वामन महा पुराण
वामन की ब्रह्मलोक में पूजा, ब्रह्मा द्वारा वामन की स्तुति एव विष्णु का वामन रुप से स्वर्ग में निवास
नारद ने कहा-महात्मा भगवान् ने जिस प्रकार पलि को याँधा था इसे मैंने सुना। किन्तु, अन्य विषय भी पूछना है। उसे सुनार आज आप मुझसे कहिये । (१)
हे तात! यह यतलाइए कि देवराज इन्द्र को संग देने के उपरान्त वे सर्वारमा भगवान विष्णु अन्वदित हो पर यहाँ पले गये। इसके अतिरिक यद पतलाइ कि गुनटस्थ दरयेन्द्र ने क्या किया एवं हे यिपि ! मुझे पिशेपस्प से यह सूचित फॉकि तदुपरान्त यह कौन-सी चेष्टाएँ करता था ? (२३)
पुलस्त्य ने कहा-विरोहित होने पे उपरान्त थामन देष ने अपना यामन स्यरूप त्याग दिया एवं गरुड पर आरक्ष होकर गुरायास प्रह्मलोक गये। (४)
यासुदेय को आया जानकर अव्ययात्मा कमलासन महा (अपने आसन से) उठे ज्यं सौहादपूर्पक (विष्णु पा) आलिगनरिये।
भासिनोपपन्न विधिपूर्वक पूजादि द्वारा हरि की अर्चना कर जमा ने पूमा-पिरकालोपराम आपके यहाँ । आने का क्या कारण है।
तदनन्तर जगत्स्यामी ने फहा-मैंने महान कार्य किया है? हे स्वयम्भो। सुरों के या भाग के लिए मैंने पलि यो पाँधा है।
यह यचन सुनकर ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा-कैसे आप उस रूप को मुझे दिग्रलायें। ऐमा पचन कहे जाने पर भगवान् गररचज ने शीघ्रता से यह सर्वदेवमय रूप दिरगया।
अयुत योजन विस्तृत तथा उतने ही ऊँचे पुण्डरीकाक्ष को देखकर पितामह ने प्रणाम किया। (१०)
पदनन्तर देर तक प्रणाम पर मसाने 'साधु, साधु' पदा एवं भरिपूर्ण नम्रता से महादेय की स्तुति करने लगे-(११)
है देयापिदेय! यामुय! एकर! पम्प ! पृपायपि भूतभावन 'मुरामुरमेष्ठ! मुरमुरमयना पीवयास ! मोनियाम' अरनिर्मितान्त। अमितनिर्मित! कपिल!
महारपिट' पिण्यान! नारायण ! थापको नमसारी।
पन्यत्र! मारभ्यत! गरमध्यन तारयन! पेरण्ठ । पुरोग! याय! पिगु' भपता जप । जपा ! पिजय । साप! महादेय! धनादि। अनग! भादन ! सभ्यनिधन ! पुरग ! धनप ! गुपिमर ! हरिनगर्भ (भाप ना
समन्त्रा! यमरा1' पनि! विशुगर! मूना पराम! समाधिपास ! भो भगांका। माम! पदापर पर किया' परमार कापर' परपर। मनाम ( मापार दि सिमा नाका पुरा एस' गमन ' नाममा 'ना' 'भूगर ! ! मर: मान !
