सुकेशि वृत्तान्त के अन्तर्गत नरकप्रद कर्मों का वर्णन, कृतघ्न र्निन्दा के प्रसङ्ग में अपने अपने घर्गो में पदार्थो की प्रधानता का वर्णन, कृतघ्न निन्दा

तदनन्तर पश्रम नरफ को कालचफ पहते हैं। अप्र- दिष्ठ नामक नरक प धीर पटीयन्त्र सप्तम है। (५) नरकमेष्ठ असिपत्ररन नामक पाठयों नरक पहचर हजार योजन विस्तृत पहा जाता है। (५५)

नरें पताम्म, दशयों फूटशाल्मलि, एकादरा कर- . पत्र और पारहयों नररू श्वानमोजन है।

तदनन्तर प्रमश संदेश, सहपिण्ड, परम्मसिाना, भयंकर भार नदी, कृमिभोजन और अट्ठारह को घोर येतरणी नदी यहा जाता है। (५७)

सदनन्तर शोणितपूयमोजन, शुरामधार, निशिनचका वथा संशोषण नामक अन्त रहित नरक है । है मुसी। सुमसे इन नरकों का वर्णन किया गया। (१८)

मुकेशी ने कहा- पिमेन्द्रगा! आप लोग यह बनता कि इन नाफों में मनुष्य किस कर्म मे और कैसे जाने है इस विषय में मुरे अत्या कौतूहल है। (१)

ऋपियों ने कहा- लाटपट! (समस ) अपने कर्मफल भोग करने के लिये जिन कर्मों में मनुष्य इन नरों में जाते है हमसे सुनो।

वेद, रेषता एवं द्विजातियों सतत निन्दा करने वाले, पुराण एवं इतिहास के अर्यों का अभिनन्दन न करने वाले, गुरुषों के निदक, पों में विघ्न गलनेवारे और दामा को रोपने पाले पापी एन नरकों में गिरने हैं। (३-५)

मुरार दम्पति, सहोदर प्रभु साप, पिता-पुत्र, प्पे पाम्योपाध्याय में परापर भेद पा प्रनेपाने, अपम पतितपा को अपम म्यटि एसोन्या देर पुनः

दूसरे को देते हैं वे यम दूतों द्वारा करपत्र (आरे) से दो टुकड़ों में चीरे जाते हैं। (५-६)

दूसरे को सताप देनेवाले, चन्दन और उशीर (सस) के हरणकर्ता और बालों से बने पखों अर्थात् चवरों के हरणात करम्भसिकता नामक नरक में जाते हैं। (७)

देव या पैतृक श्राद्ध में निमन्त्रित होकर अन्यन भोजन करने वाले मूढ को तीक्ष्ण चोंच वाले बड़े-बड़े पक्षी दो टुकड़े करते हैं।

वचनों के द्वारा चोट करते हुये जो सजनों के मों को फाटता है उसके ऊपर चोच द्वारा प्रहार करते हुये पक्षी बैठे रहते है।

दुष्टयुद्धियुक्त जो मनुष्य साधुओं की पिशुनना करता है उसकी जिह्वा को पतुल्य चोंच और नस वाले कौए खीचते है। (१०)

माता, पिता एवं गुर की अपज्ञा करने वाले उस्त पुरुष पूय, विष्ठा एवं मूत्र से पूर्ण अप्रतिष्ठ नामक नरक में अधोमुस अवस्था में डूयते हैं। (११)

देषता, अतिथि, अन्य प्राणी, भृत्य, अभ्यागत, पालक, पिता, अग्नि एवं माताओं को बिना खिलाये सानेवाले अधम पुरुष पर्यततुल्य शरीर एवं सूची सदृश मुख से युक्त होकर

क्षुधात रहते हुये दूषित रक्त एवं पीय का निर्यास (रस) भक्षण करते हैं। (१२-१३)

हे राक्षसेन्द्र । एक ही पक्ति में बैठे हुये लोगों को जो समान रूप से भोजन नहीं कराते वे विड्भोजन नामक नरक मे जाते हैं। (१४)

एक साथ चलनेवाल किसी इच्छुक को देखते हुये भी विना बाँटे भोजन करने वाले शेज्मभोजन नामक (नरक) मे जाते हैं। (१५)

हे राक्षस । उच्छिष्टावस्था में गाय, ब्राह्मण और अग्नि को स्पर्श करने वालों के हाथ भयंर तप्तकुम्भ में डाले (१६)

उच्चियावस्था मे स्वेच्छा से सूर्य, चन्द्र और नक्षन को देखने वालों के नेनों मे यमदूत अग्नि जलाते हैं। (१७)

