सरोमाहात्म्ये 3 वामनचरित-कश्यप के साथ देवताओं का ब्रह्मलोकगमन

अथ प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्यभाः।

ऋषियों ने कहा-आप हमें यह बतलायें कि देवता लोग कौन कम करने से पराजित हुये तथा देवाधिदेव विष्णु किस प्रकार वामन बने?

लोमहर्षण ने कहा-पुरंदर (इन्द्र) देव त्रैलोक्य को बलि के अधिकार में देखकर अपनी माता के मेरुस्थित क्ल्याणयुक्त गृह को गये। (२)

माता के समीप जाकर उनसे उन्होंने युद्ध में देवगण दानव यलि से जिस प्रकार पराजित हुये थे उसका वर्णन किया।

अदिति ने कहा-हे पुत्र । यदि ऐसा है तो समस्त मरद्गण के साथ मिलकर भी तुमलोग युद्ध मे विरोचन के  पुत्र बलि को नहीं मार सक्ते ।

हे सहस्राक्ष । (उसे) युद्ध मे केवल सहस्रशीर्ष (भगवान् विष्णु) ही मार सकते हैं। उनके अतिरिक्त अन्य किसी से भी वह (मारा) नहीं जा सकता।

अत उस महात्मा बलिनामक दैत्य की पराजय के लिये मैं तुहारे पिता ब्रह्मवादी कश्यप से पूदूंगी। (६)

तदनन्तर अदिति के साथ देवतालोग कश्यप के समीप गये। वहाँ उन लोगों ने तेजस्वी, तपोनिधि, मरीचिमुनि के पुत्र, आद्य, दिव्य, देवगुरु, ब्रह्मतेज से प्रदीप्त, सेज से भारवर तुल्य, अग्निशिखा के सदृश, न्यस्तदण्ड, तपोयुक्त, कृष्ण मृगचर्म से आवृत, वल्कल और मृगचर्म पहने हुए, तेज से प्रदीप्त आज्यगन्ध पुरस्कृत हुताशन के सदृश प्रदीप्त, स्वाध्यायरत, शरीरधारी अग्नितुल्य, ब्रह्मवादी, सत्यवादी, सुरासुरमुरु, अप्रतिम ब्रह्मतेजयुक्त, रक्ष्मी के कारण दीप्ततेज सम्पन्न समर्थ पिता कश्यप को बैठे हुये देखा। (७-११)

वे सभी रोकों के स्रष्टा, श्रेष्ठ प्रजापति एवं आरमभाव की विशेषता के कारण तृतीय प्रजापति है। (१२)

तदनन्तर अदिति के साथ समस्त देववीर प्रणाम कर कश्यप से) इस प्रकार बोले जैसे ब्रह्मा से उनके मानस

पुत्र कहते हैं-  (१३)

यलशाली वलिदैत्य युद्ध मे इन्द्र द्वारा अजेय हो गया है। अब हम देवों के वृद्धि के लिए आप मङ्गल को सपन्न करें(१४)

उन पुत्रों का वचन सुनकर लोककर्ता प्रभु कश्यप ने ब्रह्म लोक जाने का विचार किया।

कश्यप ने कहा-हे इन्द्र । ब्रह्मा जी से अपनी पराजय कहने को उद्यत होकर हम उनके परम अद्भुत लोक को  चलें।

तदनन्तर अदिति के साथ कश्यप के आश्रम मे आये सभी देवता महर्पिगणों से सेवित ब्रह्मसदन की ओर प्रस्थान  किये। (१७)

यथायोग्य, दिव्य एव कामचारी यानों के द्वारा महा चली एय तेजस्वी वे सभी लोग मुहूर्त मान में ब्रह्मलोक (१८)

तपोराशि, अव्यय ब्रह्मा को देखने की इच्छा वाले वे लोग ब्रह्मा की विस्तीर्ण श्रेष्ठ सभा मे गये। भ्रमरों के गीत से मधुर, सामगान से मुसरित,कल्याण कारिणी और शत्रुओं की विनाशिरा उस सभा को देखकर वे स्लोग प्रसन्न हुए। (२०)

उन देव श्रेष्ठों ने अनेक विस्तृत फर्मानुष्ठानों के समय श्रेष्ठ ऋग्वेदियों के द्वारा प्रयुक्त क्रमपदादि से युक्त ऋचाओं का श्रवण किया। (२१)

वह सभा यज्ञ विद्या के जानकार और पदक्रम से युक्त वेदों के जानने वाले परमपियों के स्वर से प्रतिध्वनित हो रही थी। (२२)

देवों ने यहाँ यज्ञ के संस्लवों के ज्ञाताओं, शिक्षाविदों वेदमत्रों के अर्थ जानने वालों, सर्वविद्याविशारद द्विजों एव श्रेष्ठ लोकायतिकों द्वारा उच्चरित स्वर को सुना । कश्यप पुत्रों ने वहाँ सर्वत्र नियम पूर्वक तीक्ष्णव्रतधारी जप होमपरायण श्रेष्ठ विनों को देखा। उसी सभा मे लोक- पितामह ब्रह्मा बैठे हुये थे। (२३-२५)

सभा में विद्या एव वेदमायासम्पन श्रीमान् सुरासुरगुरु ब्रह्मा भी विराजमान थे एव यहाँ पर प्रजापतिगण उन प्रभु की उपासना कर रहे थे। (२६)

हे द्विजोत्तमो । दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि, भृगु,अनि वशिष्ट, गौतम और नारद, सभी विद्यायें, आकाश, वायु, तेज,जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध, प्रकृति, विकृति, अन्यान्यमहत् कारण, साङ्गोपाङ्ग पारो वेद, और रोकपति नीति, यज्ञ, सकल्प, प्राण, तथा अन्य अनेक लोग ब्रह्मा की उपासना कर रहे थे। हे द्विजोत्तमो । अर्थ, धर्म, काम, क्रोध, हर्प, शुक, वृहस्पति, सवर्ण और बुध,