वामन महा पुराण
सरोमाहात्म्ये 11 मार्कण्डेयकृत सरस्वती की स्तुति मार्कण्डेय द्वारा सरस्वती से कुरुक्षेत्र प्रवेश के लिए प्रार्थना
करता है। (९०)
(इसको सुनने से) ब्राह्मण को वेद की प्राप्ति होती है, क्षत्रिय पृथ्वी की जय प्राप्त करता है तथा वैश्य को धन समृद्धि एवं शूद्र को सुख की प्राप्ति होती है। वामन का माहात्म्य सुनने से पापों से मुक्ति होती है।(११)
ऋषियों ने पूछा-कुरुक्षेत्र में प्रवाहित होने वाली नदियों में श्रेष्ठ महाभागा यह सरस्वती नदी कैसे उत्पन्न हुई ?
सरोवर मे जाकर पार्यों में तीर्थों की सृष्टि करते हुये दृश्याश्य गति से यह शुम नदी किस प्रकार पश्चिम दिशा को गई ? विस्तारपूर्वक इस सनातन तीर्थ यश (परम्परा- क्रम, विस्तार) का वर्णन करे। (२)
लोमहर्षण ने कहा-स्मरणमात्र से नित्य सर्वपापचय परने वाली यह सनातनी श्रेष्ठ नदी प्लक्षवृक्ष से समुद्भूत हुई है। (३)
यह पुण्य सलिला महानदी हजारों पर्वनों को विदारित कर द्वैतनाम से प्रसिद्ध वन मे प्रविष्ट हुई। (४)
महामुनि मार्कण्डेय ने उस प्लझ मे सरस्वती को रियत देसकर शिर से प्रणाम करने के उपरान्त उसकी स्तुति की- (५)
हे देवि! आप सर्वलोकों की माता एव देवों की शुभ अरणि (उत्पादक - जननी) है। हे देवि ! समस्त सद्, असद्, मोक्षदायी एव अर्थयुक्त पद योगयुक्त पदार्थ, की भाँति आप मे सयुक्त होकर स्थित हैं। हे देवि । अक्षर परम ब्रह्म, तथा यह विनाशशील विध आप में प्रतिष्ठित है। (६-७)
जिस प्रकार काष्ठ में वह्रि एक भूमि मे गन्ध की शाश्वत स्थिति होती है उसी पकार तुम्हारे भीतर ब्रह्म एव यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। (८)
हे देवि। जो कुछ भी स्थिर तथा अस्थिर है वह सब ओंकार अझर में स्थित है। जो कुछ भी अस्ति या नास्ति है उन सब मे ओंकार की तीन मात्रायें अनुस्यूत है। (९)
(भू, भुव , स्व) तीनों लोक, (ऋक् , यजु , साम) तीन वेद, (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व) तीन विद्याय, (गाईपत्य, आवहनीय, दक्षिणाग्नि) तीन अग्नियाँ, (सूर्य, चन्द्र, अग्नि) तीनों ज्योतियाँ, (धर्मादि) तीन वर्ग, (सत्यादि) तीनों गुण, (ब्राह्मणादि) तीनों वर्ण, तीनों देव, (वात, पित्त, कफ) तीनों धातुएँ तथा (जाप्रत, स्वप्न, सुपुप्ति), तीन अवस्थायें एव वोन (पिता आदि) पितर आदि ये सभी माना प्रय, हे सरस्वति । आप के रूप है। आप को ब्रह्मकी विभिन्न रूपों वाली आद्या एव सनातनी (मूर्ति कहा जाता है)। (१०-१२)
हे देवि । ब्रह्मवादी लोग आप के नाम का उच्चारण करके सोमसस्था, इवि सस्था एव सनातनी पाक्सस्था को करते हैं। (१३)
अर्धमात्रा में आश्रित आप का यह अनिदेश्य पद अविकारी, अक्षय, दिव्य तया अपरिणामी है। (१४)
यह आप का अनिर्देश्य पद परम रूप है जिसका वर्णन में नहीं कर सकता। न तो मुस से ही इस वर्णन हो सकता है और न जिह्वा, तालु, ओष्ठादि से ही। (१५)
तुम्हारा यह रूप ही विष्णु, वृप (धर्म) ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य एव ज्योति है। उसी को विश्वावास, विश्वरूप, विश्वात्मा एव अनीश्वर (स्वतन्त्र) कहते हैं। (१६)
आप का यह रूप साख्य सिद्धान्त तथा वेद द्वारा पर्णित, बहुत सी शाखाओं द्वारा स्थिर किया हुआ, आदि मध्य अन्त विहीन, सम्-असत् तथा एकमात्र सत् है। (१७)
यह एक तथा अनेक प्रकार का, वेदों द्वारा एकाप भक्ति से आश्रित, आख्या विहीन, ऐश्वर्यादि पड्गुणों से युक्त, बहुत सी आख्याओं वाला तथा निगुणाश्रय है। (१८)
आप का यह तत्त्वगुणात्मक रूप नाना शक्तियों के विभाव (उद्भव) को जानने वाला, तथा नाना शक्तियों का विभावर (जनक) है। वह सुखों से बढकर सुख तया महत्सुस है। (१६)
हे देवि । इस प्रकार से अद्वैत तथा द्वेद मे आनित निष्फल तथा सफल ब्रह्म आप के द्वारा व्याप्त है। (२०)
हे देवि ! जो पदार्थ नित्य है तथा जो विनष्ट हो जाने वाले है, जो पदार्थ स्थूल है तथा जो सूक्ष्म है, जो भूमि पर हैं तथा जो अन्तरिक्ष में है या जो अन्यत्र है उन समस्त पदार्थों की उपलब्धि आप से ही होती है। (२१)