वामन महा पुराण
सरोमाहात्म्ये 5 वामनचरित-कश्यप द्वारा नारायण का स्वचन
उस अमृत स्थान पर पहुँच कर महात्मा कश्यप ने धीमान् योगी सुरेश्वर, कल्याणस्वरूप, सहस्राक्ष, नारायण देव की प्रसन्नता हेतु ( देवताओं को ) सहस्रवार्षिक दिव्य कामद व्रत की दीक्षा दी। (२०-२१)
सभी देवता क्रम पूर्वक ब्रह्मचर्य, मौन एव स्थान वीरा सन (आसन विशेष) धारण कर दम तप करने (२२)
वहाँ भगवान् कश्यप ने महात्मा विष्णु को प्रसन्न करने के लिये वेदोक्त स्तर का पाठ किया जिसे 'परमस्त कहते है। (२३)
कश्यप ने कहा-'हे देव देव एकङ्ग, वृषार्षि, सिन्धुप, वृषाकपि, सुरवृप, अनादिसभव, रुद्रकपिल, विष्वक्सेन, सर्वभूतपति, ध्रुय, धर्माधर्म, धैकुण्ठ, वृपायर्स, अनादिमध्यनिधन, धनञ्जय, शुचिश्व, पृश्नितेज, निजजय, अमृतेशय, सनावन, विधाम, तुपित, महातत्त्व, लोकनाथ, पद्मनाभ, विरिश्चि, बहुरूप, अक्षय, अक्षर, हव्यभुज, खण्डपरशु, शक, मुअकेश, हंस, महादक्षिण, हृषीकेश, सूक्ष्म, महानियमधर, विरज, लोकप्रतिष्ट, अरूप, अग्रज, धर्मज, धर्मनाभ, गभस्तिनाम, शतक्रतुनाम, चन्द्ररथ, सूर्यतेज, समुद्रवास, अज, सहस्रशिर, सहस्रपाद, अधोमुख, महापुरुप, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रात्य, सहस्रसमव । आपको नमस्कार है। आपको सहस्रसत्व रहसे हैं। हे पुष्पहास, चरम | आप ही वौषट् है एव आपको ही वपद् कहते हैं। आपही अप्रय, यज्ञों मे प्राशिता (भोक्ता) सहस्रधार, भू, मुघ एव स्व है। आपदी वेदवेद्य, प्राशय, ब्राह्मणप्रिय, द्यौ, मातरिश्वा, धर्म, होता, पोता, मन्ता, नेता