वामन महा पुराण
बलि-शुक सवाद में कोशकारसुत की कथा
पुलस्त्य ने कहा-हे महाप! तदनन्तर वामन रूपधारी वासुदेव के आने पर पृथ्वी कम्पित होने लगी, पर्वत विचलित हो उठे, समुद्र आन्दोलित हो गये एय आकाश में तारा समूह की गति अस्त-व्यस्त हो गयी । (१)
यज्ञ भी अत्यन्त व्याकुल होकर सोचने लगा- न जाने मधुसूदन वासुदेव आकर मेरा क्या करेंगे? जैसे महेश्वर ने मुझे दग्ध कर दिया था, क्या वासुदेव भी वो मुझे वैसे ही दग्ध नहीं कर देगें ? (२)
द्विजेन्द्रों द्वारा भक्ति पूर्वक ऋगवेद एव सामवेद के मन्त्रों की आहुतियों से हुत यज्ञीय भागों को अग्नि विष्णु के भय से नहीं ग्रहण कर रहे थे ।
उन भयङ्कर उत्पातों को देखकर दानवेश्वर (बलि) ने उशना शुक्राचार्य को प्रणाम कर तथा हाथ जोड़कर (४)
हे आचार्य ! पर्वतों सहित पृथ्वी वायु से आहत
केले के वृक्ष सदृश क्यों कम्पित हो रही है एवं अग्नि भी भली भाँति आहुत आसुरीय भागों को क्यों नहीं ग्रहण कर रहे है? (५)
समुद्र क्यों क्षुब्ध हो उठे है? आश मे नक्षत्र पूर्ववत् क्यों नहीं सचार कर रहे है एव दिशाएँ क्यों अन्यार से आवृत हो गयी हैं। हे गुरु! मुझे यह बतलाएँ कि किसके दोष से यह सब हो रहा है ?
पुलस्त्य ने कहा-विरोचन पुत्र द्वारा कहे गये उस याक्य को सुनने के उपरान्त कारण को जानकर शुक्र ने बलि से कहा। (७)
शुक्राचार्य ने कहा-हे दैत्येश्वर । सुनो। निश्चय ही वासुदेव आ रहे है। इसीलिये अग्नि मन्त्र के द्वारा हुत होने पर भी आसुरीय भागों को नहीं ग्रहण कर रहे है। (८)
हे दितीश उनके पदक्षेप का भार सहन न कर सक्ने के कारण पर्वतों सहित पृथ्वी पम्पित हो रही है।
हेदितिज! पृथियो के विचलित होने से ये समुद्र आज सीमा का स्टपन पर गये हैं।
पुत्पत्य ने पहा-गुफ का वचन मुनर पलि ने भार्गय से धर्मयुक्त, सत्य, हितप्रद और सभी प्रशर के एत्माद से युक्त पचन कहा। (१०)
पछि ने पदा-दे भगवन् ! यामुदय के आने पर मेरे फरने योग्य पर्ग, पाम एवं अर्थ फे. सत्त्य को पतटा में बन्द गणि, स्वर्ण, पृषी, दाधी अपया अप में से पया दान १ में मुरारि से पया का ? अपना अयया उना या दिन मापन पर आप मुझे हितकारी, गुम पया प्रिय तथ्य पतला। मैं यही पगा, अग्य पुनदी कगा। (११)
पुराग ने पा-६ मारद' देगनाय द्वारा पहे गए पर श्रेष्ठ पपन पो गुनने पं. नपरान विचार पर भूत एमविश्यमाना मार्ग ने कहा- (१२)
गुमने पति द्वारा प्रतिपादित मार्ग में पदिसत भारेमो पामंशा पनापार एवं मुति प्रमानानुमार ।
मसभोगी देयों को पहिणत पर दिया है। इसी कारण से हरि आ रहे हैं।
हे दैत्य ! तुमने मुझसे जो यह पूया है कि यामे उनके आने पर यया यरना चाहिए, (इसके विषय में मेरा यह कहना है कि) या में तृण के अपभाग ६ परायर भी पृथ्वी या मुपांदि उन्हें नहीं देना चाहिए। १४)
उनसे इस प्रसर या अर्थहीन मामयुक्त पचन पदना पाहिए कि हे पिभो ! जिसरे पदर में मूलोप, गुपोंक एवं स्थलों के अधिपति तथा रमाराल के स्वामी मिरण नियास पर है ऐसे आप पो दान देने में कौन समर्प है?
