वामन महा पुराण
सुन्दर वर्ण की प्राप्ति के लिए पार्वती की तपश्वर्या एवं ब्रह्मा द्वारा पार्वती का सुवण तुल्य वर्ण का वर प्रदान, इन्द्र द्वारा कौशिकी की विन्ध्य पर स्थापना, महामोहनक में स्थित शिव के प्राङ्ग में अग्नि का प्रवेश, देवों की प्रार्थना से शिव द्वारा महामैथुन का परित्याग, अग्नि द्वारा शिव के वीर्य का पान, गजानन की उत्पत्ति
मत फीजिए। हे पितामह । ये सभी बालसिल्य महपि है, जो बड़े ही धन्य हैं।
तदुपरान्त शङ्कर के कहने के अनन्तर अट्टासी हजार पालखित्य नामक तपस्वी उठ सडै हुए। (५९)
तदनन्तर विवाद हो जाने पर शङ्कर कौतुमगार (कोहबर) मे गये। उन्होंने रात्रि मे पार्वती के साथ रमण किया और पुन प्रात वाल उठे। (६०)
तदुपरान्त पार्यती को प्राप्त पर प्रसन्न हुये शङ्कर पर्वतराज से पूजित होने के उपरान्त देवों एवं भूतगणों के साथ शीघ्रता पूर्वक मन्दराचल पर आ गये। (६१)
तदनन्तर अष्टमूर्ति शङ्कर ने ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवताओं का यथोचित पूजन तथा प्रणाम पर उन्हें विदा किया और स्वयं अपने भूतगणों के साथ मन्दर पर्वत पर रहने लगे। (६२)
२८
पुलस्त्य ने कहा-हे मुने। मन्दर पर्वत पर रहते हुए और इच्छानुसार विचरण करते हुए शङ्कर ने विश्वकर्मा को बुलाकर कहा-मेरे लिए घर बना दो।
तदनन्तर उसने शंकर के लिए चौसठ योजन विस्तृत सुपर्णमय तथा स्वस्तिक चिह्नों से युक्त गृह धनाया। (२)
उसमें हाथी के दाँतों के तोरण और मोतियों के सुन्दर झालर लगे थे एव उसमे पैडूर्यमणिखचित शुद्ध रफटिक के सोपान थे। (३)
सात कक्षों से युक्त वह सुविस्तीर्ण गृह सभी गुणों से सम्पन्न था। तदनन्तर देयाधिदेव ने गाईघ्य स्पी यज्ञ किया।
शङ्कर भगवान् पूर्वाचरित मार्ग का अनुसरण
तदननर काली ने कहा-हे कमलोद्भव । इस व्यान को आप पर दें। इसी से मैं भी अतिप्रसन्न होऊँगी। (१९)
तदुपरान्त ब्रह्मा ने उस अद्भुतकर्मा व्याप्न को गणों का स्वामित्व, शकर की भक्ति, अजेयता और धार्मिकता का पर दिया। (२०)
इस प्रकार व्याघ्र को यर देवर ( उन्होंने ) शिवकान्ता से कहा-दे अम्बिके । तुम अव्यम चित्त से वर माँगो।मैं तुम्हें वर दूंगा। (२१)
तदनन्तर गिरिनन्दिनी देवी ने पितामह से कहा- हे ब्रह्मन् । मुझे यही पर दीजिए कि मेरा वर्ण सुवर्णतुल्य हो जाय। (२३)
'ऐसा ही हो' कहकर ब्रह्मा चले गये। पार्वती भी अपने कृष्ण आचरण को छोड़कर कमल के केमर के समान हो गयी। (२३)
हे मुनि ! उस कृष्ण कोश से पुन कात्यायनी उत्पन्न हुई। सहस्राक्ष इन्द्र ने उनके निम्ट जाकर दक्षिणा ग्रहण की। उन्होंने अपने लिए गिरिजा से यह यचन कहा-(२४)
इन्द्र ने कहा-आप इसे मुझे प्रदान करें। यह कौशिकी मेरी भगिनी भने । आप के कोश से उत्पन्न होने से यह कौशिकी हुई एय में भी कौशिक हूँ। (२५)
'उसको दिया' यह सुनने के अनन्तर उस रूपयती कौशिक्षा को लेकर देवराज इन्द्र वेग से विन्ध्याचल (२६)
यहाँ जाकर ( उन्होंने ) कहा-हे महावल । आप यहाँ रहें। देवताओं द्वारा पूजित होती हुई आप विध्यवासिनी नाम से प्रख्यात होंगी। (२७)
वहाँ देवी को स्थापित कर और इन्हें वाहन रूप में सिह देने के उपरान्त "आप देवताओं के शत्रुओं को मारने वाली वने' यह कहकर इन्द्र स्वर्ग चले गये। (२८)
