वामन महा पुराण
सरोमाहात्म्ये 24 स्थागुण तीर्थ, स्थाणुवट एव रथाग्गु-लिङ्ग का माहात्म्य
कर । हे कमलेशय । हे फुशेशय । हे हृदयेशय । हे ज्ञानो दधि। हे शम्भो । हे विभो । हे महायज्ञ । हे महायाक्षिक । हे सर्वयज्ञमय । हे सर्वयज्ञहृदय । हे सर्वयशसस्तुत । हे निराश्रय । हे समुद्रेशय । हे अत्रिसभव। हे भक्तानुक्म्पी। हे अभग्नयोग' हे योगधर। हे वासुकिमहामणि से विद्योतित विग्रह वाले । हे हरितनयन । हे त्रिलोचन । हे जटाधर । हे नीलकठा हे चन्द्रार्धधर। हे उमाशरीरार्धहर। हे गजचर्मधर । हे दुस्तरससार के महासहारकर | आप को नमस्कार है। हेभक्तननवासल ! आप प्रसन्न हों।
इस प्रकार श्रेष्ठ ऋपियों से युक्त सभी देवों के साथ पितामह ब्रह्मा के भक्तिपूर्वक स्तुति करने पर उन महात्मा ने इस्तिरूप का त्यागकर लिङ्ग में सन्निधान किया। (३६)
सनत्कुमार ने कहा-तदनन्तर महादेव ने पियों के समक्ष ब्रह्मादि देवों से उत्तम तीर्थमाहात्म्य को कहा। (१)
यह सानिहित नामक सरोवर महान पुण्यतम कहा गया है। मुझसे सेवित होने के कारण यह मुक्तिदायक है।(२)
यहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय एव वैश्य वर्गों के पुरुष लिङ्ग का दर्शन करने से परम पद का दर्शन करते हैं। (३)
समुद्र से लेकर सरोवर पर्यन्त सभी तीर्थ प्रतिदिन मध्याह्न के समय स्याणु तीर्थ मे आते हैं। (४)
इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक जो मनुष्य मेरी स्तुति करेगा
उसे निस्सन्देह मैं नित्य सुलभ होऊँगा।
यह कहकर भगवान प्रभु रुद्र अन्तहित हो गए। सभी देवता और ऋषिगण अपने अपने स्थान को चले गये। (६)
तदनन्तर सम्पूर्ण स्वर्ग मनुष्यों से भर गया। स्थाणु- लिङ्ग का यह महात्म्य है कि उसके दर्शन से मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है। (७)
वदुपरान्त सभी देवता ब्रह्मा की शरण मे गए। तब ब्रह्मा ने उनसे पूछा-आप लोग किस लिए यहाँ आए है? (८)
तदनन्तर सभी देवों ने यह वचन कहा हे पितामह । हम लोगों को मनुष्यों से तीन भय हो रहा है। हमारी आप रक्षा करें। (९)
तदनन्तर देव-श्रेष्ठ ब्रह्मा ने उन देवों से कहा-“हे इन्द्र । सरोवर को शीघ्र धूलि से भर दो और अपना अभीष्ट सम्पन्न करो। (१०)
तदुपरान्त देवों से पिरे पाकराक्षस के हन्ता भगवान् इन्द्र ने एक सप्ताह तक धूलि की वर्षा कर सरोवर को भर दिया। (११)
इस धूलि वर्षा को देख कर देवदेव महेश्वर ने लिङ्ग और तीर्थक्ट को अपने हाथ में धारण कर लिया। (१२)
अतएव आदि मे जहाँ जल था वह तीर्थ पुण्यतम है। उसमे स्नान करने वाला मनुष्य सभी तीर्थों में स्नान कर लेता है।
वट और लिङ्ग के मध्य मे जो श्राद्ध करता है उसके पितृगण उस पर प्रसन्न होकर उसे पृथ्वी मे दुर्लभ पदार्थ प्रदान करते है। (१४)
वे सभी ऋषि सरोवर को धूलि से पृरित हुआ परित हुआ देखकर श्रद्धापूर्वक समस्त शरीर मे धूलि लगाने लगे। (१५)
वे मुनि भी धूलि से पापरहित होकर देवताओं से पूजित होते हुए ब्रह्मलोफ चले गये । (१६)
जो तपस्वी महात्मा उस लिङ्ग की पूजा करते थे वे आवागमन से रहित परमसिद्धि प्राप्त करने लगे। (१७)
ऐसा जान कर ब्रह्मा ने आदि लिङ्गको नीचे कर उसके ऊपर शैलमय लिग को रख दिया । कुछ समय व्यतीत होने पर उसके (आद्य लिङ्ग के) सेज से (वह शैलमय रिङ्ग भी) रञ्जित हो गया। सिद्ध गण उसके भी स्पर्श से परम पद प्राप्त करने लगे। (१९)
हे द्विजश्रेष्ठ ! तदनन्तर देवताओं ने पुन ब्रह्मा को सूचित किया कि मनुष्य इस लिग के भी दर्शन से परम
सिद्धि प्राप्त कर रहे हैं।
यह सुन कर भगवान ब्रह्मा ने देवताओं के हित की फामना से एक के ऊपर एक सात लिगों को स्थापित (२१)
तदनन्तर मुक्ति की कामना बाले विरक्त सिद्धगण प्रयत्नपूर्वक धूलि का सेवन कर परमपद प्राप्त करने (२२)
कुरुक्षेत्र में वायु प्रेरित धूलि भी महादुष्कमियों को परमपद देती है। (२३)
स्त्री या पुरुप के ज्ञान अथवा अज्ञान से किये गये समस्त पाप स्थाणुतीर्थ के प्रभाव से नष्ट हो जाते (२४)
लिग के दर्शन और वट के स्पर्श से मुक्ति मिलती है। उसके निकट जल में स्नान करने से मनुष्य अभिमत फल प्राप्त करता है। (२५)
उस जल में पितरों का रर्पण करने वाय जल के प्रत्येक बिन्दु मै अनन्त फल प्राप्त करता है। (२६)
लिङ्ग से पश्चिम दिशा में श्रद्धापूर्वक काले तिलों से तर्पण करने वाला तीन युगों तक (पितरों को) तृप्त करता है। जब तक मन्वन्तर है और जब तक लिग की सस्थिति है तब तक पितृगण प्रसन्न होकर उत्तम जल का पान करते हैं। (२७-२८)
कृतयुग मै सान्निदत्य सर सेव्य है त्रेता मे घायु नामक हद सेव्य है। कलि एवं द्वापर मे रुद्रहद नामक यूप सेव्य माना गया है। (२६)
चैत्र के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी मे रुद्रपद नामक तीर्थ मे स्नान कर उत्तम पुरुष परमपद को प्राप्त परता है। (३०)
रात्रि में घट के नीचे रह कर परमेश्वर का ध्यान करने वाले को स्थाणुवट की कृपा से मनोवाञ्छित फल प्राप्त होता है। (३१)