हरिश' गुरंश' पंप मैन' गुण' स्पून! पात:का' जानिय प्रीतिर प्रीनिगार हम' नीटशाग ' मेरा ' ममाधिपाग! मुशेशय' अशा गपिन्द । जगान' मदन' पामन ' मानमार। [27]
भार मारी, महसनं, गहराया, यमन, महापुर,प, महरा ६ मामी। भारत सदराम । भार विपक्ष ' वि भर्ग पर पिन प्राभार गुजर समे मा. नागार मे पानो
पृथ्वी, श्रवण से दिशाएँ एय तेज से नक्षत्र उत्पन्न हुए है। समस्त मूर्त एव अमूर्त पदार्थ आपसे समुद्भूत हुए हैं। [41]
अत आप विश्वात्मक है आपको नमस्कार है। आप पुष्पहास, गहाहास, परम, ॐकार, वषट्कार, स्वाहाकार, बौपटवार, स्वधाकार, वेदमय, तीर्थमय, यजमानमय, यज्ञमय, सर्वधाता, यज्ञभोक्ता, शुन्धाता, भूर्द, भुपर्द, स्वर्द, स्वर्णद गोद एव अमृतद हैं। , आप ब्रह्मादि, ब्रह्ममय, यज्ञ, वेदकाम, वेद्य, यज्ञधार, महामीन, महासेन, महाशिरा, नृकेसरी, होता, होम्य, हव्य, हूयमान, यमेध, पोता, पाययिता, पूत, पूज्य, दाता, हन्यमान, हियमाण एव इर्ता हैं। * आप नीति, नेता, अग्य, विश्वधाम, शुभाण्ड, ध्रुव, आरणेय, पान, ध्येय, ज्ञेय, ज्ञान, यष्टा, दान, भूमा, ईक्ष्य, ब्रह्मा, होता, उद्गाता, गविमानों की गति, शानियों के ज्ञान, योगियों के योग, मोक्षार्थियों के मोक्ष, श्रीमानों की श्री, गृह्य, पाता एव परम हैं। [60]
आप, सोम, सूर्य, दीक्षा, दक्षिणा, नर, त्रिनयन, महानयन, आदित्यप्रभव, सुरोत्तम, शुचि, शुक्र, नभ, नभत्य, इप, ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्य, मधु, माधव, काल, सक्रम, विक्रम, पराक्म, अश्वग्रीन, महामेध, शङ्कर, हरीश्वर, शम्भ, ब्रह्मेश, सूर्य, मित्रावरुण, प्राग्वंशकाय, भूतादि, महाभूत, ऊर्मफर्मा, कर्ता, सर्वपापविमोचन एवं त्रिविक्रम है। * आपको नमस्कार है। [10]
पुलस्त्य ने कहा-ब्रह्मा एव तपस्वियों के इस प्रकार स्तुति करने पर अद्भुत कर्मचारी विष्णु ने प्रपितामह देव से कहा-हे अमलसत्त्ववृत्ति । आप वर माँगिये। (१२)
पितामह ने प्रीतिपूर्वक उनसे कहा-हे विभो! हे मुरारि! आप मुझे यह पर प्रदान करें कि आप इस
पवित्र रूप से मेरे भवन में स्थित रहें। (१३)
देवश्रेष्ठ के ऐसा वर माँगने पर अव्ययात्मा प्रभु ने सनसे कहा-ऐसा ही होगा। तदनन्तर वे स्वयम्भू के भवन मे वामनरूप से पूजित होते हुए रहने लगे। (१४)
वहाँ अप्सराओं का समूह नृत्य करने लगा, सुरेन्द्र के गायक गान करने लगे, विद्याधर श्रेष्ट तूर्य यजाने लगे एवं देव, असुर तथा सिद्धों के संघ स्तुति करने लगे।
विभु को समाराधना के उपरान्त पितामह ब्रह्मा निष्पाप एव शुद्ध हो गए। स्वर्ग मे ब्रह्मा ने घर में से सुन्दर पुष्पों को लार उनसे विष्णु का पूजन (१६)
विष्णु पर्ग मे वामन रूप से सहस्र योजन विस्तृत हो गये। हे महर्षे। वहाँ इन्द्र ने ब्रह्मा के समान गुणयुक्त पदार्थों से उनकी पूजा की। (१७)
