ऋपि ए राजालोग त्रैलोक्यकर्ता, त्र्यम्बक हाटकेश्वर का दर्शन करने यहाँ पहुंचे। (१२१)

स्नानोपरान्त ऊपर चढ़ने पर उन लोगों ने देवता के सम्मुख बैठकर गीत गाती हुई स्त्रियों को (१२२)

तदनन्तर सुदेव के पुत्र अपनी प्रिया विश्वकर्मा की पुत्री को देखकर प्रसन्नता से पुलकित हो गये। (१२३)

योगी ऋतथ्वज भी तन्वङ्गी चित्रागदा को वहाँ स्थित देस तथा पहचान कर अत्यन्त आनन्दित (१२४)

तदनन्तर सभी लोग शीघ्र ही देवाधिदेव हाटकेश्वर के समीप गए एवं त्रिलोचन की पूजा कर सड़े होकर स्तुति करने लगे। (१२५)

टन ऋतध्वज आदि को देखकर चित्राङ्गदा ने भी उन शाही ( कन्याओं) के साथ उठकर प्रणाम (१२६)

पुत्र सहित टन तपस्वी ने उन्हें आशीर्वाद दिया एवं प्रसन्नतापूर्वक राजाओं सहित सुखपूर्वक बैठ (१२७)

हे सुन्दरी! तदनन्तर गोदावरीतीर्थ में स्नान कर

हाटकेश्वर के दर्शन का इच्छुक श्रेष्ठ कपि भी घृताची सहित यहाँ पहुंचा। (१२८)

तदुपरान्त घृताची ने अपनी शुभदर्शना कशाही पुत्री को देसा । यह सुन्दरी भी अपनी उस माता को देखकर प्रसन्न हुई। (१२६)

वदनन्तर घृताची ने अपनी पुत्री का गाद आलिङ्गन किया। अश्रुपूर्ण नेत्रों यारी (अपनी पुत्री) को यह बार बार स्नेह से ऍपने रगी। (१३०)

तत्पश्चात् श्रीमान् ऋतभ्यज ने कपि से पहा-तुम महाजन नामक गुबर को राने अअन पर्वत पर (१३१)

पाताल से धीर दैत्येश्वर पन्दरमाली को तथा स्वर्ग से गन्धर्यराज पर्जन्य को यहाँ शीघ्र लाओ। (१३२)

मुनि के ऐसा कहने पर देवरती ने पानर से कहा-हेपपिष्ठ गाय को भी आप यहाँ सायें। (९३३)

ऐसा कहे जाने पर पायुप्तदश परानम पाटापपि अञ्जन पर्यत पर गया एव (गुणक को) आमन्त्रित फर सुमेरु पर्वत पर चला गया। (१३४)

यहाँ टसने पर्जन्य को आमन्त्रित किया एप सप्त- गोदावर सीर्य में स्थित महामम में उन्हें भेजने पे पार पाताल पटा गया। (१३१)

वहाँ महापराक्रमी कन्दरमाली यो आमन्त्रित कर वेगवान वानर पाताल से निकलकर पृथ्वी पर विचरण करने लगा। (१३६)

माहिष्मती के निकट तपोनिधि गालव को देसार यह उछला एय शीघ्र उन्हें सप्लगोदार के जल के निस्ट ले आया। (१३७)

यहाँ विधिपूर्वर स्नान पर यह हाटकेश्वर के समीप पहुँचा एव नन्दयन्ती तथा देवरती को भी यहाँ बैठी हुई देसा। (१३८)

गारव को देसार उन सभी ने उठकर उनस अभिवादन किया। उन्होंने भी महादेव की पूजा कर महपियों को प्रणाम दिया। उन श्रेष्ठ राजाओं ने भी उन तपोधन को पूजा पी एवं अरयन्त प्रसन्न होकर सुसपूर्वक बैठ गये। उनके यैठ जाने पर धानर द्वारा आमन्त्रित यक्ष, गन्धर्य एवं दानर तीनों महात्मा यहाँ आए। उन्हें आया देसने ही उन विशालाक्षी पुगियों ये नेत्र स्नेहाश्रुपूर्ण हो गये। उन सभी ने अपने अपने पिता का आलिङ्गन किया। नन्दपन्ती आदि को पिता से युफ हुई देखकर विश्वकर्मा की मुन्दरी पुत्री के नेत्र भनपूर्ण

गये। तदनन्तर मध्यज मुनि ने उससे सत्यवचन कहा। (१३६-२४३)

हे पुत्री । विपाद मत करो। यह यानर तुम्हारा पिता है। उस वचन को सुनार वह जित हो गई। (१४४)

क्योंकि मुझ कुपुत्री के उत्पन्न होने से ये विश्वकर्मा इस समय यानर हो गये है अत में शरीर का त्याग करगी। (१४५)