हे मुनि । उमा भी वह घर प्राप्त करने के उपरान्त मन्दर पर्वत पर गयीं एव महेश को प्रणाम कर विनयपूर्वक रहने लगी। (२९)
हे मुनि । तदनन्तर श्रीमान, अव्यय, अमरगुर एक महस्र वर्ष पर्यन्त महामोहनक में स्थित रहे। (३०)
स्द्रदेव के महामोह में स्थित होने पर समस्त भुरन उद्धत होकर विचलित हो गये। सातों सागर क्षुब्ध हो हो उठे और देवगण भयभीत हो गये। (३१)
तब देवता लोग इन्द्र के साथ ब्रझलोक गये तथा महेशान ब्रा को प्रणाम कर बोले-यह जगत क्यों क्षुब्ध हो गया है? (३२)
उन्होंने उन लोगों से कहा-महादेव निश्चय ही
महामोहनक मे स्थित है। उसी से आरात हो ये लोक अत्यन्त (३३)
इतना कहकर वे मौन हो गये। उसके बाद देवताओं ने इन्द्र से कहा-हे शक! जब तक वह (महामोहनक) समाप्त नहीं हो जाता तब तक हम लोग चलें! (३४)
मोह समाप्त होने पर उत्पन्न होने पाया अविनाशी पालक निश्चय ही देवराज के ऐन्द्र पद का हरण करेगा। (३५)
तदनन्तर भाविधर्म की प्रेरणावश देवताओं के पचन से पलपाती (इन्द्र) का विवेक एवं भय के कारण मान नष्ट हो गया। (३६)
तय सहस्रनेत्र इन्द्र अग्नि और देयों के साथ मन्दर पर्वत पर गये एव उसके शिखर पर बैठे। (३७)
किन्तु वे सभी महादेव के भवन में प्रविष्ट नहीं हो सके। बहुत देर तक विचार कर उन लोगों ने अग्नि को भेजा। (३८)
मुरश्रेष्ठ अग्नि यहाँ गये और द्वार पर नन्दी वो देश पर, यहाँ प्रवेश परना दु'साम्य जानकर अत्यन्त (३९)
चिन्ता-सागर में मग्न उन्होंने शम्भु के भवन से निकल रही हसों की विमल महापक्ति को देखा। (४०)
'यही उपाय है ऐसा कहकर अग्नि हैस रूप मे द्वार- पाल को धोखा देकर महादेव के घर में प्रवेश किए। (४१)
प्रविष्ट होने के उपरान्त सूक्ष्म शरीरधारी अग्निदेव ने महादेव के शिर के पास हँसते हुए गम्भीर स्वर से कहा-देवता लोग दरवाजे पर पड़े हैं। (४२)
हे नारद! महादेव उस यात को सुनार उसी क्षण उठे और हिमालय की कन्या को छोड़ार अग्नि के साथ आंगन से निकल पड़े। (४३)
मुरपति शङ्कर के निकल आने पर इन्द्र सहित चन्द्र, सूर्य और अग्नि आदि सभी देवताओं ने आनन्दित होकर पृथ्वी पर शिर झुशया । (४४)
तदनन्तर (भगगन महादेव ने ) प्रातिपूर्वक देवताओं से पहा-शीघ्र मुझे कार्य यताइये । प्रणाम के लिए अपनन आप लोगों को में उत्तम यर दूंगा। (४५)
देवताओं ने कहा-हे ईश्वर! यदि आप प्रसन्न है धीर देयों को पर देना चाहते हैं तो आप इस महामेथुन पा त्याग करें। (४६)
ईश्वर ने कहा-हे देवश्रेष्टो। ऐसा ही हो। मैंने आसक्ति छोड़ दिया । कोई देवता मेरे इस निकले हुए तेज को प्रहण करे।
पुलस्त्य ने यहा-शम्भु के ऐसा कहने पर इन्द्रसहित चन्द्रमा एवं सूर्यादि देवता पट्कमग्ग गज के सदृश दुसी हुए। (४८)
देवताओं के इस प्रकार दुःसी होने पर अग्नि ने शहर के निम्ट जाकर कहा-हे शङ्कर। आप तेज को मुक्त करें।मैं प्रहण करूँगा। (४९)
तदनन्तर भगवान् ने (सेज को ) छोड़ दिया। उस एसलित रेतस् को ( अग्निदेय इस प्रकार पो गये) जैसे जल का प्यासा व्यक्ति तैलपान कर जाता है। (५०)
अग्निदेव द्वारा शम्भु का वीर्य पी लेने पर स्वस्थ देवता लोग महादेव की अनुमति लेकर चले गये। (५१)
देवताओं के चले जाने पर महादेव ने भी अपने मन्दिर में जाकर महादेवी से यह पचन कहा- (५२)