मित्रपत्नी, जननी, ज्येष्टधाता, पिता, बहन, पुत्री, गुरु और वृद्धों को पैर से छूनेवाले मनुष्यों के पैर बहिन- जलते हुए दोहनिगड से घाँधकर उन्हें रोरप नरक में डाय जाता है जहाँ वे जानुपर्यन्त जलमे रहते हैं। (१८-१६)

पायस, फशर एप मास का वृथा (देवादि को यिना अर्पित किये हुए) भोजन करने वालों के मुख में अद्भुत सात लौहपिण्ड ह्सा जाता है। (२०)

पापियों द्वारा की गई गुरु, देवता, ब्राह्मण और वेदों की निन्दा को सुनने वाले नीच मनुष्यों के कानों में धर्मराज के किंकर अग्निवर्ण रोहे की कीलें बार-बार ठोंक्ते हैं। (२१-२२)

प्रपा (प्याऊ),देवमन्दिर, उद्यान, ब्राह्मणगृह,समा, मठ, कूप, वापी (यावली) एव तडाग को तोड़कर नष्ट करनेवाले मनुष्यों के विलाप करते रहने पर भयकर यमकिंकर सुतीक्ष्ण छुरिकाओं के द्वारा उनको देह से धर्म को पृथक् करते है। (२३-२४)

गाय, ब्राह्मण, सूर्य और अग्नि के सम्मुख मल-मूत्रादि का उत्सर्ग करने वालों की गुदा से कौए उनकी आतों को नोच-नोंच कर काटते हैं। (२५)

'दुर्भिक्ष एव विप्लय के समय अञ्चिन पुत्र, भृत्य एवं फलादि बन्धुवर्ग को छोड़कर आरमपोषण करनेवाला मनुष्य श्वभोजन नामक नरक मे डाला जाता है। (२६)

शरणागत व्यक्ति का परित्याग करनेवाले तथा मन्धन पालक (कारागार-रक्षक) मनुष्य यमदूतों के द्वारा ताड़ित होते हुये यन्त्र पीड नामक नरक में गिरते हैं। (२७)

अश्मों में ब्राह्मणों को क्लेश देने वाले पापी मनुष्य शिलाओं पर पीसे जाते है तथा अग्नि द्वारा शोपित किये (२८)

न्यास का अपहरण करनेवाले पापियों को निगडबद्ध पर क्षुधाक्षीण एच शुष्क ताल्योष्ठ अवस्था में वृश्चिकाशन नामक नरक में गिराया जाता है। (२६)

पर्व मे मैथुन करनेवाले तथा परस्नीरत पापियों को यद्दिन तप्त कीरों वाले शाल्मलि का आलिङ्गन करना पड़ता है । (३०)

उपाध्याय को स्वय की अपेक्षा निम्नासन पर बिठाकर अध्ययन करनेवाने अधम द्विजों एव उनके अध्यापकों को शिरपर शिला वहन करनी पड़ती है। (३१)

जल मे मूल, श्लेष्मा (कफ) एवमल कात्यागकरने वालों को दुन्धि युक्त विष्टा, और पीब से पूर्ण विष्मून नामक नरक मे गिराया जाता है। (३२)

इस ससार में श्राद्ध के अवसर पर अतिथि के निमित्त प्रस्तुत पदार्थ को परस्पर भक्षण करने वाले मूखों को परलोक में एक दूसरे का मास साना पड़ता है। (३३)

वेद, अग्नि, गुरु, भार्या, पिता एवं माता का त्याग करने वालों को यमदूत गिरिशिखर पर से नीचे जाते हैं।

विघया से विवाद करनेवालों, अविवाहित कन्या को

दूपित करनेवालों एवं उक्त प्रकार से उत्पन्न व्यक्तियों की सन्तान के यहाँ भाद्ध में भोजन करने वालों को कृमि तथा पिपीलिरा का भक्षण करना पड़ता है। (३५)

पाण्डाल और अन्त्यज से दक्षिणा रेनेवाले याजकों एवं उनके यजमानों को पत्यरों में रहनेवाला स्थूल यीट पनना पड़ता है। (३६)

हे रजनीचर । धुगलसोरों एवं घूससोरों को कमक्ष नामक नरक में डाला जाता है। (३७)

