चण्डिका की देह से मातृकाओं की उत्पत्ति, मातृकाओं के साथ असुरो का युद्ध, रक्त बीज से युद्ध एव रक्तबीज-वध, निशुम्भ वध, देवों द्वारा देवी की स्तुति एवं देवी द्वारा वरप्रदान, देवी द्वारा अपनी भावी उत्पत्ति का कथन

३०

पुलस्त्य ने कहा-चण्ड-मुण्ड को मरा हुआ और सैनिकों को पलायित देखकर शुम्भ ने अत्यधिक बलवान् महासुर रक्तबीज को आदेश दिया। तीस करोड़ अक्षौहिणी सेना से युक्त दैत्यों की उस सेना को आती हुई देसर महेश्वरी चण्डिका ने उन दोनों देवियों के साथ सिहनाद किया।(२-२)

उसके बाद सिहनाद करती हुई देवी के मुख से हंस. युक्त विमान पर बैठी हुई तथा अक्षमाला और कमण्डलु से युक्त नहाणी उत्पन्न हुई तथा तीन नेत्रोंवाली, वृप पर आरुद, त्रिशूल को धारण करने वाली, महासर्प के मन से युक्त चुण्डरधारिणी माहेश्वरी भी उसी क्षण उत्पन्न हुई। (३-४)

हे देव ! देवी के षण्ठ से मोरपंस से अलत, शक्ति धारिणी एवं मयूर के श्रेष्ठ पाहन पर आरूढ कौमारी उत्पन्न हुई। (५)

देयी की दोनों भुजाओं से गरुड़ पर सवार, शंख, चर, गदा, बलवार एवं धनुष पाण धारण करने वाली रूप यती पैष्णवी शक्ति उत्पन्न हुई।

देवी के पीठ से महाभयङ्कर मुशल से युक्त, दाढों से पृथ्वी को सोदने वाली शेपनाग के ऊपर आरूढ धाराही शक्ति उत्पन्न हुई। (७)

हाथ मे वन और अंकुश को लिये, अनेक प्रकार के आभूपणों से विभूपित गजराज की पीठ पर बैठी हुई माहेन्द्री शक्ति स्तनमण्डल से उत्पन्न हुई। (८)

अयाल के हिराने से प्रह, नक्षत्र और ताराओं को विक्षिप्त करती हुई नसोंवाली अत्यन भयंकर नारसिंही- शक्ति देवी के हृदय से उत्पन्न हुई।

उन शक्तियों द्वारा मारी जाती हुई असुर-सेना एवं शत्रुओं को देखकर चण्डिका ने घोर गर्जन किया। तीनों लोकों को पूरित करने वाले उस गर्जन को सुनकर शूलपाणि, त्रिलोचन महादेव देवी के समीप आए और उनसे प्रणाम कर यह कहा-'हे अम्बिके ! हे दुर्गे! में आ गया हूँ। मैं तुम्हारा क्या कार्य करूं ? मुझे आशा दो। उस वाक्य के साथ ही देयी के देह से से शिया उत्पन्न हुई। उन्होंने देवेश्वर से कहा, "हे शङ्कर !

आप दूत बनकर जाइये और गुम्भ-निशुम्भ से कहिए कि हे दुराचारियो ! यदि तुम रोग जीना चाहते हो, तो सातये रसातल लोक मे चले जाओ। इन्द्र को स्वर्ग की प्राप्ति हो एवं देवाण व्यथा रहिन हो जाय। (१०-१४)

ये ब्राह्मण आदि वर्ण उचित रीति से यज्ञ फ्रें अन्यथा यदि तुम लोग पल के घमण्ड से युद्ध करना चाहते हो-तो आ जाओ। यह में व्यग्र न होती हुई तुम लोगों का संहार करूँगी । हे नारद । क्योंकि उन्होंने शिव को दूत धनाया अत महादेवी का नाम शिवदूती हुआ। वे सारे असुर भी शङ्कर के गर्नयुक्त वचन को सुनकर हुँकार करते हुए जहाँ कात्यायनी स्थित थीं यहाँ दौड़े। (१५-१७)

तदनन्तर दोनों असुर सुरेश्वरी के ऊपर वाण, शक्ति, अंकुश, श्रेष्ठ फुटार, शूल, 'मुशुण्डी, पटिश, तीक्ष्य प्रास और विशाल परिध आदि थरनों की वर्षा करने लगे। (१८)

संग्राम में प्रचण्ड विक्रमशाटिनी उस महेश्वरी ने भी

श्रेष्ठ धनुप से निकने बाणों द्वारा असुरों के शस्रों को उनरी बाहुओं सहित काट दिया एव सैकड़ों वाणों से अन्य असुरों को मार डाला। (१९)

मारी ने त्रिशूल से अनेकों को मारा, कौशिकी ने सट्वाङ्ग के प्रहार से बहुतों का वध किया तथा ब्राह्मी ने जल के प्रक्षेप से दूसरे अनेक असुरों को हतप्रभ कर दिया। (२०)