हे विष। महात्मा भगवान् त्रिविक्रम ने बलि को रसातल में भेजकर देयताओं का जो हितसाधन किया था, वह मैंने आप से कहा। दैत्य ने रसातल मे रहते हुए जो कार्य किया उसमा वर्णन मैं आज कर रहा हूँ। उसे सुनो। (१८)
पुलस्त्य ने कहा-रसातल मे जाकर दैत्य ने बहुमूल्य मणियों से चित्रित शुद्ध स्फटिक के सोपान से भूपित नगर पनवाया। (१)
विश्वकर्मा ने उसके मध्य में सुविस्तीर्ण वनमय चेदियों वाला एवमुक्ताजालयुक्त द्वार वाला प्रासाद बनाया। (२)
बलि अनेक प्रकार के दिव्य तथा मनुष्यों के योग्य भोगों का उपभोग करते हुए वहाँ रहने लगा। विन्ध्याचली नाम की उसकी प्रिय पत्नी थी ।
हे मुनि। वह सहस्रों युवतियों में प्रधान एक शीलसम्पन्न स्त्री थी। महातेजस्वी विरोचन पुन पलि उसके साथ रमण करने लगा। (४)
भोगासक्त दैत्य के सुतल में रहते समय एक दिन दैत्यतेजोहर सुदर्शन चक्र पाताल मे प्रविष्ट हुआ।
चक के पाताल में प्रविष्ट होने पर दानवों के पुर मे क्षुब्धसागर के तुल्य महान् हलहलाशब्द उत्पन्न (६)
उस महान शब्द को सुनकर असुरश्रेष्ठ बलि ने हाथ मे एक तलवार लिया और इस प्रकार पूछा-अरे। यह क्या है? (७)
तदनन्तर शुचिव्रता धर्मपत्नी विन्ध्यावली ने अपने पति को सान्त्वना देकर तथा खड्ग को कोश मे समाविष्ट पर यह कहा-
यह भगवान् महात्मा वामन का दैत्यसमूह का विनाश करने वाला पूजनीय चक है। ऐसा कहकर वह सुन्दरी अर्घपान सहित बाहर गयी।
उसी बीच विष्णु का सहख अरों वाला सुदर्शन चक्र आ पहुँचा। हे मुनि । असुरपति ने नम्नतापूर्वक हाथ जोडकर विधिवत् चक्र का पूजन किया एवं (१०)
बलि ने कहा-दैत्य-समूह को विदीर्ण करने वाले सहस्राशुयुक्त, सहस्र आभा वाले, सहस अरों से युक्त निर्मल विष्णु के सुदर्शन चक्र को मैं नमस्कार करता हूँ।
विष्णु के उस चक्र को मैं नमस्कार करता हूँ, जिसकी
मामि पिगमा गोरी पर महादेश, भर गून में गार पर, रों में प, पूर्व, प्रत, भादि देवता, में पायु, और भा भरों के किनारों में श, गभर नाराओं ऐ समूह या पायभाग में पापार भारी मुनि सिमा है। (१२)
में भर्षिक यादेच आयुम पागमागर को परतारादपि दामन मेनारिस पाधिक मानामा पापों का भार पर। ६
अग्युराध। मेरा मानुर पापा पेग से आप हरण करें। आपरमवार मेरो ममा वाभि स्याधियों का नाश हो जाय । पम । आपने नामापीन परने में पापों का नाम दो जाय । (१५-१७)
ऐगा पदर गतिमान् (प) ने मणिपूर्वर पर पी पूजा कर गपापनाशक पुरीग: पा (१८)
है मुति। पछि से पूजित गर. अमुरो पो निरज पर पातालमेनियर र दक्षिण की शोरगरा। (१९)
मुदर्शन में मिल जाने पर थलि परयन्त विकल हो गए। घोर आपति आने पर होने अपने पितामह को
तरिया। (२०)
