वामन महा पुराण
प्रह्लाद-तीर्थयात्रा प्रसग में धुन्धु एव त्रिविकम का आख्यान एव मह्रदादि लोको का वर्णन, धुन्धु का यज्ञोपक्रम एव यज्ञ क्षय के लिए वामनोपात्ति, धुन्धु के यज्ञसदस्यों से अपने वृत्तान्त का कथन, धुन्धु की वामन के लिए धनादि दान करने की इच्छा वामन का विधिकम रुप, धुन्धु-वध
नारद ने कहा-हे विप्रेन्द्र । प्रहलाद किन तीर्थों में गये। आप मुझसे प्रहलाद की तीर्थयात्रा या भली प्रकार वर्णन परें। (१)
पुलस्त्य ने कहा- सुनो, मैं तुमसे पापरूपी पा को नष्ट परने वाली एवं शुद्ध पुण्य को प्रदान करने याली प्रहलाद की तीर्थयात्रा का वर्णन करता हूँ। (२)
श्रेष्ट सुवर्णमय मेरु पर्वत यो छोड़कर वे देयों से सेवित पृथ्वी में प्रसिद्ध फल्याणप्रद मानसतीध में गये जहाँ मत्स्यशरीरधारी सुरेश निरास परते हैं। (३)
उस श्रेष्टतीर्थ में स्नान यं पितरों तथा देयों का सर्पण कर उन्होंने श्रुतियों से समन्वित अच्युत जगन्नाथ का पूजन किया।
और पुन यहाँ उपयास पूर्पक देयों, ऋपियों पितरों एवं मानों की पूजा पर कोशिकी में (अस्थित) पापनाशक कच्छप का दर्शन करने गये।
उस महानदी में स्नानकर इन्होंने जगत्पति जनादेन की पूजा की एष उपास करके पवित्र होकर ब्राह्मणों को दक्षिणा दिया। (६)
तदनन्तर धर्मशरीरधारी जगन्नाय को नमस्कार कर ये पहों से कृष्ण नाम ये अश्वमुस प्रभु का दर्शन करने गये । यहाँ देवहद में स्नान कर उन्होंने देवों पयं पितरों का दर्पण किया तथा हयग्रीष या पूजनर वे हस्तिनापुर गये । यहाँ स्नान पर चक्रपाणि जगन्नाथ गोविन्द देय की विधिपूर्वक पूजा करने के बाद वे यमुना नदी के समीप गए । इसमे स्नान कर पवित्र होकर उन्होंने पियों, पिवरों एय देयों का वर्पण या ए देवदेवेश लोकनाय निविक्रम वा दर्शन दिया। (८-९)
नारद ने पूछा-मम्प्रति जगत्पति भगवान् विष्णु प्रैलोक्य को आमान्त परने पारा शरीर धारण करेंगे तथा बलि को पागे। तो पिर भगरान् विष्णु फैसे पूर्व समय में नियिकम हुए थे और ( रस समय ) उन्होंने किसका बन्धन पिया था? यह बात मुंभ (१०-११)
पुलस्त्य ने कहा--सुनो, में पतलाना हूँ कि वे नियिम कौन हैं, किस समय हुए एव उन्होंने किसकी वञ्चना की।(१२)
कश्यप का दनु के गर्भ से उत्पन्न धुन्धु नाम से प्रसिद्ध अत्यन्त बलवान् एव पराक्रमी एक औरस पुत्र था। (१३)
हे नारद ! उस असुर ने तपस्या के द्वारा वरदाता ब्रह्मा की आराधना करके उनसे इन्द्र आदि देवताओं से अवध्य होने की प्रार्थना की। (१४)
(उसके) तप से प्रसन्न होकर कमलयोनि ब्रह्मा ने उसे वह वर दे दिया। तदनन्तर वह बलवान् धुन्धु स्वर्ग मे गया। (१५)
