वामन महा पुराण
दण्डक द्वारा अरजा का धर्पण शुक्र द्वारा दण्डक को शाप प्रदान प्रह्राल का अन्धक से परस्रीवर्जन का उपदेश अन्धक का शिव के समीप दूत प्रेपरण अन्धक का शिव के साथ युद्धे घोग
अरजा ने यहा हे महीपति। आपके अधिक पहने से क्या होगा ? (पिता के) शाप से आपरी एवं अपनी रता करती हुई में आपको आरमदान नहीं करूँगी।
प्रसाद ने कहा-कामान्ध उस मूर्स ने इस प्रकार विवाद करती हुई शुक्र की उस पुत्री यो बलपूर्वक भ्रष्ट कर दिया। (२)
मदान्ध राजा उसका चरित भ्रष्ट कर उस आश्रम से निकल कर अपने नगर चला गया। (३)
तदनन्तर रज से आप्लुत वह तन्वद्गी शुनसुता अरजा भी आश्रम से निकलकर नीचा मुख किये हुए बाहर बैठ गई। (४)
महाप से उपतप्त चन्द्र प्रिया रोहिणी के सदृश वह अपने पिता का चिन्तन करती हुई पारम्बार रोने लगी।
तदनन्तर बहुत समय के बाद यज्ञ समाप्त होने पर शुफमुनि पाताल से अपने आश्रम में आये।
हे दैत्य ! उन्होंने आश्रम से बाहर आकाश में सन्ध्या- फालीन लालिमा से रजित मेघ माला की तरह अपनी रजस्वला पुनी को देसा। (७)
उसे देखकर उन्होंने पूछा -हे पुनी। किराने तुम्हारा धर्पण किया है ? रोपयुक्त सर्प से कौन क्रीडा कर रहा है। (८)
शुद्ध-चारित्र्यसम्पन्न तुम्हें भ्रष्ट कर कौन दुर्मति पापी आज ही यम पुरी जाने वाला है ?
तदनन्तर अपने पिता को देखकर बारम्बार काँपती एवं रोती हुई लजायुक्त अरजा ने धीरे धीरे कहा- (१०)
बार-बार मना करने पर भी आपके शिष्य दण्ड ने रोती हुई मुझ अनाथा को बल पूर्वक कलङ्कित किया । (११)
पुत्री का यह वाक्य सुनकर शुक्राचार्य के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने आचमन कर शुद्ध होकर यह वचन कहा- (१२)
क्योंकि उस अविनीत ने मुझसे प्राप्त उत्तम अभय एवं गौरव को तिरस्कृत कर अरजा को धर्मभ्रष्ट किया है अतः
वह सात रात्रियों में उपलवृष्टि के कारण राष्ट्र, सेना, भृत्य एवं वाहनों सहित विनष्ट हो जायेगा। {१३-१४)
उन मुनिश्रेष्ठ ने ऐसा कहकर दण्ड यो शाप देने के उपरान्त अपनी पुत्री से कहा-हे एत्री ! हे कल्याणी ! पाप से मुक्त होने के लिए तुम तप करती हुई यहीं रहो। (१५)
भगवान् शुक्र इक्ष्वाकुनन्दन दण्ड को इस प्रकार शाप देकर शिष्य के साथ दानवों के निवास स्थान पाताल में चले गये।
तदनन्तर दण्ड भी महती उपलवृष्टि के द्वारा सात- रात्रियों के भीतर अपने राज्य, सेना, और वाहनों के साथ नष्ट हो गया।
इसी से देवताओं ने दण्डकारण्य का परित्याग कर दिया एवं शम्भु ने उसे राक्षसों का स्थान बना दिया। (१८)
इस प्रकार परस्त्रियाँ सुकृतियों को भी भस्मीभूत कर देवी हैं। सामान्य मनुष्य तो महान पराभव प्राप्त करते हैं। (१६)
अतः हे अन्धक! आपको ऐसी दुर्बुद्धि नहीं करनी चाहिए। साधारण स्त्री भी जला सकती है तो पार्वती का क्या कहना (२०)
हे दैत्येश्वर ! सुर या असुर कोई भी महादेव को जीत नहीं सकता। जय अमित ओजस्वी शंकर को रण मे देखा भी नहीं जा सकता तो उनसे युद्ध करना कैसे सम्भव है ? (२१)