सुवर्णचोर, माग का हत्याकारी, मधप, गुरुपत्नीगामी, गाय, तथा भूमि की पोरी करने वाले एवं श्री तथा याटक के मारने पाले मनुष्यों तथा गो, सोम प्यं वेद का विश्य फरने पाले, फूटसभ्य तथा शौचाचारपरित्यागी, नित्यने. मित्तिरूपों के नाशक, फूट साश्य देनेयाने द्विजों को महारष नामसमरक में निवास करना पड़ता है। (३८-४२)

उपर्युक्त प्रसार के पापियों को दस हजार पर्ष तामिस नरक में पया एतने ही यों तक अन्धतामिस और असिपचपन नामक नरक में रहने के उपरान्त-उतने ही वर्षों तक घटीयन्त्र और तप्तकुम्भ नामक नरकों में रहना पड़ता है। (४१-४२)

जिन भयर रोरय आदि नरकों का वर्णन तुमसे किया गया है वे सभी लोक निन्दित कृतघ्नों को पारी-बारी से प्राप्त होते हैं। (४३)

जैसे देवताओं मे जनादेन, पर्वतों में हिमालय, अखों में सुदर्शन, पक्षियों में गरुड, महान् सपों में अनन्त नाग तथा भूतों में पृथ्वी श्रेष्ठ हैं। (४४)

नदियों मगंगा, जलजों में क्मल, देव शत्रु-दैत्यों में महादेय के चरणों या मक्त, क्षेत्रों में जिस प्रकार पुरुजांगल, तीर्थों में पृथूदक प्रधान है। (४५)

जलाशयों में उत्तरमानस, पवित्र धनों में नन्दन फानन, लोगों में ब्रह्मलोक, धर्म-कार्यों में सत्यप्रधान है सया जैसे- (४६)

यनों में अश्वमेघ, स्पर्श करने योग्य पदार्थों में पुर, पपस्थियों में अगस्त्य, भागम शास्त्रों में वेद श्रेष्ठ है। (४७)

जैसे पुराणों मे मत्स्यपुराण, सहिताओं में स्वयम्भू के द्वारा कथित सहिता, स्मृतियों मे मनुस्मृति, तिथियों में अमावस्था और विपुवों (मेप और तुला की समान्ति) के अवसर पर किया गया दान श्रेष्ठ होता है। (४८)

तथा जैसे तेजस्वियों में सूर्य, नक्षत्रों में चन्द्रमा, जलाशयों में समुद्र, राक्षसश्रेष्ठों में आप और निश्चेष्ट करनेवाले पागों में नागपाश श्रेष्ठ है। (४६)

एच जैसे धानों में शालि, द्विपदों में ब्राह्मण, चतुष्पदों मे गाय, जगली जानवरों में सिंह, फूलों में जाती, नगरों में पानी, नारियों में एभा और आमियों में गृहस्थ (५०)

आम, मुकुलों में अशोक, समस्त जड़ी बूटियों में पध्या सर्व श्रेष्ठ है। (५१)

हे निशाचर | जैसे मूरों में कन्द, रोगों में अजीर्ण, श्वेत वस्तुओं मे दुग्ध और वस्नों में रूई के कपड़े श्रेष्ठ है।  (तथा जैसे ) (५२)

कराओं में गणितज्ञता, विज्ञान मे इन्द्रजाल, शाकों में काफमाची. रसों में लवण, ऊँची वस्तुओं में ताल, कमल सरोवरों में पम्पा, यनौकसों में ऋक्षराज, वृक्षों में पट, शानियों में महादेव परिष्ठ है। (एव) हे निशाचर। जैसे- (५३-५४)

सतियों में पार्वती, गायों में कपिला, बैलों में नील रण का बैल, सभी दुःसह कठिन एष भयकर नरकों में घेतरणी सर्वप्रधान है। उसी प्रकार हे निशाचरेन्द्र ! पापियों में

चिरफूटा, अपपादिया, चित्रोत्पला, तमसा, फरमोदा, पिशाचिग, पिप्पलश्रोगी, विपाशा, यजुलायनी, सत्सन्तजा, सुष्मिती, मशिष्टा, कृत्तिमा, पसु और पल्याहिनी-ये नदियाँ ऋक्ष पर्यंत से निकली है। (२२-२७)

शिवा, पयोष्णी, निर्षिया, तापी, निग्धावती, वेणा, येतरणी, सिनीयाटु, पुमद्वती, तोया, महागौरी, दुग्धा सभा पाशिरा-ये पवित्र जरपाटी फल्यागारिणी नदियाँ विष्यपर्यन से निकरी हुई है। (२८-२६)

गोदायरी, भीमरथी, गा, धेगा, मरम्बनी, तुगभद्रा, मुप्रयोगा, बाधा, फावेरी, दुग्धोदा, नलिनी, रेया, पारिसेना सपा स्टायनान्ये महानदियों समपर्यंत ये पाद से निकली  हैं। (३०-३१)