चतुर्थ कलि के आदि मे हिरण्यकशिपु के वर्तमान रहते समय धुन्धु ने इन्द्र सहित देवों को जीतकर इन्द्र (१६)
उस समय धुन्धु का आश्रित होपर बलवान दैत्य हिरण्यकशिपु मन्दर पर्वत पर विचरण करता था। असुर लोग भी इच्छानुसार स्वर्ग में पिहार करने लगे।। सभी देवता दुखी होकर ब्रह्मलोक में रहने लगे। (१८)
तब देवताओं का ब्रह्मलोक मे रहना सुनकर धुन्धु ने दैत्यों से कहा-हे दैत्यो । इन्द्र सहित देवों को जीतने के लिये हमलोग ब्रह्मलोक चलें। (१९)
धुन्धु का वचन सुनकर उन दैत्यों ने कहा-हेलोक्पाल | हम रोगों में वह गति नहीं है जिससे पितामह के लोक मे जा सकें। (वहाँ का मार्ग अत्यन्त दुर्गम एव दूर है। (२०)
यहाँ से सहस्रों योजन दूर महषियों के द्वारा सेवित 'मह नामक लोक है। उन ऋषियों की सहसा दृष्टि पडते ही समस्त दैत्य जल जाते है। (२१)
उससे भी आगे कोटि योजन दूर 'जन नामक एक लोक है जहाँ गोमातायें रहती है। हे महासुरेन्द्र । उनकी धूलि भी हमलोगों का विनाशक है। (२२)
तदनन्तर छ कोटि योजन की दूरी पर तपरिवयों से सेवित 'तप' लोक है। हे असुर । वहाँ श्रेष्ठ एव साध्यगण निवास करते हैं । उनका नि श्वास पवन असह्य है। (२३)
तदुपरान्त तीस कोटि योजन की दूरी पर सहस
आदित्यों के समान दीप्त 'सत्य' नामक लोक है। यह लोक उन्हीं भगवान् या निवास स्थान है जिन्होंने आपको वर प्रदान किया था। (२१)
उनकी चेदध्वनि सुनकर देवता आदि विकसित होते हैं और भसुर तथा उनके समानधर्म वाले संकुचित (२५)
अत..हे महाबाहु धुन्धु! आप ऐसा विचार न करें। क्योंकि मनुष्यों के लिये ब्रह्मलोक सदेव दुरारोह है। (२६)
उनकी बात सुनकर देवों को जीतने के लिए ब्रह्मलोक पो जाने की इच्छा वाले धुन्धु ने दानवों से कहा-२७)
हे दानवथेष्टो! यहाँ कैसे और किस कर्म से जाया जाता है ? देवों के साथ इन्द्र वहाँ कैसे पहुँचे ? (२८)
स्वामी धुन्धु फे पूछने पर न घेष्ठ दानवों ने कहा- हमलोग उस कर्म को नहीं जानते । शुक्राचार्य निस्सन्देह उसको जानते हैं। (२६)
'दैत्यों की यात सुनकर धुन्धु ने दैत्यों के पुरोहित शुफा- चार्य से पूछा-क्सि कर्म को करने से प्रझलोक में जामा जा सकता है? (३0)
हे कलिप्रिय ! तदनन्तर उससे वृत्रशन इन्द्र का चरित कहा । (उन्होंने कहा)-हे देत्येन्द्र ! प्राचीन काल में इन्द्र ने सौ पवित्र अश्वमेघ यज्ञ किया था। इसी से वे ब्रह्मलोक चले गए। (३१-३२)
शुप्राचार्य का वह वाक्य सुनकर बलयान् दानपपति ने अश्वमेध यज्ञ करने की उत्तम इच्छा की। तदनन्तर अमुर- गुरु तथा श्लेष्ट दानवों को आमन्त्रित पर उसने कहा- में दक्षिणा सहित अश्यमेध यज्ञों को करूँगा। अतः झायो, हमलोग पृथ्वी पर चलें एवं राजाओं को जीतकर इच्छा- नुकूल गुगों से सम्पन्न अश्वमेघों का सम्पादन करें। निधियों को बुलाओ एवं गुह्यकों यो आज्ञा दे दो। (३३-३१)