पुलस्त्य ने कहा-ऐसा वचन कट्ने पर मुद्ध एवं रक्तनेत्र महातेजस्वी अन्धकासुर ने दीर्घ श्वास लेते हुए प्रहलाद से (यह) वाक्य कहा- (२२)
हे असुर ! क्या भस्मलित शरीर वाला धर्म रहित एकाकी पद्द त्रिलोचन संग्राम मे मुझसे युद्ध कर सकता है? (२३)
जो अन्धक इन्द्र या (अन्य) देवताओं से कभी भयभीत नहीं होता यह वृपवाहन एवं स्त्री का मुख देखने वाले त्रिनेत्र से कैसे डर सकता है ? (२४)
हे नारद । उसके उस घोर वचन को सुनकर प्रहलाद ने कहा-आप ने यह ठीक नहीं कहा है। आपसा कथन धर्म एवं अर्थ के विरुद्ध है। (२५)
हे अन्धक! अग्नि एवं पतङ्ग, सिंह एवं शृगाल, गजेन्द्र एवं मशक तथा स्वर्ण एय पापाण मे जितना अन्तर रहा जाता है उतना ही अन्तर आप और शङ्कर के मध्य है। (२६-२७)
हे वीर! आपको मैंने रोग है एवं वारयार रोक रहा हूँ। आप देवपि असित का वचन सुनें। (२८)
जो व्यक्फि धर्मशील, अभिमान एवं क्रोध को जीवने थाला, विद्या से विनीत, किसी को दुख न देने वाला, अपनी पत्नी में सन्तुष्ट तथा परस्त्री का पर्जन परने वाला होता है उसे संसार में कोई भय नहीं होता। (२९)
जो व्यक्ति धर्महीन, कलहप्रिय, सदा दूसरों को दुख देने वाला, वेद-शास्त्र रहित, दूसरे के धन और स्त्री की इच्छा रखने वाला, तथा भिन्न वर्ण के साथ संसर्ग करने वाला होता है, यह इस लोक और परलोक में सुख नहीं प्राप्त करता। (३०)
भगवान भास्कर धर्मयुक्त थे, महर्षि वारुणि (वशिष्ठ) मोधत्यागी थे, सूर्यपुत्र मनु विद्यावान थे एवं अगस्त्य ऋपि अपनी पत्नी में सन्तुष्ट थे। (३१)
मैंने कुल के क्रमानुसार इन पुण्य करने वालों का उल्लेख किया है। शाप एवं घर देने में समर्थ ये सभी तेजस्वी लोग देवताओं और सिद्धों के पूजनीय हुए। (३२)
अङ्ग-पुत्र(वेन) अधर्ग युद्ध था, विमुनिस्त कलह प्रिय था, दुरात्मा नमुचि दूसरे को संताप देने वालाथा। एवं राजा नदुष दूसरे की स्री प्राप्त करना चाहता था।
दिति पुत्र हिरण्याश्च परधन का लोभी था, उसका अनुज दुर्मति एवं मूख था एवं पराक्रमी युद्ध भिन्न-वर्ण के साथ ससर्ग करने वाला था। ये सभी पूर्वकाल में दुर्नीति के कारण नष्ट हो गये।
इसलिये धर्म का स्थान नही करना चाहिए क्योंकि धर्म ही परम गति है। धर्महीन मनुष्य महान गौरव नरक में जाते हैं।
मनुष्यो ने धर्म को लोक तथा परलोक पार करने वाला बताया है तथा अधर्म को इस लोक और परलोक में पतन का कारण बताया है।
धार्मिक व्यक्तियों को परस्त्री-सेवन सदैव स्थाज्य बताया है। परस्त्रियाँ इक्कीस नरको मे ले जाती है। हे अन्धक सभी वर्णो के लिये यह निश्चित धर्म है।
जो मनुष्य परधन और परस्त्री में इच्छा करता है यह
घोर रौरव नरक में यहुत वर्षों के लिये चला जाता है। (३८)
राक्षसराज । प्राचीन काल मे महात्मा देवर्षि असित ने गरुड तथा अरुण से यह धर्म व्यवस्था कही थी। (३९)
अत बुद्धिमान मनुष्य परस्त्रियों का दूर से ही परित्याग कर दे। क्योंकि निकृष्ट बुद्धि वाले मनुष्यों को परस्त्रियाँ पराभव को प्राप्त कराती हैं। (४०)
पुलस्त्य ने कहा-ऐसा वचन कहने पर अन्धक ने प्रह्लाद से कहा कि आप अकेले धार्मिक है। मैं धर्म का आचरण नहीं करता। (४१)