माहेश्वरी ने शूल से बहुत से अनुरों का वक्षस्थलविदीर्ण किया। वैष्णवी ने बहुतों को जला डाला । कुमारी ने शक्ति से, ऐन्द्री ने वन से, वाराही ने मुख तथा चक्र से असुरों का संहार (२१)

नारसिंही ने नखों के प्रहार से दैत्यों को विदीर्ण किया, शिवदूती ने अट्टहास से, रुद्र ने त्रिशूल से एव विनायक ने फरसे के प्रहार से अन्य असुरों नष्ट किया । (२२)

इस प्रकार देवी के अनेक रूपों द्वारा मारे जाते हुए

दानव पृथ्वी पर गिरने कीपर (गिरे हुए) इन दानवो को करने लगो। (२३)

द्वारा एव में मारे गये वह गये थे महासुर मुने केशो कई भष में चश्चय क्षेत्रो में दृध्य को भर में (२४)

अपने मुगको पार कर पीटा। (२०)

ऐसा रहने पर पारादिनी अपने पिरा पप गुरागामेभामा भार मेरी गुहा (४)

मापन मदिरा ने पार

मृडानी ने अस्त-व्यस्त केशपाश और छिन्न-भिन्न कवच वाले अनेक नग्न दैत्यों को पृथ्वी पर पटक दिया। वे देत्य पर्वत श्रेष्ठ को छोड़कर भाग गए। (३२)

टूटे क्वच, आयुधों एवं आभूषणों से युक्त अपनी सेना को देसार टूटे चक्र एवं धुरी वाले रथ पर आरूढ दानवेन्द्र निशुम्भ प्रोधपूर्वक मृहानी के निकट गया। (३३)

तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर सिर हिलाते हुए यह देवी का रूप देखकर मोहज्वर से पीडित हो चित्र लिखित की भाँति स्तम्भित हो गया। (३४)

उस स्तम्भित देवशत्रु को सामने देयका देवी ने हँसते हुए यह वचन कहा-क्या इसी पराक्रम से तुमने देवताओं को जीता है? क्या क्या इसी बल से मुझ को (पनीरूप में) पाने के लिए प्रार्थना करते हो? (३५)

कौशिकी की बात सुनने के उपरान्त देर तक सोचकर वक्ताओं में श्रेष्ठ यह दानव यह वचन बोला-(३६)

हे भीरु! यह तुम्हारा अत्यन्त सुकुमार शरीर मेरे शस्त्रों के प्रहार से जल में सच्चे वर्तन की भाँति सैकड़ों टुकड़ों में विभक्त हो जायगा। (३७)

हे सुन्दरी ! यह सोच कर मैं तुम्हारे ऊपर प्रहार परने का विचार नहीं कर रहा हूँ। अत. हे पिशालाक्षी ! तुम मुझे स्वीकार कर लो।

मेरे खडा के प्रहार को इन्द्र भी नहीं सहन कर सकते। तुम युद्ध की बुद्धि छोड़ दो एवं अब मेरी पत्नी घन जाओ। (३९)

हे मुनि। योगीश्वरी ने निशुम्भ की यह बात सुन कर हँसते हुए उस से अर्थयुक्त वचन कहा- (४०)

हे पोर! सग्राम में विना पराजित हुये मैं किसी की भार्या नहीं बन सकती, यदि तुम मुझे ली बनाना चाहते हो तो युद्ध मे मुझे पराजित करो। (४१)

हे नारद! यह बात कहे जाने पर इस दानव ने सड्ग सठा र कौशिकी की ओर वेग से चलाया। (४२)

दाल के साथ अपनी ओर आती हुई उस तलवार को देवी ने मयूरपुच्छ से सुशोभित छः बाणों से काट दिया। यह (दृश्य) बड़ा ही अद्भुत हुआ। (४३)

डाल के सहित पा के फट जाने पर यह महान असुर गदा लेकर पायु के समान घेग से कौशिकी पर झपटा (४४)

अम्यिरा ने युद्ध में आक्रमण करने वाले उस असुर की गदा सहित सुगठित एष दृद् भुजाओं को क्षुरप्र (वाणों) से तत्काल काट डाल। (४२)

उस अति भयर देवशनु के गिरने पर चण्डी आदि मातपायें प्रसन्न होकर क्लिगारी करने लगी। (४६)

तदनन्तर आराश में स्थित इन्द्रादि देवगण शत्रु के गिर जाने पर प्रसन्न होते हुए योले हे विजये। तुम्हारी जय हो।

तदुपरान्त चारों ओर भूतगण भेरी यजाने लगे और देवगण फात्यायनी के उपर पुष्पवृष्टि करने सगे। (४८)

हे महामुनि । निशुम्भ को गिरा हुआ देसार शुम्भ मोध से दाय में पाश लिये हाथी पर पदफर आया । (४६)