हे देवि! देवों ने यहाँ आएर प्रयत्नपूर्वक अग्नि को (मेरे पास } भेजकर मुझे बुलाया और तुम्हारे सदर से पुत्रोसत्ति न करने के लिये कहा। (५३)
पति का वचन सुनार विनष्ट पुत्र-जन्म वाली शिया ने क्रोध से आँखे लाल कर समस्त देवताओं को शाप दिया। (५४)
क्यों कि वे दुष्ट मेरे उदर से पुत्र का जन्म नहीं चाहते अतः वे भी अपनी पत्नियों से पुत्र नहीं उत्पन्न करेंगे।
इस प्रसार देवताओं को शाप देकर तपोधना गौरी शौचालय मे गयी और मालिनी को बुलाकर स्नान करने का विचार किया।
मुन्दरी मालिनी सुगन्धयुक्त कोमल उद्वर्त्तन लेकर देवी के स्वर्णिम आभा से युक्त शरीर में दोनों हाथों से लगाने लगी। पार्वती विचार करने लगी कि इस स्वेद मे क्या गुण है। (५७)
मालिनी स्नान (पने ) के लिए शीघ्र स्नानागार मे चली गयी। उसके परे जाने पर शैलनन्दिनी ने ( उस) मल से गजानन को बनाया। (५८)
चार भुजाओं से युक्त, पीन पक्षस्थल याले, लक्षणान्वित पुरुप को यनार भूमि पर रस दिया एव पुन उत्तम आसन पर बैठ गई।
उस समय मालिनी ने हंसते हुए देवी को शिर से
स्नान कराया । हे नारद | मालिनी को मुस्कुराते हुए देख कर देवी ने कहा- (६०)
हे भीरु । तुम धीरे धीरे इतना क्यों हँस रही हो ? मालिनी ने कहा-मैं इसलिए हंस रही हूँ कि आप को अवश्य पुन होगा, ऐसा महादेव ने गणपति नन्दी से कहा था । हे कृशोदर। उसे सुनकर ( स्मरण कर ) आज मुझे हसी आ गयी क्यों कि देवताओं ने शङ्कर को पुन की कामना करने से रोक दिया है। इस बात को सुनकर देवी ने वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया। (६१-६३)
स्नान करने के उपरान्त भक्ति से शहर की पूजा कर देवी गृह में चली गयीं। तदनन्तर महादेव ने भी आकर उसी पवित्र आसन पर स्नान किया। उसी आसन के नीचे बहु मल्पुरुष पड़ा था। उमा के स्वेद एव जल और भरम से युक्त शङ्कर के स्वेद का सम्पर्क होने से वह उत्तम गुण्ड से फूत्कार करते हुए उठा। उसे अपना पुत्र जानर भुवनेश्वर प्रसन्न हो गये। (६४-६६)
भग के नेत्र को नष्ट करने वाले महादेव ने उसे लेकर नन्दी से कहा--( यह मेरा पुत्र है)। स्नानोपरान्त शिव ने स्तुतियों से देवताओं की तथा जल से पितरों की भी पूजा की।
तदनन्तर सहस्रनाम का जप कर दे उमा के पास
गये। देवी के पास जाकर शूलधारी शङ्कर ने हंसते हुए यह वचन कहा-हे शैलनन्दिनी । तुम अपने गुणयुक्त पुन को देखो। ऐसा कहे जाने पर पार्वती ने जाकर यह आश्चर्य देखा कि उनके अग के मल से दिव्य हाथी के मुख वाला मनुष्य बन गया है। तदनन्तर गिरिजा ने प्रीतिपूर्वक उस पुत्रका आलिङ्गन किया । (६८-७०)
तदुपरान्त उसके सिर को सूंघकर शम्मु ने उमा से कहा-हे देवि! तुम्हारा यह पुन विना नायक के उत्पन्न हुआ है अत इसम नाम विनायक होगा। यह देवादिकों के सहस्रों विघ्नों के करेगा।
हे देवि । समस्त चराचर लोक इसकी पूजा करेंगे। देवी से ऐसा कहकर उन्होंने पुत्र विनायक को पटोदर नामक श्रेष्ठ गण, घोर मातृगणों तथा विघ्नकारी भूतों को सहायर बनाया। देवी की प्रीति के लिए परमेश ने उन सयरी सप्टि की। अपने पुत्र को देखकर देवी को भी परम आनन्द प्राप्त हुआ। (७३-७५)
तदनन्तर देवी शम्भु के साथ सुन्दर कन्दराओं वाल मन्दराचल पर रमण करने लगी। हे विभो । इसी प्रसर यह देवी पुन कात्यायनी हुई थी जिन्होंने प्राचीन समय