वामन महा पुराण
7 वामनचरित-विष्णु द्वारा अदिति को वरप्रदान, अदिति के गर्भ में विष्णु की स्थिति
जिनकी सूर्य चन्द्रमा रूप दोनों आँखे समस्त लोकों के शुभाशुभ कमों को सतत देखती रहती हैं उन उपेन्द्र को मैं नमस्कार करती हूँ। (३४)
जिन सर्वेश्वर के विषय मे मेरा यह समस्त कथन सत्य है तथा असत्य नहीं है उन अनन्मा, अव्यय एव सष्टा विष्णु को में नमस्कार करती हूँ। (३५)
जनार्दन । यदि मैंने यह सत्य कहा है, तो उस सत्य के प्रभाव से मेरे सब मनोरथ परिपूर्ण हों। (३६)
लोमहर्षण ने कहा-इस प्रकार सस्तुत समस्त प्राणियों से अदृश्य भगवान वासुदेव उसके सम्मुख प्रत्यक्ष होकर बोले।
श्रीभगवान ने कहा-“हे धर्मज्ञ अदिति । जिन अभि वाञ्छित मनोरथों को तुम चाहती हो उन्हें मेरी कृपा से तुम निस्सन्देह प्राप्त करोगी। (२)
हे महाभागे । सुनो, तुम्हारे मन मे जो वर है (उसे मागों) मेरा दर्शन कभी विफल नहीं होगा। (३)
तुम्हारे इस वन में रह पर जो तीन रात्रियों तक निवास करेगा उसकी सभी मनोवाञ्छित कामनायें सफल होंगी। (४)
दूर रह कर भी जो मनुष्य अदिति के वन का स्मरण करता है वह भी परम धाम को प्राप्त कर लेता है। फिर यहाँ रहने वाले मनुष्य की तो बात ही क्या है ? (4)
जो इस स्थान पर पाँच, तीन, दो या एक भी ब्राह्मण को श्रद्धा युक्त होकर भोजन करायेगा वह उत्तम गति को प्राप्त करेगा।
अदिति ने कहा-हे भक्तवत्सल देव । यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो मेरे पुत्र इन्द्र त्रैलोक्य के स्वामी बने। (७)
असुरों ने उसके राज्य और यज्ञभाग का अपहरण कर लिया है। हे वरद । आपके प्रसन्न होने पर मेरा पुत्र उसे
प्राप्त करे। (८)
हे केशव । पुन पा राज्यापहरण मेरे दु ख का कारण नहीं है अपितु शरणागत के दाय (हिस्से ) का छिन जाना मेरे हृदय को पीडित कर रहा है। (8)
श्रीभगवान ने कहा-हे देवि । तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैंने तुम्हारे उपर अनुप्रह किया है। अपने अश से कश्यप के द्वारा तुम्हारे गर्भ से मैं जन्म धारण करूगा । (१०)
तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हारे सभी शत्रुओं को मैं मारूगा । हे नन्दनि । लौट जाओ। (११)
अदिति ने कहा-हे देवदेवेश । आप प्रसन्न हों। हे विश्वभावन ! आपको नमस्कार है।हे केशव । हे ईश । जिसके भीतर सभी कुछ प्रतिष्ठित है ऐसे आपको मैं अपने उदर मे बहन न कर सकूँगी। आप विश्वयोनि एव ईश्वर है। (१२)
श्रीभगवान् ने कहा-हे नन्दिनी । मैं तुमको और अपने को भी वहन करूंगा। मैं तुम्हें पष्ट न दूंगा। तुम्हारा कल्याण हो, में जाता हूँ। (१३)
यह कह कर भगवान के अन्तर्हित हो जाने पर अदिति ने गर्भधारण किया। कृष्ण के गर्भ में आने पर समस्त पृथ्वी चञ्चल हो उठी। पर्वत प्रकम्पित होने लगे एव महासमुद्र प्रक्षुब्ध हो गए। (१४)
हे द्विजश्रेष्टो । अदिति जहाँ जहाँ जातीं या पैर रखती थीं वहाँ यहाँ की पृथ्वी खेद के कारण नम्र हो जाती थी।
जैसा कि ब्रह्मा ने (पहले ) कहा था मधुसूदन गर्भस्थ होने पर सभी दैत्यों के सेज की हानि हो गई । (१६)