वामन महा पुराण
पुरुरवा की रुपप्राप्ति के प्रसङ्ग मे प्रेत एव वणिक् की कथा एव वणिक् से प्रेत द्वारा अपने वृत्ताम्त का कतन, प्रेत द्वारा श्रवणद्वादशी माहात्म्य का वर्णन गया में पिण्ड- दान करने से उसकी प्रेतयोनि से मुक्ति, पुरुरवा वो पूर्वजन्म मे सुरुपप्राप्ति
पुलस्त्य ने कहा-यमुनाजा में स्नान कर प्रहलाद ने त्रिविका की पूजा की एवं एक रात उपोषण करने के उपरान्त लिङ्गभेदनामक पर्वत पर चले गए।
यही विमल (जल) में स्नान कर उन्होंने भक्ति पूर्वक सादर का दर्शन किया एय एक रात नियास पर पेदार नामक तीर्थ में गए। (२)
पहाँ नानोपरान्त (उन्होंने) अभेद बुद्धि से शिव यं विष्णु का अर्चन किया प्य सार दिनों तक नियारा पर पुम्जान में चले गये। (३)
सदनन्तर उस गुन्दर तीर्थ में स्नान कर उपवास करने याले जितेन्द्रिय (मलाद) पीयेश या अर्चन फर पदरिफा आधम घले गये। (४)
पदा नियास करते हुए सरस्वती ये जल में स्नानार एन विद्वान् (प्रागार) मे नागय का पूजन किया। सदनन्तर अत्यम भक्तिपूर्वक उन्होंने यराहतीध में गरूडासन पिशुनदर्शन एवं पूजन किया।
पद से भद्रपर्ण में जार जयेश शशिशेखर शिष का दर्शन एवं पूजन पाने के उपरान्त विपाशा की ओर चले गये।
उस यिपाशा मे स्नानोपरान्त द्विजप्रिय देयाधिदेय का अर्चन र (प्रहलाद) उपवास परते हुए इरायती की ओर गा । हे द्विजश्रेष्ठ । (उन्होंने) यहाँ उन परमेश्वर या दर्शन किया जिनकी शारल में आराधना करने से पुस्रया को श्रेष्ठ स्प एघ मुदुर्लभ ऐश्वर्य प्राप्त हुआ था। (७-८)
शुष्टरोगाभिभूत भृगु ने उन परमेश्वर पी आराधार पर अतुल आरोग्य च अक्षय सन्तान प्राप्त किया (९)
नारद ने कहा-हे द्विजसत्तम । पुरूरया ने विष्णु की आराधना परने में उपरान्त किस प्रकार यस्पना यो छोडर ऐश्वर्य के साथ मुदुभ प प्राप्त पिया।
पुरम्त्य ने पहा-हे तपोधन ! सुनो, में प्रापीनराज में प्रेतायुग के आदि में पटिद पापनाशिनी कथा कहता है।
हे ब्रह्मपुत्र! प्रसिद्ध मद्रदेश में शामल नाम से प्रख्यात
उत्तम नगर है। (१२)
वहाँ सुधर्मा नाममा एक धनाढ्य गुणवान , भोगी एवं नानाशाख विशारद व्यापारी रहता था। (१३)
वह एक समय अपने राष्ट्र से सुराष्ट्र जाने को प्रस्तुन हुआ। हे कलिप्रिय ! अनेक पिमेय वस्तुओं से सम्पन्न व्यापारियों के महान समूह के साथ मार्गस्थ मरभूमि में से लाते समय रात्रि में (उसके ऊपर) डाकुओं या अति दु सह आक्रमण हुआ। (१४-१५)
तदनन्तर सर्वस्य अपहृत हो जाने से दुखित वह संयमी यणिक मरुभूमि में उन्मत्तथत विचरण करने लगा। (१६)
हे नारद ! दुःसामान्त होकर उस वन में विचरण करते हुए उसे मरुभूमि में आत्मीय के तुज्य एक शुभ शमी वृक्ष मिला। (१७)
उस शमीवृक्ष को पशु-पक्षियों से रहित देसर थका तथा भूप प्यास से अभिभूत यह वणिक उसके नीचे बैठ (१८)
