वामन महा पुराण
12 कुरुक्षेत्रमहिमा, कुरुक्षेत्र के तीर्थों में भ्रमण का विधान
जो मूर्त है या जो अमूर्त है यह सब कुछ और जो सब भूतों में एक रूप से स्थित है और जो केवल एक मात्र है और जो द्वैत में अलग अलग रूप से दिखाई पड़ता है यह सब कुछ आपके स्वर व्यञ्जनों से सम्बद्ध है। (२२)
इस प्रकार स्तुति किये जाने पर विष्णु की जिह्वा स्वरूपिणी सरस्वती ने महामुनि महात्मा मार्कण्डेय से कहा- हे विप्र । तुम जहाँ ले जाओगे मैं वहाँ आलस्य रहित होकर जाऊँगी। (२३)
मार्कण्डेय ने कहा-पूर्वकाल में पवित्र ब्रह्मसर (नाम से प्रसिद्ध) तदनन्तर रामहुद (नाम से) अभिहित एव सदुपरान्त कुरु ऋपि द्वारा कृष्ट होने से रक्षेन कहे जाने वाले क्षेत्र मे आप अत्यन्त पवित्र तथा पुण्यजलवाली हों अर्थात् वहाँ प्रवाहित हों। (२४)
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लोमहर्षण ने कहा-धुद्धिमान मार्कण्डेय ऋषि के इस वचन को सुनकर प्रवाह-सयुक्त नदी कुरुक्षेत्र में प्रविष्ट हुई।
वह पुण्यतोया सरस्वती नदी यहाँ रन्तुक में जाकर कुरुक्षेत्र को प्लावित करती हुई पश्चिम दिशा की ओर चली गई। (२)
वहाँ (कुरुक्षेत्र मे) ऋषियों से सेवित सहस्रों तीर्थ हैं। परमेष्ठी (ब्रह्मा) के प्रसाद से में उनका वर्णन करूँगा । (३)
पापियों के लिये भी तीर्थों का स्मरण पुण्यदायक, उनका दर्शन पापनाशक और स्नान मुक्तिदायक कहा
गया है। । (४)
जो सदा-सदित तीयों या स्मरण करते है, देयताओं को प्रसन्न परत है और उनमें स्नान करते हैं, ये परम गति को प्राप्त करते हैं।
अपवित्र या पवित्र अथा सविस्थामात भी जो व्यक्ति पुरुक्षेत्र का स्मरण करे तो यह याहर तथा भीतर से पवित्र हो जाता है। (६)
'मैं कुरुक्षेत्र में जाऊँगा और में दुरशन में निरास परूँगा' इस प्रकार या पपन कहने से मनुष्य मभी पापों से मुरू हो जाता है।
मानयों के लिये प्रमतान, गया में पान, गीयों की रक्षा के लिये मृत्यु और पुरयंत्र में निवास, यह पार प्रघर की मुक्ति पदी गई। (८)
गरस्यता ओर पी इन दा देव नादियों मध्य पक्ष्य निर्मित देश प्रेममायनं पहने है। परपर भी जो मनुष्य "मैं गुरमंत्र जागा, पदा नियारा फरगा" इमप्रसर गहना पद भी सभी पापी मे मुल हो जाता है।
यहाँ सरायसी के तट पर रहने हुये सरोवर में स्नान परी पाने मनुष्य को निसंदिरान उपम होता है। देवता शपि और सिद्धलोग सदा पुरुक्षेत्र का सेवन परमे हैं। यहाँ नित्य रहने से मनुष्य अपने भीतर प्रा का दर्शन करता है। (१२)
माना जीयन पार जो पापी भी जितेन्द्रिय होकर मोक्ष को इग्या से यहाँ निगम फरसे है ये अनेक जन्मों के पापों से मुक्त हो अपने यस्य सनातन निर्मल देवपा दर्शन पर है। (१३-१४)
माझवेदी, कुरक्षेत्र व्यं पवित्र सामिहित सरोया पा जो मनुष्य सनत मेयन करते है पे परम पद को प्रात फरत है। समय पर मनाए ताराओं में भी पराभव होना है, फिनुपूकोत्र में मरने वालों का कभी पतन नदी
महानिदेषता, पि, सिख, पारग, गन्धर्ष, भागण्य और या उत्तम प्रधान को प्राप्ति के लिये पहा नियम परने हैं।
यहाँ जार क्या नाम: महासरायर में मग पूर्व नानपने में मनुष्य निदिह मनोपान्या मार में परता है।
नियम परापर होने कपमा मरेपर प्रदक्षिणा