पर ही दोपर (प्रदूराद ) मुगल में आ गो। ( पा)गदी महासाची निसान दा भागिदाहुए। (२१)
ना। गत पम विरामद की विधिवत पूजा परी परान पनि हाय मोड पर यद परन पदा- (२२)
गा। आयप वि पिरा से मैंने आप पारण विगाह। बा देगा। गुऐ दिशा, पथ्य एवं सेयर सा उपदेश (२३)
ऐना। मनुष्य का संसार में दो हुए पया पाना पादिएपित मेरो पन्धन न हो। (२४)
आप मुझसे मार समुद्र में मान अल्पमति मनुष्यों पो परने पोशिपोस्यस्पक्या है इसे पाये। (२५)
पुराय ने यहा अपने पौत्रणे यस यपन यो मने फे पाना दानगर (प्रहलार) ने विचार पर ससार में दिवार धेष्ठ पगा पहा । (२६)
माय ने पहा-हे दाम तुम धन्य हो कि , गुम्दे पेसी गति पर हुई। हे पलि ! अब मैं तुम्हारे एवं
दूसरों के लिए हितकर वचन कहता हूँ । (२७)
ससार रूपी समुद्र मे निमग्न, द्वन्द्वरूपी बायु से आहत, पुन, कन्या, पत्नी आवि की रक्षा के भार से दुखी, भयकर विषयरूपी जल मे मग्न हो रहे नौसरहित मनुष्यों के लिये विष्णु रूप नौका ही एकमात्र शरण होती है। (२८)
आदि, मध्य एव अन्त रहित, शुभदाता, वरेण्य, गरुड वाइन, लक्ष्मीपति, शुद्ध, सुरगुरु, नारायण हरि का आश्रय ग्रहण करने वाले धीर मनुष्य यमराज के शासन में नहीं पड़ते। (२६)
यमराज पाश हाय मे लिये खडे अपने दूत को देखकर उसके कान में कहते हैं कि मधुसूदन की शरण में गये हुये मनुष्यों को छोड़ देना। क्योंकि मैं अन्य मनुष्यों का ही प्रभु हूँ, वैष्णवों का नहीं। (३०)
इसके अतिरिक्त भक्तियुक्त नरपुगर इक्ष्वाकु ने कहा था कि पृथ्वी में विष्णुभक्त व्यक्ति यम की गति से बाहर है। (-१)
वही जिता है जो हरि की स्तुति करती है, यही चित्र
है जो उनमें रत है, वही करयुगल प्रशसनीय हैं जो उनकी पूजा करते हैं। (३२)
जो परयुगल श्रीहरि के चरणारविन्द युगल की पूजा नहीं करते, वे हाथ नहीं है, अपितु वृक्षशाखा के अप्रपल्लव हैं। (३२)
जो जिह्वा हरि के गुणों का वर्णन नहीं करती, वह जिता नहीं अपितु कण्ठशालूरु (मेढक का कठ), प्रतिजिह्वा अथवा अन्य कोई रोग है। (३४)
भक्तिपूर्वक विष्णु के चरणकमल का पूजन न करने घाला मनुष्य जीवित ही मृत तुल्य है एव बन्धुजनों के लिये शोचनीय है। (३५)
यह सत्य कहता हूँ कि वासुदेव के पूजन मे निरन्तर रत मनुष्य मरने पर भी शोचनीय नहीं होते। (३६)
समस्त शारीरिक, मानसिक, वाचिक, मूर्त, अमूर्त, चर, अचर,दृश्य, स्पृश्य एव अदृश्य पदार्थ विष्णु स्वरूप हैं। (३७)
त्रिविक्रम भगवान् की चार प्रकार से अर्चना करने वाले मनुष्यों ने निस्सन्देह सुरासुर सहित समस्त लोगों का अर्चन कर लिया है। (३८)
हे पुन्न जिस प्रकार समुद्र के रत्न असख्य
है, उसी प्रकार चक्रधारी विष्णु के गुण भी असख्य हैं। (२९)