शयन द्वारा पर्याप्त विश्राम कर वह मध्याह में उठा एवं सैकड़ों प्रेतों से आवृत एक प्रेत को आसे हुए (१०)
उस तनायक को एक अन्य प्रेत ढो रहा था । एवं रूक्ष शरीरयाले पिण्डाशी (प्रेत) उसके आगे दौड़ रहे थे। (२०)
पनों में पर्यटन करने के उपरान्त वह प्रेत लौटा एवं शमी वृक्ष के नीचे पहुँच कर उसने पणिक पुत्र को (२१)
स्वागत के साथ उसे अभिवादन करने के उपरान्त परस्पर वार्तालाप करके वह छाया में सुखपूर्वक पैठ गया और कुशल पूछकर जाना। (२२)
तदनन्तर प्रेनाधिपति ने वणिक बन्धु से पूछा- हे साधु । यह धतलाओ कि तुम कहाँ से आये हो एवं यहाँ जाओगे? (२३)
तुम्हारा क्ल्याण हो । मुझे यह बतलाओ कि पशु एवं पक्षियों से शून्य इस महान अरण्य में कैसे आये। (२४)
हे ब्रह्मन् ! प्रेतराज के ऐसा पूछने पर वणिर ने संक्षेप में उसे अपने देश तथा धन-नाश का पूरा विवरण चलाया। (२५)
मसका वृत्तान्त मुनने के उपरान्त उसके दुःस से दु.सित होकर प्रेतपति ने स्परन्धु के सदृश उस यणिक पुन से कहा- (२६)
हे सुव्रत ! ऐसा होने पर भी तुम्हें शोक नहीं करना
चाहिये। यदि तुम्हारा भाग्यवल होगा तो सम्पत्तियों सुन हो जायेगी। (२७)
भाग्य का क्षय होने पर धनों का क्षय हो जाता है रय पुन भाग्योदय होने से धनागम भी हो जाता है। इस ग्रीण शरीर की चिन्ता करने से उदय (वृद्धि) नहीं दोषा। (२८)
ऐसा कहकर उसने अपने भृत्यों को बुलाया पव उनमे पहा-मेरे स्यजन पे श सर्वथा इस अतिधि का हिश (२९)
हे प्रेतो । स्वजन दर्शन के तुल्य मुझे इस पणिर पुग्न पा दर्शन हुआ है। इससे समागम से मुद्दा अतुल प्रीति हुई। (३०)
उसपे इस प्रकार पहने पर यच्छ दघि और ओदन से पूर्ण अस्पतद एक नया मिट्टी या यनंन या गया। सीमार हराम जर से पूर्ण जलपात्र प्रेतों सम्मुख परिचत दुभा। (३१-२२)
पुरा मा ८५ जल को उपस्यिा देखार महामति प्रा ने कहा-६ बगिर पुत्र! तुम स्टो एवं आहिक (१२)
बदनन्तर गिर में प्रवपति दोनों ने पट जससे विधिपूरशिय माया। (३४)
तदुपरान्त (प्रेतपति ने) पहले पणिक पुत्र शे यथेच्छ दधि एवं ओपन दिया तथा तदनन्तर उन प्रेतों को दिया। (३५)
सभी के यथेच्छ भोजन एय जलपान करने के पश्चात् उस प्रेतप्रति ने उत्तम भोजन किया । (३६)
सम् । प्रेत ये पूर्ण रूप से सृप्त हो जाने पर यरिणम्पुन ये देखते ही देखते जलपात्र एच ओपन तिरोधित हो गया। (३७)
तदनन्तर मस अत्यन्त अद्भुत दृश्य को देखकर रस बुद्धिमान सयमी यणिर ने कोहल पूर्वक उस मेतपति से पूछा- (३८)
हे साधु! इस निर्जन अरण्य में अन्न ए५ गत्तम सप्ल से पूर्ण प्पट यहाँ से भाया? (३६)
तुम्हारी अपेक्षा पणे फी प्टि से पृश तुम्हारे ये मृत्य कौन हैं। बिना पुष्ट शरीर पुत सुन्दर तेज सम्पन्न रास्थयात्रपारी पहनों का परिपाटन पाने माण (आप भी पौन है? आप मुझे यह सम्पूर्ण पक्षाम पवासाय हि आप सीन पं यदीप पौन कौनपं हैं?