पलि ने पहा मार्गय ! आपारदीन यापर के आने पर भी मैंने पद पपन नही पा कि मेरे पास नही है और में देना नहीं पाता। आः सोग्गली जनान यापरु पनार आने पर में गिा केंगे पद गस्तार पिमां! मननों पं द्वारा पदासा मारा ग्मोर गुना जाता है कि परीक्षा पास
मनुष्य को ब्राह्मणों के प्रति सद्भाय रसना चाहिए। हे ब्राह्मणपुंगव ! और यह भी प्रतीत होता है। (१७)
वचन, शरीर एधं मन द्वारा किये गये मनुष्यों के कर्म दूसरी योनियों में भी पूर्व के अभ्यासवश स्फुटरूप से प्रकट होते है। (१८)
हे द्विजश्रेष्ठ! प्राचीनकाल मे मलयाचल पर घटित कोशकार के पुत्र की प्राचीन कथा को क्या आपने नहीं (१९)
शुक ने कहा-हे महाबाहु ! कोशकार के पुत्र सम्बन्धी पवित्र प्राचीन कथा को कहो। मुझे महान कौतूहल हो रहा है। (२०)
यलि ने कहा-हे भृगुकुलश्नेष्ठ ! पूर्वाभ्यास से संबद्ध इस सत्य कथा को में यज्ञ में कह रहा हूँ। आप श्रवण (२१)
हे ब्रह्मन् ! महर्षि मुद्गल का कोशकार नाम से विख्यात ज्ञान विज्ञान सम्पन्न एक तपस्वी पुत्र था। (२२)
उसकी पत्नी का नाम धमिष्ठा था। वह चाल्यायन की कन्या, साध्वी, सती, धर्मशीला तथा पतिव्रता थी। (२३)
उसी स्त्री के गर्भ से उसो एक पुत्र हुआ, जो स्वभाव से ही जद आकार वाला था। गूंगे व्यक्ति की भाँति न यह योलता था और न अन्धे की भाँति देखता ही (२४)
अपने उस उत्पन्न पुत्र को जड़, मूंगा और अन्धा समझकर ब्राह्मणी ने छठे दिन उसे घर के द्वार पर फेक दिया। (२५)
तदनन्तर सूक्षी नाम की एक दुराचारिणी, नवजात चालकों को चुराने वाली राक्षसी अपने दुबले-पतले पुत्र को लेकर यहाँ आयी। (२६)
वहाँ अपने पुत्र को छोड़कर उसने ब्राह्मणपुन को उठा लिया। उसे लेकर खाने के लिए शालोदर नामक पर्वत पर गयी। (२७)
तदुपरान्त उसे आयी हुई जानकर घटोदर नामक उसके नेत्रहीन पति ने पूछा-हे प्रिये ! तुम क्या लायी हो ? (२८)
उसने कहा-हे राक्षसपति । हे प्रभो ! में अपने शिशु को कोशकार गुनि के घर मे रसकर उनके पुत्र को लायी हूँ। (२९)
राक्षस ने कहा-हे भद्रे! तुमने यह अच्छा नहीं किया। यह द्विजेन्द्र महाज्ञानी है। अतः यह कोधित होकर शाप दे देगा। (३०)
हे मुन्दरी! इसलिए शीघ्र इस भयंकर रूप वाले मनुष्य को छोड़ कर तुम किसी दूसरे के पुत्र को लाओ। (३१)
ऐसा कहे जाने पर यह कामचारिणी भयङ्कर राक्षसी आकाश में उड़ती हुई शीघ यहाँ गयी। (३२)
हे प्रदान् । गृह के बाहर छोड़ा गया पह गक्षस पुत्र भी मुरा में अँगूठा डालकर उच पर से रोने लगा, (३३)
चिरकालोपरान्त कन्दन पो सुनकर उस धर्मिया ने पति से कहा-हे मुनिश्रेठ! देखो यह, आपरा पुत्र शब्द करने लगा। (३५)
हरयर पद तपस्विनी गृह के भीतर से पाइर गयी। उस माह्मणश्रेष्ठ ने भी सस शिशु को देसा । (३५)
अपने पुत्र के समान ही रंग रूप आदि से युक्त उस पालक यो देखने के उपरान्त कोशगर मुनि ने इस पर अपनी पत्नी से कहा। (३१)
हे धर्मिष्ठे। इस पालक के भीतर अवश्य भूत प्रविष्ट हो गया है। हम लोगों को धोखा देने के लिए मुग्दर रूपयाला कोई यहाँ विमान है। (३७)