प्रपियोको आमन्त्रित करो, हमलोग देविका के तट पर चलें। यह पविन श्रेष्ठ नदी कल्याणप्रद एवं –सर्वसिद्धिकरी है। उप्स.प्राचीन स्थान पर पहुँचर इम अश्वमेध यज्ञ करो। (३१)
सुर-शत्रु के उस पचन योन्सुनकर असुरयाजक (शुक्र) ने ठीक है ऐसा कदा एवं प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने निधियों
को आदेश दिया। (३७)
सदन-वर देविका के प्राचीन पापनाशक तट पर भार्गव श्रेष्ठ शुक ने अश्वमेध यज्ञ के लिये धुन्धु को दीक्षित किया। (३८)
हे ब्रह्मम् । शुक्र की अनुमति से शुक्र के शिष्य तथा भार्गव-गोत्रीय विद्वान् ब्राह्मण उस यज्ञ में सदस्य एवं ऋत्विज बने। (३६)
हे मुने। शुक्राचार्य की अनुमति से असुरनाथ ने स्वर्भानु आदि असुरों को यचभाग का मोगी बनाया। (४०)
तदनन्तर यन आरम्भ हुक्षा एन अफ छोडा गया। असिलोमा नामक महान् असुर अन्ध के पीछे चला। (४१)
हे महर्षे । तदुपरान्त यज्ञ क धूम से पर्वतों सहित पृथ्वी, आकाश, दिशायें एय विदिशायें व्याप्त हो गई। आगश स्पर्शी उस एम गन्ध से सुगन्धित वायु ब्रह्मलोक में प्रवाहित होने लगा। (४२)
उस गन्ध को सूंघ कर देवगण विषण्ण हो गए। उन्हें यह ज्ञात हो गया कि धुन्धु ने अश्वमेध की दीक्षा ग्रहण की है। तदुपरान्त वे इद्र सहित जगदाश्रय शरण्य जनार्दन की शरण में गए। (४३)
वरदाता पदानाभ जनार्दन देव को प्रणाम कर सभी देवों ने भय से गद्गद् वाणी मे कहा- (४४)
हे देवों के दुख को दूर करने वाले चराचर हितकारी भगवान देवदेवेश विष्णु । आप हमारा निवेदन सुनें ।(४२)
धुन्धु नामक बलवान् असुरपति वर से बढ़ गया है। उस बलवान ने सभी देवों को जीतकर नैलोक्य को छीन लिया। (४६)
हे हरि । पिनाकी देव के अतिरिक्त हम देवों का कोई रक्षक न होने से बद असुर उपेक्षित व्याधि ये सदृश बढ़ गया है। (४७)
सम्प्रति ब्रह्मलोक मे हम रहने वालों को भी जीतने के लिये उद्यत होकर वह शुक्र के मतानुसार अश्वमेध यज्ञ में दीक्षित हुआ है। (४८)
सौ अश्वमेध यज्ञ करके वह महासुर देवताओं पर विजय पाने के लिए ब्रह्मलोक में आरोहण करना चाहता है। (४६)
अत हे जगद्गुरु । आप शीय यतको विश्वस्त करने
का उपाय सोचें जिससे हमलोग निश्चिन्त हो सकें। (५०)
राभी देयों को अभयदान देकर उन महाबाहु ने उन्हें विसर्जित किया एवं उस महान असुर धर्मध्वज धुन्धु को अजेय जानकर उन्होंने उसे पाँधने का विचार किया। तदनन्तर भगवान् विष्णु ने वामन का रूप धारण किया एवं देविका के जल में अपने शरीर को फाष्टवत् निपलम्य छोड़ दिया। क्षणमात्र मे खुले हुये फेशों वाले वे अपने आप डूबने उतराने लगे। (५१-५३)