हाथों में शर, चक्र, स्मल एवं शाह धनुप धारण करने याठे, गरुडध्वज भयभीतिनाशक, परदाता श्रीपी का आश्रय प्रहण करने वाले मनुष्य पुन ससार गर्न में नहीं गिरते।
हे पलि | गोविन्द जिनके मन में सतत निवास करते । उना पराभव नहीं होता एव वे मृत्यु से उद्विग्न नहीं (५१)
श्रेष्ठ शरणस्थान, शाहधर देव विष्णु की शरण में पहुँचे मनुष्यों को यालोक या नरक में नहीं जाना पड़ता। (८२)
हे दानवश्रेष्ठ। ध्रुतिशास्त्रविशारद विप्रो को यह गनि नहीं प्राप्त होती जो गति विष्णुभक्त प्राप्त करते है। (४३)
हे दैत्यश्रेष्ट । महान् युद्ध में निहत व्यक्ति जो गति प्राप्त करते है, विष्णुभक्त नरश्रेष्ठ को उससे भी उत्तम गति प्राप्त होती है। (४४)
हे दैत्य । धर्मशील, सात्त्विक, महात्माओं को जो गति माप्त होती है, मगरद्भक्तों की भी यही गति रही गई है। (४१)
अनन्यभाय से भगरान की भक्ति करने वाले ससं. यास, भूक्ष्म, अव्यक्त पारीर याने महारमा वासुदेव में प्रवेश करते है। (४६)
अनन्यमन से भक्तिपूर्वक पेशन को नमस्कार करने यारे मनुष्य पवित्र एव तीर्थस्वरूप होत हैं। चल्ते, सड़े, सोते, जागते, एय साते पीते हुए निरन्तर नारायण का ध्यान करने यार से अधिक पुण्य का भाजन कोई नहीं होता। यथाविधि भवरन्धन का समुच्छेद करने याने सड्गपरशु वैरण्ठ देव को प्रणाम करने से ससार मे पुनर्जन्म नहीं होता। क्षेत्र में निवास परत नित्य प्रीडा करन याला अमितद्युति पृणभक्त समस्त शरीरों में रहने पर भी उनको कमों पन्धन में नहीं पड़ता। विष्णु जिन्हें नित्य प्रिय है ये सर्वदा विष्णु के प्रिय होत हैं। (४८-५०)
दामोदर का ध्यान करने या उनो मा, उनसे शरणागत अथवा भत्तिपूर्वक उतरा अर्चन करने यार मनुष्य पुन जन्म प्रहण नहीं करते। (३१)
है दानवेयर । प्रातल ठर महिपूर्वक मधुसूदन का स्मरण परने यान इस मसारप में निमग्न नहीं होने। उनकी स्तुति परनेयारे प्य गुण्या करने पारे मनुष्य दुर्गों को पार कर जाने हैं। (५२)
विमल रणस्पी पात्रों से परिवाक्यामृत का पान कर जिनका मन अत्यन्त प्रसन्न होता है ये फठिनाइयों यो पार कर जाते हैं। (५३)
चमगदापाणि विष्णु में स्थिर भक्ति रसने याले मनुष्य निश्चय ही योगेश्वर हरि के स्थान मे जाते है। (५४)
विष्णु की सेया मे आसक्त भक्ती यो जो श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है यह सहर समों पे भी तप से नहीं प्राप्त हो सस्ती। (५५)
मामूदन में सता पाभक्ति से रहित मनुष्यों पे जप, गन्न, तप एवं आधमों से पराभ? मधुसूदन से द्वेप करने घा मनुष्यों ये यज्ञ, वेद, दान, कान, तप ण्य योनि व्यर्थ है। (५७)
जनार्दन मे मतिरसने वालों को घटुत से मत्रों से क्या राम?"नमो नारायणाय"गन्त्रसभी अयों पा सापाह।(५८)