यणिकाध इस प्रथा के पपन को गुनमा
प्रेतनायक ने उससे सम्पूर्ण प्राचीन वृत्तान्त कहा। (४२)
(उसने कहा-प्राचीनगल मे में उत्तम शारल नामक नगा में बहुला के गर्भ से उत्पन्न सोमशर्मा नामक विख्यात प्रामण था। (४३)
मेरा पड़ोसी एक अतिधनवान, लक्ष्मीवान सोमश्रया नामक पणिक् था। यह महान यशस्वी एवं विष्णुभक्त था। (४४)
कृपण एवं मूर्स में धन होते हुये भी न तो द्विजातियों को दान परता था और न उत्तम अन्न का भोग ही करता (४५)
यदि प्रमादयश में दधि, क्षीर एवं घृतयुक्त पदार्थ भोजन करता था तो रात्रि में भयङ्कर मनुष्य मेरे शरीर को (४६)
प्रातः फाल मुझे मृत्युतुल्य घोर विचिका (हैजा) हो जाया परती थी। उस समय पोई भी पन्धु मेरे समीप नदी उदाता था। (४७)
किसी प्रकार में अपने प्राणों को धारण करना था। इस प्रकार में अति निर्टन पापयुक्त जीवन व्यतीत कर रहा था। (४८)
घेर, विलपिण्याक, सत्तू एवं शादिसराप अन्नों को साकर फालयापन करते हुए में स्वयं को क्षीण पर रहाया। (४२)
मुझे इस प्रसार यहाँ रहते हुए बहुत वाल व्यतीत होगया। (एक पार) भाद्रपदमास में श्रवणद्वादशी की तिथि आई।(२०)
नदनन्तर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक लोग इरायती और नवला नदियों के संगम में स्नान करने के लिये (५१)
पड़ोसी के कारण में भी उनके पीछे-पीछे गया। एकादशी के दिन व्रत धारण कर पवित्रतापूर्वक मैंने उपवास किया। (५२)
सदनन्तर मैंने अनेक यस्तुओं, छाता एवं जूना सहित सनम के जल से पूर्ण नरीन एवं दृढ़ जलपान दया मिष्टान्न, दधि धं ओदन से पूर्ण मिट्टी सपात्र ज्ञान एवं धर्म से मुक्त पवित्र श्रेष्ठ प्रामण को प्रदान किया। (५३-५४)
हे यजिर पुत्र! मैंने अपने मत्तर वर्ण के जीयन में यही दान दिया था। इसके अतिरिक्त अन्य इन भी नहीं दान किया।
प्रेतान्न दान करके मृत्यु के उपरान्त में प्रेत हुआ। मेरे अन्न से जीरन धारण करने वाले इन लोगों ने भी दान नहीं किया है।
मैंने तुम्हें यह कारण घनसाया जिसमे मेरे द्वारा दिया गया जल एवं अन्न प्रतिदिन मभ्याड फे समय
(मेरे ममीप) उपस्थित होता है।
जम तक में नहीं पाता तय तक उसरा क्षय नहीं होता । मेरे पाने और पीने के उपरान्त सभी कुछ तिरोहित हो जाता है। (५८)
मैंने सो पत्र दान किया था पही इस शमी वृक्ष के रूप में उत्पन्न हुआ है। एक जोड़ी जूता पा दान करने से प्रेत मेरा पाहन यना है। (५९)
हे धर्मेश! अपने प्रेार प्राप्ति का यह समस्त पियाण मैंने तुमसे पदा तया परम पवित्र और पुण्य को पढ़ाने पाटी प्रणवादशी का भी वर्णन किया है। (६०)
प्रेत पंऐसा कहने पर यणिर-पुत्र ने पहा-ई तात ने मोजो करना हो उसकी आना। (६१)
हे नारद । परिणर-पुत्र पर यह ययन मुनरर प्रेतपनि ने अपने प्यार्य को सिद्ध करने पारा यपन पहा । (६२)
दमदामनि ! मेरे दिल पेटिस नुम्हारे द्वारा किये जाने