ऐसा पहपर उप्त मन्त्रयेसा ने हाय में कुशा लेकर मन्त्रों के द्वारा भूमि को रेखादित पर रामसपुर को पाप दिया। (३८)
इसी बीच सूक्षी यहाँ पहुँची एवं अदृश्य रूप में गृह से दूर स्थित होकर उसने ब्राह्मण के बालक को पचा। (३६)
फेंफते ही कोमार ने अपने उस पुत्र को परड़ लिया। फिन्तु यह राक्षसी यहाँ जारर अपने पुत्र वो नही पकड़ सकी। (४०)
दोनों ओर से भ्रष्ट होकर यह अपने पति के पास गयी और अपने पुत्र तथा ब्राह्मणपुत्र दोनों के सोने का वृत्तान्त यह सुनाया। (४१)
हे ब्रह्मन्। इस प्रकार राक्षसी के चले जाने पर महात्मा बादाम ने अपनी पत्नी को यह राक्षस-पुत्र दे दिया।
और पिता ने अपने पुत्र को सरसा थपिला गाय के दूध, दधि एवं ईप के रस से पाला-पोसा। (४३)
दोनों ही पाटक यदरर सात वर्ष थे हो गए। पिता ने उन दोनों का नाम निशारा दिपार एस। (४४)
रामसपुत्र का नाम दियारीर्ति और माझग पुत्र का नाम निशाणीति था। प्राग ने मम दोनों का यतोपथीत गार किया। (४२)
प्रत-यन्ध हो जाने पर दिवार वेदपाठ करने लगा। किन्तु निशाकर जड़ता के पारण वेदपाठ नहीं करता था। ऐसा हम लोगों ने सुना है। (४६)
माता, पिता, भाई, बन्धुजन, गुरु एवं अन्य मलयवासी लोग उसपी निन्दा करने लगे। (४७)
तदनन्तर पिता ने मुद्ध होकर उसे निर्जल कूप मे फेक दिया एवं उसे एक बड़ी शिला से ढंक दिया। (१४)
इस प्रकार कुएँ मे फेंके जाने पर वह पालक यहाँ अनेक वर्षों तक रहा। उस कुएँ मे एक आँवले का वृक्ष था। उस बालक के पोषण के लिए उसमे फल लग गये। (४६)
हे भार्गव! तदनन्तर दस पर्प बीत जाने पर उसकी माँ उस अन्धकार पूर्ण तथा पत्थर से ढके हुये कुएँ के पास (५०)
उसने पर्वत के समान शिला से ढंके कुएँ को देखकर ऊँचे स्वर से कहा-कुएँ के उपर इस पत्थर को किसने रसा है? (५१)
कुएँ के भीतर अपस्थित पुत्र निशार ने माता की याणी सुनकर कहा-मेरे पिताजी ने फुएँ पर इस शिला को रया है। (५२)
यह अत्यन्त भयभीत होकर बोलीं-कुएँ के भीतर इस अपुर्व पर बाले तुम कौन हो? उसने कहा- में निशाार नामक तुम्हारा पुत्र हूँ। (५३)
उसने रहा-मेरे पुत्र का नाम तो दियाफर है। निशार नाम या मेरा कोई पुत्र नहीं है। (५४)
उस बालक ने माता से अपना समस्त पूर्व वृत्तान्त महा। उसे सुनने के उपरान्त माता ने उस शिला को उठार दूसरी ओर फेक दिया।
हे भगन् । उस बालक ने पुएँ से ऊपर उठकर माता के चरणों की वन्दना की। उसने अपने से उत्पन्न एवं अपने अनुरूप पुन को सम्मुस देसा । (५६)
तदनन्तर उस पुत्र को लेकर मिया पति के समीप गयी एव अपने पुत्र के सम्पूर्ण चरित को उससे (५७)
तदनन्तर उस ब्राह्मण ने पूछा-हे पुत्र! तुम पहले नहीं बोले, इसरा क्या कारण है? मुझे बहुत कुतूहल हो रहा है। (५८)
उस बात को सुनकर बुद्धिमान पुत्र ने ब्राह्मण श्रेष्ठ कोशकार था माता से अद्भुत वचन कहा।
निशाकर ने कहा-हे निष्पाप पिता ! मेरे द्वारा मूक्ता, जड़ता एवं अपने नेत्रों के अन्यत्य का आभय यरने का पारण मुनिये। (६०)
विप्र में पहले वृन्दारफ (सम्मानिन)श मे माला के गर्भ से उत्पन्न पापि का पुत्र था। (६१)
