वामन महा पुराण
मलय पर्वत पर इन्द्र का दानवो से युद्ध इन्द्र के पाकशासन तथा गोत्रभिद् होने का कारण एव दितिज मरुतो की उत्पत्ति
अपनी भक्ति से भृङ्गी बना दिया। (९५)
हे महर्पि! मैंने आपसे हर की कीर्चि को बढ़ाने वाला यह पुण्य पवित्र एय शुभद आख्यान कहा। धर्म, आयु, आरोग्य एवं धन को चाहने वालों को श्रेष्ठ द्विजों मे सदा इप्समा कीर्तन करना चाहिए। (६६)
नारद ने पहा-हे द्विजश्रेष्ठ! महेन्द्र ने मलयपर्वत पर भी अपना जो कार्य सम्पन्न किया उसे आप मुझसे चाहिये।
पुलस्त्य ने कहा-हे प्रान् ! महेन्द्र ने भ्रष्ट मलयपर्यंत पर संसार के हित तथा अपने फल्याय के लिए जो कार्य किया था, उसे सुनिये। (२)
मय, तार आदि अन्धरामुर के अनुचर असुर देषताओं से पद्यजित दोग पाताल जाने की इच्छा करने स्टगे।
उन लोगों ने सिखों द्वारा सेवित कन्दराओं याले, लता- वितान से आच्छन्न मत्तमागियों से परिपूर्ण, सुशीतल सों से आकान्त चन्दन से युक्त तथा माघवीयुसुम के आमोद से पूर्ण ऋपियों से अचिंत हर फे मलय गिरि यो देसा।
व्यायाम से श्रीग एवं शिथिल मय, सार आदि दानों ने शीतल छायायाले उस पर्यंत को देस पर पदों निवास करने की इच्छा की।
उन लोगों के यहाँ पेठने पर प्राणों को तृप्ति प्रदान करने याला मुगन्धपूर्ण तथा शीतल दक्षिण थायु मन्दगति से प्रवाहित होने लगा। (७)
लोक-पूज्य देवताओं से विद्वेप करते हुए सभी श्रेष्ठ असुर सुसपूर्वक वहीं रहने लगे। (८)
उन असुरों को मलय पर्यंत पर जानार शङ्कर ने इन्द्र को वहाँ भेजा। इन्द्र ने जाते हुए मार्ग मे गोमाता को देसा।
उसरी प्रदक्षिणा करने के उपरान्त उन्होंने प्रभा सम्पन्न पर्वत पर भोगसयुत तथा प्रसन्न समस्त दानवों को देसा। (१०)
तदनन्तर इन्द्र ने सभी महासुरों को ललकारा। वे भी विना व्यग्रता के बाणों की वर्षा करते हुए आए । (११)
हे निर्पि । रथासीन अद्भुत दिसायी पडने वाले चन्द्र ने आये हुए उन दानों को बाणनाल से इस प्रकार आच्छादित कर दिया जैसे मेप पृष्टि से पर्वतों को आच्छादित करता है। (१२)
तदनन्तर भद्र ने मय आदि दानों को याण से आच्छादित पर कपश्युक्त सुतीदर याणों से पारु नामक दानय का यध किया। (१३)
दृढ बाणों द्वारा पाक का शासन करने के कारण सभी अमरों के पति विभु इन्द्र को पाकशासनता की प्राप्ति हुई। (१४)
इसी प्रकार उन्होंने सुन्दर पुच्छयुक्त बाणों से दूसरे पुर नामा वाणासुर के पुत्र का यध किया । इसी से वे पुरन्दर (१५)
हे ब्रह्मन् । इस प्रकार उन दानवों का वध कर इन्द्र ने युद्ध में दान सेना को पराजित कर दिया। विजित पह दानवसैन्य रसातल मे चला गया। (२६)
हे मुनिश्रेष्ठ। इसीलिये शङ्कर ने सहस्राक्ष को मलय पर्वत पर भेजा था। अब आप और क्या सुनना चाहते है? (१७)
नारद ने कहा हे ब्रह्मम् । मेरे हृदय मे यह सदेह है कि देवपति को गोनभिद् क्यों कहा जाता है? (१८)
पुलरत्य ने कहा-आप सुनें कि मैंने इन्द्र पो गोत्र भिद्' क्यों कहा तथा हिरण्यकशिपु के मारे जाने पर अरिमर्दन इन्द्र ने क्या दिया? (१६)
हे नारद । पुन के मर जाने पर दिनि मे कश्यप से यहा-हे प्रभु! आप मेरे पति है, मुझे इन्द्र को मारने पाला पुत्र दीजिए। (२०)
पश्यप ने उनसे कहा- देगनेत्रोंथाली । यदि तुम सी दिव्य यों तक शीयाचार से सम्पन्न होकर
रहोगी तभी तुम त्रिलोकनायक शत्रुहन्ता पुत्र उत्पन्न फरोगी । हे प्रिये ! इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। (२१-२२)
पति के ऐसा पहने पर दिति ने नियम का अवलम्बन किया। कश्यप ऋपि गर्भाधान परफै उदयगिरि पर चले गये। (२३)
उन मुनिश्रेष्ठ के चले जाने पर इन्द्र ने शीघ्रता से उस आश्रम में जारर दिति से यह यावय कहा- (२४)
यदि आप अनुमति प्रदान करें तो में आपकी सेया फरु। भयितव्यता से प्रेरित देयी ने कहा-ठीक है। (२५)
विनीतात्मा पुरन्दर अपने कार्य की सिद्धि हेतु भुजङ्ग- पत् छिद्रान्वेषण करते हुए उन (दिति) के लिये समिया आदि राने पावार्य करने लगे। (२६)
एक सहस्र वर्ष व्यतीत हो जाने पर एक दिन अतिशय शौचपरायण पह परिवनी शिर से स्नान करने के उपरान्त फेशों को सोले हुए अपने जानुओं पर शिर रख कर सो गई। उसके फेशमान्त से परण सदिलष्ट हो गए। (२७-२८)
हे नारद ! देय सहस्राक्ष इन्द्र अशौच के उस सिद्र को जानर नाफ के छिद्र से माता के उदर में प्रविष्ट हो गए। (२९)
क्रुद्ध पुरन्दर ने दैत्यमाता ये गद्दान् जठर में प्रवेश कर कटि पर हाथ रक्खे ऊपर को मुस किये एका बालक को देखा। (३०)
वासर ने उस बालक के मुँह में एक शुद्ध स्फटिक तुल्य मासपेशी को देखा। उन्होंने उस मांसपेशी को दोनों हाथों से पाड़ लिया। (३१)
वदनन्तर झोपान्ध शतक्रतु ने दोनों हाथों से उस मासपेशी को मर्दित किया जिससे यह कठोर हो गई। (३२)
उस पिड का आधा भाग ऊपर को और आधा भाग नीचे की ओर बढ़ गया। इस प्रकार उस मासपेशी से शतपर्वयुक्त वन बन गया। (३३)
हे ब्रह्मन् । (इन्द्र ने) उसी शतपर्व पक्ष से दिति के गर्भ यो सात भागों में दिन कर दिया। यह गर्भस्य पालक भीषण स्वर से रोने लगा। (३४)
हे नारद । तदनन्तर दिति जग गई एवं उन्हें इन्द्र का पत्य ज्ञात हो गया। उन्होंने रो रहे पुत्र की याणी को (३५)
इन्द्र ने भी यहा-हे मूर्स! घर शब्द से मत रदन करो। ऐसा कह फर उन्होंने प्रत्येक सण्ड को पुन सात- सात सण्टों में काटा। (१६)