योग्य फर्म में मुम्हें पाता है। भली उमरो । सम्पादित करने मे मुम्दारा और मेरा फल्याप होगा । (६३)
गया गर्भ में नान से पवित्र होस मेरे नाम में तुम पिण्डदान फो। (६१)
हे गगा! पहा पिणदान परन से में मार से मुज
दोश्रसर्वस्व दान करने वालों के लेक को प्राप्त करूंगा । (६५)
पोप मास के शुक्ल पक्ष की घुध पथवण नक्षत्र से युक्त पुण्य पर्धिनी द्वादशी अत्यन्त मागलिक कही गई है। (६६)
यगिर से ऐसा कहकर प्रेतराज ने अपने अनुगामियों सहित पषित्रतापूर्वक यथोचित रीति से अपने नामों को बनाया। (६७)
प्रेत के कन्चे पर आरूद करार इसे मरुभूमि से पाहर विसर्जित किया गया। इस प्रकार यह यणिर रमगीक शुरसेन नामक देश में पहुँचा।
अपने धर्म तथा धर्म के द्वारा उसने प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट एवं दोन धन उपार्जित रिया। तदनन्तर यह उत्सम गयाशीर्प नामक तीर्थ मे गया । (६९)
यहाँ प्रमश प्रेतों के उद्देश्य से पिण्डदान करन के उपरान उसने अपने पितरों एवं दायादों को पिण्ड दान (७०)
उस महायुद्धि ने अपने लिप विटादित महायपशर पिण्डदान रिया। वदन्तर अन्य गोग्रजों के निमित भी पिण्डदान किया। (७१)
विज! हम पर निरने पर येत मनभाय से मुक्त होकर प्रमक पर्ने गये। (७२)
पद पगिर पुत्र भी अपने पर पला गया और
द्वादशी का पालन करते हुए वह भी यथासमय मर गया। (७३)
गन्धर्वलोक में चिरकाल तक अत्यन्त दुर्लभ भोगों का उपभोग करने के उपरान्त मनुष्य जन्म प्राप्त कर यह ! शाफलपुरी का सम्राट् बना। (७४)
अपने धर्म तथा कर्म में रत रहते हुए यह श्रवणद्वादशी मे अनुरक्त रहा। मृत्यु के उपरान्त उसने गुह्यकों के लोक को प्राप्त किया। (७५)
यहाँ बहुत समय रहकर इच्छानुसार अनेक भोग्य पदार्थों का भोग करने के पश्चात् मर्त्यलोक मे आकर षह राजपुन्न बना। (७१)
यहाँ भी क्षत्रियों की वृत्ति से निर्वाह करते हुए वह सयमपूर्वक दान और भोग मे लगा रहा। एक समय गीयों का अपहरण होने पर उसने शत्रुओं को जीत कर मृत्यु प्राप्त की। तदनन्तर वह इन्द्र लोक में गया एव सभी देवों से पूजित हुआ। (७७)
पुण्य का क्षय होने से स्वर्गच्युत होकर वह शाकल देश में माझए हुआ। उसका रूप अत्यन्न भयङ्कर था, किन्तु यद् सर्पशारनपारगत था। (७८)
हे द्विज । उस ने अनुपम सुन्दरी प्रामण पन्या से विवाह किया। वह भामिनी अत्यन्त शीटवान् पति का भी कुरूप समझ कर अनादर करती थी। इससे यह अत्यन्त दुखित हुआ। तदननर निदयुक्त होकर यह इरानी के तटपर स्थित महान आश्रम मे पहुँचा एवं नक्षत्र- पुरुप द्वारा तनाथ रूपधारी जगन्नाथ की आराधना की। (७९८१)
इस प्रकार उसी जन्म मे परम सुन्दररूप प्राप्त कर पद अपनी भार्या का प्रिय एव ऐश्वर्यसम्पन्न हो गया। पूर्व के अभ्यास से वह सयमी श्रमणद्वादशी का भक्त बना (८२)
इस प्रार पहले कुरूप रहने पर भी भगवान की कृपा से वह द्विजश्रेष्ट कामदेव के समान रूपवान हो गया और मृत्यु के बाद राजा पुरूरवा हुआ। (८३)