फलमाला, साम्रपर्णी, पंजुटा, परपसायती, सिनी तथा मुदामा-ये नदियों पुतिमान् पर्पत से निम्टी हुई है।(३२)

ये सभी नदियों पवित्र, पापों का प्रश्मन परने पाठी, जगा की मातायें क्या सागर पस्निया है। (२३)

हे राक्षस । इनके अतिरिक्त अन्य सदसों क्षुद्र नदियों भी यहाँ पर है। इनमे कतिपय सदैव प्रवाहित होने पाठी है तथा कतिपय फेवल पर्श काल में प्रवाहित होने वाली है। उत्तर एव मभ्य के देशों के निवासी इन पवित्र नदियों के जल पो स्वेच्छया पान करते हैं। (३४)

मत्स्य, कुशट्ट, फुणि, पुण्डल, पायाल, काशी, कोशल, वृक, शयर, कौवीर, भूलिङ्ग, शक, तथा मशा जातियों पे मनुष्य मध्यदेश में रहत है। (३५-३६)

पालोर, याटधान, आभीर, पारतोयफ, अपरान्त, शुद्ध पहलव, खेटक, गाग्धार, ययन, सिन्धु, सौवीर, मद्रक, शानदय, ललित्य, पारावत, मूषक, माठर, उदम्यार, कैकेय दम, क्षत्रिय, प्रातिश्य,तथा पैश्य यशद्रों के कुल, कम्योज, परद, पर्यर, अगलौकिक, पीन, तुपार, पहुध, यानतोदर, आग्रेय, भरद्वाज, प्रस्थल, दशेरक, एम्पक, सायक, राम, शुटिफ, वगण, औरस, अस्मिद्र, किरातों की जातियों, सामस, प्रममास, सुपाय, पुण्डक, कुल्त, पुर, अर्ण,

 तूणीपाद, कुनकुट, माण्डव्य एव मालवीय ये जातियों उत्तरापथ (उत्तराखण्ड) के निवासी है। (३७-१३)

अग, वग, एय मुद्गरय,अन्तगिरि, पहिगिरि, प्रवग,वागेय, मासाद, वलदन्तिक, ब्रह्मोत्तर, प्राविजय, भार्गव, केशवर्वर, प्रागज्योतिष, शूद्र, विदेह, ताम्रलितक, माला, मगध एघ गोनन्द-ये पूर्व के जनपद हैं। (४४-४६.)

हे राक्षस । पुण्डू, केरल, चौड, कुल्य, जातुप, मूपि काद, कुमाराद, महासक, महाराष्ट्र, माहिपिक, कालिंग, आभीर, नैपीक, आरण्य, शबर, बलिन्थ्य, विभ्यमौलेय, वैदर्भ, दण्डक, पौरिक, सौशिक, अश्मक, भोगगर्द्धन, वैपिक, सुन्दल, अन्ध्र, उद्भिद् एव नलकारक-हे शारफटकट । ये दक्षिण के जनपद हैं। (४६ cd-४६)

शूर्पारक, कारिवन, दुर्ग, तालीकट, पुलीय, ससिनील, तापस, तामस, कारस्कर, रमी, नासिक्य, अन्तर, नर्मद, भारकच्छ, माहेय, सारस्वत, वात्सेय, सुराष्ट्र, आवत्य एय आर्बुद ये पश्चिम दिशा में स्थित जनपदों के निवासी हैं। (५०-५२)

कारूप, ऐकलव्य, मेफल, उत्कल, उत्तमर्ण, दशार्ण, भोज, किंवर, तोशल, कोशल, पुर, ऐहिक, तुरम, तुम्बर, वहन, नेपध, अनूप, तुण्डिकेर, वीतहोत्र एव अवन्ती-हे सुकेशी । ये सभी जनपद विध्यपर्वत के मूल मे हैं। (५३-१५)

हम अब पयताश्रित देशों का वर्णन करेंगे ( उनके नाम ये हैं-)। निराहार, हममार्ग, कुपथ, तगण, खश, कुथ प्रावरण, ऊर्ण, पुण्य, हूहुक, त्रिगर्न, किरात, तोमर एव शिशिरादिक। (५६-५७)

हे राक्षस । तुम से कुमारद्वीप के इन देशों का विस्तार से हम लोगों ने वर्णन किया। अब हम इन देशों में वर्तमान देश धर्मों का यथार्थत वर्णन करेंगे। उसे सुनो। (५८)