तदनन्तर देत्यपति, दैत्यों एवं अन्य ऋपियों ने उन्हें देवा । तदुपरान्त यज्ञकर्म को छोडर श्रेष्ठ प्रामग व्यप्रतापूर्वक उस माझण को निरालने के लिये दौड़े। सभी सदस्य, यजमान एवं अति शोजस्वी ऋत्विजों ने दूय रहे थामनामार माझण को निकाला एय उससे पूछा-दमें यह बतलाओ कि तुम यहाँ क्यों गिरे अथवा तुम्हें किसने फेंका (५४-५६)
पनके पचन को सुनकर पार-यार कापते हुए उन्होंने घुग्घु आदि से कहा-आप लोग इस कारण सुनें । (५७)
वरुण गोत्रोत्पन्न प्रभास नामक एक प्रामण थे। सर्वशास्त्रों के अर्थ के नाता तथा बुद्धिमान थे। (५८)
उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए। दोनों ही अल्पबुद्धि और अत्यन्त दुसमस्त थे। उनमें मेरा भाई पड़ा और में (५९)
हे असुर! मेरा पड़ा भाई नेत्रभास नाम से विख्यात है। मेरे पिता ने कुतूहलाश मेरा नाम गतिभास रस्सा । (६०)
हे महासुर धुन्धु । मेरे पिता का गृह रमणीय, सुसद, स्वर्गीय गुणों से युक्त एय सुन्दर था। (६१)
तदनन्तर यहुत दिनों के बाद हम दोनों के पिता दिवंगत हो गये। उनरा प्रेतर्म फर हम दोनों भाई पर आये। (६२)
तदुपरान्त मैंने पड़े भाई से कहा- हम दोनो गृह का विभाजन पर हैं। उसन मुझसे कहा-तुम्हारा भाग नहीं है। (६३)
क्योंकि कुन्न, यामन, लँगड़े, नपुंसर, श्वेतपुटी, उन्मत्त और अन्धों का धन में भाग नहीं होता। (६)
नन्हें पेषल प्यासन का स्थान एवं स्वच्यानुसार
अन्नभोग या अधिकार दिया जाता है। वे अर्थ के भाग के अधिसरी नहीं होते।
ऐसा पहने पर मैंने उससे कहा कि मैं किस न्याय से और क्यों पैतृक गृह के पन के अर्धमाग या अधिकारी नहीं हूँ? (६६)
इस प्रकार या वाक्य कहने पर कोपयुक्त मेरे भ्राता ने इसी कारण मुझ उठाकर इस नदी में फेंक दिया । (६७)
मुझे इस नदी में तैरते हुए एक वर्ष का समय व्यतीत हो गया । आप लोगों ने यहाँ मेरा उद्धार किया है। (६८)
स्नेह युक्त यान्धयों के सदृश यहाँ स्थित आप लोग कौन हैं तथा यज्ञ के लिए दीक्षित इन्द्रतुल्य ये महापराक्मी कौन है? (६९)
है तपोधनो! आप मुझे यह सय यथार्थ रूप में बहलायें । आपलोग महान् ऐधर्य से युक्त एवं मेरे ऊपर अतिशय अनुकम्पा करने वाले हैं। (७०)
यामनपा पह पाक्य मुनर भाययुल के प्राण भेटों ने कहा-हे प्रझन् ! दमडोग भागेयगोत्रीय माम है। (७१)
पे धुन्धु नामक अनि संजरयो पाता, मोटा एवं बिमा पर्ष मदाम् अगुर है। ये याम्म में दीभित हुए हैं। (२)