हे सार। पिता ने मुझे धर्म, अर्थ और पाम की सिद्धि ऐने याने ज्ञान सया इतिहास और वेद महित मोपदायक शासन को पढ़ाया। (६२)
है तात। में महासानी तपास मान और परलोक पान में विशारद था। रासे में अपार से अन्धा दापर दुपर्म में प्रवृत्त हो गया। (६२)
मद से मुहारोम हुआ। उससे मेरी प्रगामा नष्ट होगपी। पिफ पाना हो गया जिसमे में मह हो गया। (६४)
गहना ये पार पापी पन गया। मेरा मा गदा गरे को एप दूसरे के पन में आग रहने म्यगा। (६0)
पाकी के माप मग परत एवं परा पाल परने में पार न होने पर मैं मर पर शैल मे गया।
पर सहस पर्व के उपरान्त भोग से अपशिष्ट प्रस पाप के पारण में पशुपाती पापी व्यास दोपर अरण्य में उत्पन्न हुआ। (६७)
दे तात। पर प्रभाशयुक्त राजा ने व्याघ्रयोनि में स्थित मुझे पौध पर पिजद मे डाल दिया एवं अपने नगर मेहे गया। (६८)
व्यायोनिमात, पन्धन प्रस्त ण्य पिअरस्थ मुश समरन धर्म, अर्थ एप पाम सम्बन्धी शस्त्र प्रतिभासित हो रहे थे। (६९)
तदनन्तर यह घेष्ट राजा विसी ममय दाय में गदा रिये एम पाप धारण परमार से यादर पला गया। (७)
पृथ्वी में अप्रनिम स्प पारी उसयी जिना नामर भाषां धी। पनि पाएर जाने पर पद मेरे समीप आयी।
उसे देखकर पूर्वाभ्यास में पारण धर्मरामों पे शान की वृद्धि की भानि मेरे मन में काम की वृद्धि हुई। सदनकर मैंने उमारे करा- (७२)
भीर गुपयागी पीयनसनी मी! तुम मेरा पिरानी प्रारती हो जो पोति अपनी ध्यान योगी के पित्त राज परती है।
पर मुन्दरी ने मेरा पपन गुनकर फा- पाम !
हम दोनों का सम्भोग कैसे सम्भय है? (७४)
हे तात । तदनन्तर मैंने उस सुन्दरी राजपुत्री से कहा- तुम अभी पिजड़े का द्वार खोलो, में शीघ्र याहर निकल आऊँगा।
उसने कहा-हे व्याघ्र । दिन में लोग देखेंगे। रात्रि मे खोलूँगी, तब इच्छानुसार दोनों बिहार करेंगे। (७६)
मैंने पुन उससे रहा देर धरने में मैं असमर्थ हूँ। अत द्वार सोरो और मुझे पन्धन से मुक्त करो। (७७)
तदनन्तर उस सुन्दरी ने द्वार सोल दिया। द्वार सुलने पर मैं क्षणमान में बाहर निकला। (७८)
मैंने बलपूर्वक वेडी आदि बन्धनों को तोड डाला और उस राजा की पत्नी को रमण करने की इच्छा से पकड़ लिया। (७)
तदनन्तर राजा के अतुल पराक्रमशाली अनुचरों ने मुझे देखा और हाथ मे शस्त्र लेकर उन लोगों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया। (८०)
मोटी रस्सियों और साँकलों से घाँधार उन लोगों ने मुझे मुद्गरों से बहुत पीटा। मारे जाते समय मैंने उनसे कहा-तुम लोग मुझ मत मारो। (८०)
हे तपोधन। मेरा वचन सुनकर उन लोगो ने मुझे राक्षस समभा और वृक्ष मे कसकर बाँध कर मार डाला। (८२)
परस्त्री सेवन के कारण पुन मैं नरक मे गया। सहस्र वर्ष के उपरान्त मुक्त होने पर मैं श्वेतगर्दभ हुआ। (८३)
उस अवस्था मे मैं अनेक स्त्रियों यारे अग्निवेश्य नामर प्राह्मण के घर में रहता था। वहाँ भी पूर्वजन्मार्जित समस्त ज्ञान मुझे प्रतिभासित हो रहे थे। (५४)