जिनकी गति विष्णु है ग्यं जिनके दप में इन्दीयर श्याम जनार्दन अपस्थिा है इनरी पराजय यहाँ सम्भय है? (१६)
सभी मद्दों पे माटरषरूप, परणीय, परदाता प्रभु नारायण को नमार पर समस्त फर्म करना चाहिए । (६०)
हे महासुर । विष्टियाँ, व्यतिपात एव दुर्नीति से उत्पन्न अन्य समस्त आपत्तियाँ विष्णु के नाम का स्मरण करने से विनष्ट हो जाती है। (६१)
शत कोटि च सहस्र कोटि तीर्थ भी नारायण को प्रणाम करने की सोरहवीं क्ला के भी तुल्य नहीं हैं। (६२)
पृथ्वी में जितने सीध और पविन देवालय है, ये सभी विष्णु के नाम के सकीर्तन से प्राप्त होते हैं। (६३)
श्रीकृष्ण को नमामार करने याने मनुष्य जिन रोकों चोप्राप्त परते है उन्हें प्रती या तपरची लाग नहीं प्राप्न (६४)
अन्य देवता या भक्त होते हुए पेशर या मिथ्या अर्चन यरने वाला मनुष्य भी पुण्यममा साधुओं के महान स्थान को प्राण परला है।
इपीरेश पे सतत पूतन से जो पल ात होना है पोर तप यरने पारे मनुष्यो यो यह पल भी नहीं प्रात होता।
तनों सभ्याराल में पद्मनाभ पा स्मरण करने या घुद्धिमान पुरुषों को निरादेव उपपास या प्राप्त होता है।
हे बलि ! कारों में प्रतिपादित पमं द्वारा मान दरिया
अर्चन परो। उनके प्रसाद से श्रेष्ठ शाश्वती सिद्धि प्राप्त (६८)
हे पुन! तुम तम्मना, सद्भक्त एय उनका भजन करने पाला होकर उन्हें नमस्कार परो। उन देवेश का ही आनय महण पर तुम सुस प्राप्त करोगे। (६९)
आध,अनन्त, अजर, सर्वत्रगामी,शुभदाता,ब्रह्ममय पुराण, अव्यय हरि का अहोरात्र स्मरण करने वाले पृथ्वीपासी वेष्ट मनुष्य भूय एवं अभय पैष्णय पद प्राप्त यरते हैं। (७0)
जो वीतराग एवं परापरक्ष मनुष्य सतत सुरगुरु ! नारायण का स्मरण करते हैं वे धुले हुए श्वेत पसों यार राजसो फे सदश संसार रूपी सागर के जल को पार कर (७१)
जो मनुष्य सतत उत्तम मलदल तुल्य विस्तृत नेत्रों पाने निष्कल्मप, नियामक अच्युत का ध्यान करते हैं वे उस ध्यान से पापवेदना का नाश हो जाने से पुन माना के पयोधर का रस नहीं पान करते । (७२)
हाथों में शर, कमल, चक, प्रेष्ठ धनुप, गदा घि असि धारण काने वाले. लक्ष्मी के बदनपङ्कज के भ्रमर, परदाता पद्मनाभ का कीर्तन करने वाले मनुष्य निश्चय ही मधुसूदन का लोक मात करते हैं। (७)
अमृतप्राशन से तृप्त होने यारे प्राणी के सदृश भक्ति- परायण मनुष्य आद्य भगवान का कीर्तन सुनार पापमुक्त एय मुसी होते हैं। (७१)
अत श्रद्धालु मनुष्य को विजणु का ध्यान, स्मरण, कीर्तन अयया पाठ करने वाले मनुष्यों से विष्णु के नामों का प्रयण परना चाहिये। देवगण पूजा के तुल्य उसरी प्रशसा करते हैं।
स्वस्थ, याह्य तथा आन्तरिक इन्द्रियों से जो मनुष्य पुष्प, पत्र, जल एवं पहादि द्वारा नियामक पेशा या अर्चन नहीं करता निश्चय ही विधिरूपी तर ने उसे लूट लिया है।