प्रहाद से ऐसा कहकर अन्धक ने शम्बर से कहा- हे शम्बर। तुग मन्दर पर्वत पर जाओ और शरीर से कहो- (४२)
भिक्षुक । तुम गुफाओं से युक्त तथा स्वर्ग तुल्य मन्दर पर्यंत का उपभोग क्यों कर रहे हो? मुझे बताओ कि इसे तुमको किसने दिया है ? (४३)
इन्द्रादि समस्त देवता मेरा शासन मानते हैं। अब तुम मेरी अवज्ञा करके इस मन्दर पर्वत पर वैसे रह रहे हो? (४४)
यदि यह शैलेन्द्र तुम्हें प्रिय है तो मेरे कथन के अनुसार कार्य करो। तुम्हारी जो यह परनी है उसे मुझे शीघ्र दे दो।
उसके ऐसा कहने पर शम्बर शीघ्रता पूर्वक उस मन्दर पर्वत पर गया जहाँ पिनास्पाणि शकर देवी के साथ निवास करते थे। (४६)
दनुपुत्र ने यहाँ जाकर यथावत् अन्धक का वचन कहा । शङ्कर ने पर्वतनन्दिनी के सुनते हुए उसे उत्तर दिया। (४७)
बुद्धिमान् इन्द्र ने मुझे यह मन्दर पर्यंत दिया है। अत वृत्रासुर वैरी इन्द्र की आज्ञा विना मैं इसे नहीं छोड सकता। (४८)
दानव ने जो यह कहा कि गिरिनन्दिनी को मुझे दे दो, तो ये अपनी इच्छा से जा सकती हैं। मैं इन्हें नहीं रोक सकता। (४९)
हे मुनिसत्तम । तदनन्तर गिरिसुता पार्वती ने शम्बर से कहा-हे वीर। तुम जाकर बुद्धिमान् अन्धक से मेरी बात कहो- समाम मै मैं पतास हूँ। आप और शङ्कर खेलने वाले हैं। प्राणों का धूत फैलाकर जो जीतेगा वह मुझे प्राप्त करेगा। (११)
ऐसा कहने पर बुद्धिमान् शम्बर अन्धक के
समीप गया एव शङ्कर तथा गौरी की कही हुई यात को (५२)
उसे सुनकर दानवपति के नेत्र क्रोध से दीप्त हो गये । दीर्घ श्याँस लेते हुए दुर्योधन को बुलाकर उसने कहा- (५३)
हे महाबाहु । शीघ्र जाओ एव दुश्चरिना स्त्री के सरश दृढ़ समामिझी भेरी को भली भाँति वजाओ। (५४)
तदनन्तर अन्धक से आदेश प्राप्त कर दुर्योधन अत्यन्त वल, प्राण एव वेग पूर्वक भेरी को बनाने लगा। (५२)
पलवान दुर्योधन द्वारा ताडित भेरी सुरभी ये शब्द सदृश शीघ्र भयङ्कर शब्द करने लगी। उसके उस स्वर को सुनकर सभी महान असुर 'यह क्या है ?' ऐसा कहते हुए शीघ्रता से सभा मे आ (५७)
बलयान सेनापति ने उन सभी से यथार्थ तथ्य कहा। बलवानों में श्रेष्ठ वे सभी युद्ध की आकाक्षा से
तैयार हो गये। (५८)
हाथी, ऊँट, घोड़ों और रथों सहित वे सभी अन्धक के साथ बाहर निकले । पाँच नल्व-अर्थात् ४०0 हायके पाले रथ पर आरूढ होकर अन्धक त्रिलोचन शकर को जोतने का निश्चय पर बाहर निकला । जम्भ, फुजम्भ, हुण्ड, तुहुण्ड, शम्बर, बलि, माण, कार्तस्वर, हस्ती, सूर्यशत्रु, महोदर अय शङ्ख शिथि, शाल्व, वृषपर्या, विरोचन, हयग्रीव, कालनेमि, सलाद, कालनाशन, शरभ, शलभ, वीर्यवान् विप्रचित्ति, दुर्योधन, पाक, विपाक, काल एव शम्बर-ये सभी तथा अन्य अनेक महावीर्यशाली तथा महाबलान् राक्षस नाना प्रकार के आयुधों को धारणकर उत्सुकता पूर्वक सप्राम मे लड़ने पे लिए चल पड़े। (५९- ६३)
इस प्रकार कालपाश से आबद्ध यह मन्दबुद्धि दनु सैन्यपति दुरात्मा अन्धक शङ्कर से युद्ध करने के विचार से महापर्वत मन्दर पर गया। (६४)