देवेश वामन से ऐसा कहकर सभी भार्गवगोत्रीय (ब्राह्मणों ने) दैत्यपति धुन्धु से यामन के प्रयोजन को सिद्ध करने वाय यचन कहा- (७३)
हे दैत्येन्द्र ! इन्हें समस्त सामग्रियों से युक्त भीसम्पन्न गृह, दासियाँ एवं विविध प्रकार के रत्न प्रदान करें। (७४)
ब्राह्मणों के उस पचन को सुनकर देत्यपति ने यह यचन कहा-हे द्विजेन्द्र में आपकी इच्छानुसार धन दूँगा । (७५)
हे विमु ! आप अपने ईप्सित पदार्थ का परण करें। मैं आज आपरो गृह, वर्ण, अध, रय एवं हाथी प्रदान करूँगा। (७६)
दानपति का यह यास्य मुनर यामनदेय ने असुर- पति धुन्धु से अपना स्यार्थ सिद्ध करने याला ययन कहा- (७७)
सहोदर भाई ने जिसकी सम्पत्ति का अपहरण कर लिया उस असमर्थ को जा दिया जायेगा क्या उसे कोई दूसरा नहीं छीन लेगा? (७८)
दे महापाटु ! आप समर्थ मापणों को दासी, दाम, सृत्य, गृह, ररन एवं अच्छे यन्त्र प्रदान करें। (38)
हे देरपेन्द्र! मेरा परिमाए देखकर मुझे तीन
पग (भूमि) प्रदान कर । में अधिक की रक्षा करने में समर्थ नहीं हूँ।
उन महात्मा के ऐसा वचन कहने पर जब उन्होंने अन्य कुछ ग्रहण नहीं किया तो ऋत्विजों सहित दैत्याधिपति ने हँसकर उन द्विजेन्द्र को तीन पग (भूमि) प्रदानकी।८१)
महान असुरेन्द्र द्वारा तीन पग भूमि प्रदान की हुई देखकर अनन्त शक्ति वाले यशस्वी विभु ने निरोकी का लखन फसे में लिये त्रिविक्रम रूप धारण किया।
(त्रिविक्रम) रूप धारण करने के उपरान्त उन्होंने दैत्यों का यधकर चैपियों को प्रणाम किया एव प्रथम पादग्यास में पर्वत, सागर, रत्नों की सान एय नगरों से युक्त पृथ्वी को हरण कर लिया। (८३)
देयो का प्रिय करने की इच्छा वाले ईश्वर वामनदेय ने द्वितीय पादप्रम से वेगपूर्वक देवनाओं के निवास स्वर्ग के सहित भुयर्लोक, चन्द्र, सूर्य ण्य नक्षत्रों से मण्डित आगश का हरण कर लिया। (८४)
उनका तृतीय पादकम जब पूरा नहीं हुआ तो अत्यन्त कोप से भगवान त्रिविक्रम मेरु के तुल्य शरीर से दानवश्रेष्ट की पीठ पर गिरे। (८५)
हे नारद । दानव के उपर वासुदेव के गिरने से भूमि मे तीस सहस्र योजन का इद गर्ने घन गया । (८६)
तदनन्तर उन्होंने देत्य को उठार वेग से उसमें पंक दिया एघ चालु की दृष्टि से उस गर्ने को भर दिया। (८७)
सदनन्तर यामदेव के अनुग्रह से इन्द्र ने स्वर्ग पाया ण्व उपद्रव रहित समरस देवों को रैलोक्य की प्राप्ति हुई। (८८)
कालिन्दी के यालुकार्णव में देरयेन्द्र को फेंकने के उपरान्त भगवान् भी अपना रूप धारण कर वही अन्तर्हित हो गए। (८)
प्राचीन काल में इस प्रकार धुन्धु यो जीतने के लिये विष्णु वामन तथा बियिकम हुए थे। हे महर्पि। यह पुण्यात्मा दैत्येन्द्र पुत्र प्रहलाद उसी थाश्रम में गया ।