वामन महा पुराण
कात्यायनी चरित में चण्ड मुण्ड द्वारा महिष से देवी के रुप सौप्ठक का निवेदन महिषासुर द्वारा दूत स्रप्रेषण, दूत द्वारा देवी से महिषासुर के सदेश का कथन महिषासुर का युद्धोघोग
उन्होंने भी पादप्रहार द्वारा उस महिषासुर को मार डाला। (४३)
हे द्विज! इस प्रकार के प्रभाव से युक्त विष्णुपार समस्त रक्षाकारी (वस्तुओं) मे श्रेष्ठ कहा गया है। जिसके चित्त में चक्रपाणि स्थित हों युद्ध में उसके दर्ष की हानि कौन कर सकता है? (४१)
श्रीवामनपुराग में बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२०॥
२१
नारद ने कहा-"कात्यायनी देवी ने अनुचरों एय याइनों के साथ महिषासुर को किस प्रकार मारा। इसस विस्तार से वर्णन करें। (१)
हे प्रक्षन ! मेरे मन में यह संशय है कि शखरे के विद्यमान होते हुए भी देवी ने पैरों द्वारा उसे क्यों मर्दित किया?" (२)
पुलस्त्य ने कहा-"देवयुग के आदि में घटित तथा पाप एवं भय को दूर करने पाली इस पवित्र पुरातनी कथा को सायधान होकर सुनो।" (३)
हे मझन् ! इस प्रकार यह मुद्ध नमर गज, अश्व एवं र रथ के साथ वेगपूर्वक आ पदा। देवी ने उसे यथेच्छरूपसे देखा।(४)
तदनन्तर धनुप को झुका कर दैत्य ने शैल के ऊपर इस प्रकार पाए वर्षा की जैसे आकाश (पर्वत पर) धारा प्रयाइ जलवृष्टि करता है। (५)
तदनन्तर पर्वत पो पाणवई से आवृत दुआ देख कर मुद्धा भगवती ने वेगपूर्वक श्रेष्ठ धनुप को सींचा। (६)
दानव-सेना के मध्य दुर्गा द्वारा बलपूर्वक मुकाया गया यह सुवर्णपृष्ठ वारा धनुप मेषों में विद्युत के तुज्य चमका। (७)
हेशुभवत! उन्होंने पुछराक्षसों को पाणों के द्वारा, युद्धको सड़ा के द्वारा, कुछ को गदा के द्वारा, कुछ को मुसल के द्वारा एवं कुब को ढाल के द्वारा मार डाटा। (८)
देवी के कारतुल्य सिंह ने अपनी फेसरसटा को हिलाने
हुए अकेले अनेक दानवों का वध किया । (९)
कुलिश से आहत, शक्ति से विदीर्ण पक्ष स्थल वाले, हल से फाडी गयी गर्दनवाले, परश्वध से काटे गये, दण्ड से फोडे गये शिरवाले तथा चक्र से विच्छिन्न बन्धनों वाले दैत्य विचलित हो गये, गिर गये, मूर्छित हो गये और कोई- कोई युद्ध छोडकर भाग गये। (१०-११)
भयकर दुर्गा द्वारा मारे जा रहे भय पीडित दैत्य एव दानव उन्हें कालरात्रि मानकर भाग खडे हुए । (१२)
सेना के अग्र भाग को भग्न तथा दुर्गा को सम्मुख स्थित देख कर मत्त हाथी पर आरूढ नमर आगे (१३)
युद्ध मे आकर दानव ने देवी के ऊपर वेगपूर्वक शक्ति से प्रहार किया एव सिंह के ऊपर निशूल चलाया। (१४)
देवी ने आ रहे उन दोनों अलों को हुकार द्वारा भस्म सात् कर दिया। तदनन्तर गजेन्द्र ने सिंह के मध्य भाग को पकड लिया। (१५)
तदनन्तर (सिंह ने) वेगपूर्वक उछल कर दानव को थप्पड से मारने के उपरान्त उस निष्प्राण (दानव) को कुअर के स्कन्ध से नीचे गिरा कर देवी को निवेदित किया।
हे ब्रह्मन् । देवी कात्यायनी क्रोध से उस दैत्य को मध्य में पकड कर तथा बायें हाथ से घुमा कर पटह के सदृश बजाने लगी। (१७)
तदनन्तर उसके उस प्रकार वाद्यता को प्राप्त होने पर देवी ने अट्टहास किया। उनकी हॅसी से अनेक प्रकार के अद्भुत भूत उत्पन्न हुए। (१८)
कोई कोई भयकर (भूत) व्याघ्र के समान मुखवाले थे, किसी की आकृति वृक के सदृश थी, किसी का मुख घोड़े के तुल्य, किसी का महिप सदृश एव पिसी का वराह जैसा था। (१६)
किन्हीं का मुख मूषक, कुक्कुट, गाय, बकरा अथवा भेड़ के सदृश था। वे सभी नाना प्रकार के मुख, आँखके , एव चरणों वाले तथा नाना प्रभार के आयुधों को धारण किये हुये थे। (२०)
उनमे कुछ समूह बनाकर गाने लगे, कुछ हँसने लगे, कुछ रमण करने लगे, कुछ वादन करने लगे तथा कुछ देवी की स्तुति करने लगे।
देवी ने उनभूतगणों के साथ उस दानव सेना पर आक्र- मण कर उसे इस प्रकार नष्ट कर दिया जैसे महान् वन सस्य (खेती) का नाश करता है। (२२)