मन में ऐसा विचार कर उसने शतम्घज से कहा- हे ब्रह्मन् । मुझ पापये कारण नष्ट घुद्धियालीका आप परिमाण करें। पितृयातिनी भरना चाहती हूँ।उद आप अनुमति दें। वय मुनि ने उस कृशानी से कहा-अब विपाद (४६-१४७)

भारी का नाश नहीं होता। अत शरीर का त्याग मत करो। घृताची के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो जाने पर तुम्हार पिता पुन देवताओं के शिल्पी हो जायेंगे। इसमें सन्देह नहीं। सयतचिच मुनि के ऐसा कहने पर घृताची ने चित्रासदा के समीप जाकर उससे कहा-हे पुनी। तुम शोक छोड़ दो। निस्सन्देह दस महीनों में तुम्हारे पिता द्वारा मुझ से एक पुत्र उत्पन्न होगा। ऐसा कहे जाने पर चिनानदा प्रसन्न हो गई। (१४८-१५१)

सुन्दरी (चित्राङ्गदा) अपने विवाह में मिलने वाले पिता के दर्शन की प्रतीक्षा करने लगी। वे सुन्दरी कन्यायें भी प्रिय की प्राप्ति की कामना से उनके ही विवाह के समय की प्रतीक्षा करने लगीं। दस मास व्यतीत हो जाने पर अप्सरा ने उस गोदारीतीर्थ में नल नामर पुत्र को जन्म दिया। पुन पत्पन हो जाने पर विश्वकर्मा भी कपित्व से मुक्त हो गये (१५२-१५४)

अपनी प्रिय पुत्री के समीप जार उन्होंने उसका आदरपूर्वक आलिङ्गन किया। तदन्तर प्रसन्न मन से देव शिल्पी ने देवताओं एष किन्नरों सहित सुराधिप इन्द्र का स्मरण किया। त्वष्टा के स्मरण करने पर इन्द्र मरुद्गणों, देवों एव रुद्रों के साथ हाटक नामक तीर्थ में आये । देवताओं, गन्धों और अप्सराओं के आने पर इन्द्रद्युम्न ने मुनिश्रेष्ठ तध्वज से कहा-हे प्रहन् । जावालि को कन्दरमाली की कम्या प्रदान करें। आपका पुत्र विधिवत् दैत्यनन्दिनी का पाणिग्रहण करे। स्वरूपवान् शकुनि नन्दयन्ती से विवाह करें। (१५५-१५९)

यह वेदवती मेरी तथा स्वष्टा (विश्वर्मा) की पुत्री (चित्राङ्गदा) सुरथ की पत्नी हो। मुनि ने मनुपुत्र राजा से यहा-ठीक है। (१६०)

तदनन्तर उन लोगों ने आनन्दपूर्वक भलीभाँति विवाह की विधि को सम्पन्न किया। विधिपूर्वक हव्य या हवन कर गालव ऋत्विक बने। (१६१)

एस समय यहाँ गन्धयों ने गाना गाया और अप्स-राओं ने नृत्य किया। सर्व प्रथम दैत्यकन्या ने जावालि का पाणिग्रहण किया। (१६२)

हे कल्याणी ! तदनन्तर इन्द्रद्युम्न ने विधिपूर्वक वेद- यती का, शकुनि ने यक्ष-कन्या का तया सुरथ ने चिनागदा का पाणिग्रहण किया। हे यशोदरी ! इस प्रकार मम से वियाहार्य पूर्ण हुआ। (१६३-१६४)

वियाहार्य सम्पन्न हो जाने पर मुनि (ऋतध्वज) ने इन्द्र आदि देवताओं से कहा-इस सप्तगोदावरतीर्थ में आपलोग सदा निवास करें। विशेप रूपसे इस उत्तम वैशास मास में आप लोग यहाँ अवश्य रहें। देवता लोग 'ऐसा ही हो' यह कर आनन्द से स्वर्ग चले गये। (१६५-१६६)

मुनिलोग पुत्र सहित मुनि (मृतध्वज) को सम्मान के साथ लेकर चले गये। राजा लोग भी अपनी-अपनी पत्नी लेकर अपने नगर में आ गये। (१६७)

सभी लोग प्रिय विषय या उपभोग करते हुए सुख पूर्वक रहने लगे। हे फ्ल्याणि! चित्रागदा का पूर्व वृत्ता इस प्रकार का है। अतः हे कमलनयना ललनोत्तमा! तुम मुझे स्वीकार करो। (१६८)

ऐसा कहकर राजपुत्र (दण्ड) प्रामण की उस सुन्दरी मृगाक्षी पुत्री की कोमलवाणी से स्तुति करने लगे। उसने भी राजा से कहा। (१६६)