ब्राह्मण के घर की स्त्रियों ने मुझे आदर से सवारी के कार्य में लगाया। एक समय उस ब्राह्मण की नवराष्ट्र देशीय विमति नामक पत्नी अपने पिता के घर जाने के लिए उत्सुक हुई। उसके पति ने उससे कहा---इस श्वेत गदहे पर आरूढ होकर चली जाओ। (८५-८६)
एक महीने के भीतर चली आना। उससे अधिक समय तक न रहना। पति पे ऐसा कहने पर वह सुन्दरी मेरे ऊपर सवार हुई।
हे मुने। बन्धन खोलकर वह तुरन्त चल पड़ी। तदनन्तर आधे मार्ग मे यह सुन्दरी मेरी पीठ से उतरकर नदी में नहाने के लिए उतरी। भीगे यस्त्र मे होने से
उसका स्प स्पष्ट दिमाई पड़ा। इसे अगोपांगों सहित रूपपती देगार में इस पर दोड़ा ।
मेरे पिटने पर पद पाल गयी पर गिर पड़ी। है तान । मैं भरपधिर आतुर दोसर सर उपर गिर (९०)
मन । स्यामी पं आदेश में उमस्त्री पंपो थाने या अपरने मुझे देगरिया और ठार पद पैग में मेरी और दीप पका।
इमामय में मनी को दोहार में मी दलिपी मेरमा। मुने। पनी दो मोरगानी योग पीपार यिस्ट हामी मेगगी। परी ६गा हुआ मैं रा प दाद (०२-९३)
मुंपुन मार सना का यह मे मुहर मेरी मदन भर में रिदुरामा पा ने सुनिया
पिच गार (नाने मु) मा परि पुत्र परिवाम में पुरायो निार गुमाया पर वासा नितिन पाने गमप से गुस्सा गया।
प्रतिदिन मुझे पापर, उल तमा अनार के पग के मोजन से पुट करने लगी। समय यणिर पुत्र पी फमन्दल मुल्प ने यो पारी यामा, विशाल स्तनों नया मुन्दर जपन य क्षीगाट पाली कल्याणी पन्द्रापली गामरप्रिया ने पिजड़े को संता।
उस पारदापिनी मुन्दरी में गुने देना दापों में से लिंग और अपने दोनों स्तनों पर मुगगरिया (९९)
उमरे दाद मैंने पन्द्रारी के माप विहार परने पर भार प्राट पिा। तय पापागर में घूमना सा उमरे हार में मांट पन्धन पी भानि धार र गा में पुन अरयम पापयुदने पं पारत पर मरर में गया।
मानगर में पेट र साराक पर में पाया। मोहनदिन मुरे गाड़ी में शरमा गादी पर मागं पाया गपा में जाने की पर मदमी पारस भाग पर मर पद पन्य। नमुना पित होगी। मैंने पोरेम पर देश भर
बात भूमि पनि पर
ससी में भरपन्न पलाने से में मर गया।
में पुन साहस प पर्यन नरफ में पदारहा। यहाँ । से में अपने पूर्व जन्म पा स्मरण करता हुआ आपरे गृह में रपम हुआ हूँ। (१०६)
मैं भाजही जन्मों का मन मरण कर रहा है। पूर्व अम्गामे मुरगानों थान तथा पायन हिरा। मा नो दोपर में मन, कर्म और पानी में भी पर पाररमो पाधापरणनदीपा।
शुभ, भाभ, पराभ्याप, शारीपिरा धन पा पर पूर्व अम्पास से ही दोन है। सा मनुष्य अप अफ पूर्व जाम पर रोमानो याद का पापो मेरमा। जामुने! एमट पाए लिए मेरा में पानी बार म गुर सि को पाप धर्म में ।
बलि ने पदा- मनि । गा परने के उपराम मागपिता को प्रणाम पर यह निर भगगन नारायण कं भेष्ठ गुपियान पवित्र नियास परिकामा में (११२)
मी प्रणा पूपाभ्यामया मनुष्य प दान एक अध्ययन मादिगार होने हैं। निजपर! सी में निगरसे में आप अपने पूर्व अभ्यास के सध्य रे पला गया।
रमाए। दार, तर, अम्पका, पोरी, सापानअग्निाद. मान, पा, अर्थ पर सभी पूर्वजन्मों में दापस । (११४)
पुरमाने-बापा सार साने गुरु और निपामर मा राप्रपुनरम के माया पानामा-गरमपारी नारागरा पान कराने लगा।