सेना के उस अग्र भाग तथा सेनाप्रगामी ( सेनापति) के मारे जाने पर सैन्यपाल चिक्षुर ने देवताओं से युद्ध किया।(२३)
रथारोहियों में श्रेष्ठ उस दैत्य ने दृढ धनुप को पानों तक खींच कर इस प्रकार वाणों की वर्षा की जैसे मेघ वसुन्धरा पर जलपर्षा करता है । (२४)
दुर्गा ने सुन्दर पर्यो याने अपने बाणों से उन याण समूहों को काट कर सुवर्ण पुखवाल दूसरे सोलह बाणों को लिया। (२५)
तदनन्तर क्रुद्ध दुर्गा ने चार वाणों से ( उसके ) चार घोडों को, एक से सारथी यो एव एक से ध्वज को काट डाला। (२६)
तदुपरान्त अम्यिका ने एक बाण से उसने याणसहित धनुप कोकाट डाल। धनुप कट जाने पर बलवान् चिक्षुर ने सद्ग और दाल प्रहण किया। (२५)
देवी ने देत्य के उस दाल युक्त वलयार को जिसे वह परपूर्वक घुमा रहा था चार वाणों से काट दिया। तदुप-रान्त उसने शूल धारण किया। (२८)
महान् शूल को घुमा र वह अम्बिश की ओर इस प्रकार दौड़ा जैसे यन में शृगाल प्रसन्नमन होकर सिहिनी यी ओर दौड़ता है। (२६)
अत्यन्त मुख देयी ने पाँच पाणों से आक्रमणगरी उस
(असुर) के दोनों हाथों, दोनों पैरों एवमस्तक को काट दिया जिससे मरकर वह असुर गिर पड़ा। (३०)
उस सेनापति के मरने पर उपास्य नामक महान् असुर तथा क्रायस्य नामक दानव वेगपूर्वक दौड़े। (३१)
बाप्पल, उद्धत, उदमाख्य, उपकार्मुक, दुर्धर, दुर्मुख, तथा विडालनयन-ये तथा अन्य अनेक शस्त्रधारी, अत्यन्त बली एव श्रेष्ठ दानवों ने कात्यायनी पर आरमण किया। (३२-३३)
उन्हें देस र देवी दुर्गा ने लीलापूर्वक हाथों में वीणा एव श्रेष्ट डमरू लेकर हँसते हुए घजाना प्रारम्भ किया। (३५)
देवी ज्या ज्या उन पाद्यों को यजाती थी त्यों त्यों भूत- गण नाचते और हँसते थे। (३५)
तदनन्दर शस्त्रधारी असुर सरस्वती के निकट जारर प्रहार करने लगे। परमेश्वरी ने उनके केशों को पकड़ लिया।
उन महासुरों का फेश परद कर तथा सिंह से उछल पर पर्वत शग पर आयी हुयी जगजननी (करयायनी) वीणा यादन करते हुए पान करने लगीं। (३७)
तदनन्तर देयी के याहुदण्ड से मारे गये विशीणदर्पाले
बलवान् महासुर अस्तव्यस्त वस्त्रवाने एव विगतप्राण हो गए । तदुपरान्त उन श्रेष्ठ महासुरों को देख कर महाबलवान् महिषासुर ने अपने खुराम, तुण्ड, पुच्छ, वक्ष स्थल तथा नि श्वास वायुसे देवी के भूतगणों को भगा दिया। (३८ ३६)
वचतुल्य शब्द एव सींगों की नोक से अन्यों को प्रम-थित करके युद्ध मे सिंह को मारने की इच्छा से वह दौड़ा। इससे अम्बिका क्रुद्ध हो गई। (४०)
तदनन्तर तीक्ष्ण शृङ्गयुक्त यह ( महिष ) कोपवश शीघ्रतापूर्वक पर्वतों एव भूमि को विशीपा करने लगा तथा समुद्र को सक्षुब्ध करते हुए एवं मेघों को विध्वस्त करते हुए दुर्गा की ओर दौड़ा। (४१)
तदनन्तर उन्होंने उस दुष्ट को पाश से बाँध लिया । और वह मदसितगण्डस्थल वाला गजराज बन गया। देवी ने हाथी का शुण्डान काट दिया। तत्पश्चात् वह पुन महिप हो गया। (४२)
हे महर्षे । तदनन्तर मृडानी ने उसके ऊपर शूल फेंका, वह (शूल) टूट कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। तत्पश्चात् उन्होंने अग्नि द्वारा प्रदत्त शक्ति फेंकी, किन्तु वह भी कुण्ठिताम होकर गिर पड़ी। (४३)
दानव समूह को मारने वाला हरि का चक भी फेंके जाने पर अचक बन गया (निष्क्रिय हो गया)। धनेश्वर की घुमा कर फेंकी गयी गदा भग्न होकर पृथ्वी पर गिर (४४)
महासुर ने जलेश के पाश को विषाण, तुण्डान एवं खुर के प्रहार से निरस्त कर दिया। कुपित (देवी द्वारा) छोड़ा गया यम का दण्ड भी कई खण्डों मे टूट गया। (४५)
उसके शरीर पर चलाया गया इन्द्र का वज्र भी अति सूक्ष्म (टुकड़े टुकड़े) हो गया। तदनन्तर दुर्गा सहसा सिंह को छोड़कर महिषासुर के पृष्ठ पर आरुढ हो गई। (४६)
मृहानी के पृष्ठस्थित होने पर महिषासुर वीर्य के मद से