गजारूद दानवेधा पो आने देस ( देवी ने ) घमरने हुए अर्धचन्द्राशर पार पागों को प्रहण किया। (५०)

उस अम्यिका ने लीलापूर्वक हंसते हुए दो तीक्ष्ण चाणों से उस हाथी के दो पैरों को वाट दिया एवं दो घाणों से उसके कुम्भस्थल पर प्रहार दिया। (५१)

दोनों पैरों के कट जाने पर वह हाथी इन्द्र के पक्ष से आहत शैलराज के शिसर की भाँति अपने आप ही गिर पड़ा। (५२)

शिया ने मारे गए हाथी पर से उछलने वाले शुम्भ का कुण्डलभूपित शिर बाण से काट दिया। (५३)

शिर कट जाने पर देरयेन्द्र हाथी सहित इस प्रकार गिर पड़ा जैसे महासेन कार्तिकेय द्वारा आदत कौन महिए के साथ गिरा था । (५४)

मृडानी द्वारा दोनों देवशनुओं पा मारा जाना सुन पर इन्द्रसहित सूर्य, मस्तु , अश्विनीकुमार एवं यसुगग इत्यादि देवता उस श्रेष्ठ पर्वत पर आए एवं विनयपूर्वक देवी की इस प्रकार स्तुति करने लगे। देवताओं ने कहा-हे भगति ! हे पापनाशिनि ! आप को नमस्कार है। हे सुर शुओं के पं का सहार फरने याली ! आप को नमस्कार है। हे विष्णु और शहर को राग्य देने याली ! आप को नमामार है। यममोका

देवों का कार्य करने वाली । आपको नमस्कार है। (५६)

हे देवशनुविनाशिनी । आपको नमस्कार है। हे इन्द्र द्वारा पूजित चाणों वाली| आप को नमस्कार है। हे महिषासुर विनाशिनी । आप को नमस्कार है। हे विष्णु, शकर एव सूर्य से स्तुति की जाने वाली। आपको नमस्कार है। (५७)

हे अष्टादश भुजाओंवाली। आप को नमस्कार है। हे शुम्भ निशुम्भ का वध करने वाली । आप को नमस्कार है। हे लोकों का दुस हरण करने वाली । हे त्रिशूलधारिणी। आप को नमस्कार है। हे चक्रधारिणि नारायणि। आपको नमस्कार है। (५८)

हे वाराहि । हे घरा को सदा धारण करने वाली । आप को नमस्कार है। हे नारसिहि । आप को हम प्रणत है, आपको नमस्कार है। हे वनधारिणि । हे गजव्यजै । आप को नमस्कार है। हे कौमारि। हे मयूरवाहिनि । आप को नमस्कार है।

हे ब्रह्मा के इस पर बैठने वाली। आप को नमस्कार है। ह विकटमाला धारण करने वाली। हे सुन्दर केशों वाली । आप को नमस्कार है। हे गर्दम की पीठ पर बैठने वाली । आप को नमस्कार है। हे समस्त क्लेशों का नाश

करने बारी। हे जगन्मये । आप को नमस्कार है। (६०)

हे विश्वेश्वरि । आपको नमस्कार है। आप विश्व की रक्षा कर तथा बाह्यगों और देवताओं के शत्रुओं का सहार करें। हे गिनेने। हे सर्वमयि | आपको नमस्कार है। हे वरदे । आपको बारम्बार नमस्कार है। आप प्रसन्न हों। (६१)

"ब्रह्माणी और मृडानी आप ही है। आप ही सुन्दर मयूर पर चलने वाली और हाथ में शक्ति धारण करने वाली कुमारी है। सुन्दा मुखपाली वाराही आप ही है तथा गरुड से चलने वाली, शाई धनुप धारण करने वाली धैष्णवी आप ही है। घुर घुर शब्द करने वाली, देखने में भयकर नारसिही आप ही हैं। आप ही पत्रधारिणी ऐन्द्री एव महामारी चर्ममुण्डा है, शव पर चलने वाली तथा योगसिद्धा योगिनी भी आप ही है। (६२)

हे तीन नेत्रोवाली भगवति । आप को नमस्कार है। आप के चरणों का आश्रय कर नम्रता से प्रतिदिन अपना शिर झुकाने वालो तथा वलि एच फूलों को हाथ मे लिये सर्वदा भापकी स्तुति करने वालों का कोई परिभव और अमगल नहीं होता।

देवश्रेष्ठों के इस प्रकार स्तुति करने पर मुरशत्रुओं का सहार करने वाला देवी ने देवताओं, सिद्धों तथा श्रेष्ठ

महर्षियों से हँसार कहा-माप लोगों के अनुप्रह से मैंने संग्राम में (शनु फा) मर्दन कर देयशत्रुओं पर अत्यन्त अद्भुत विजय प्राप्त की है। (६४)

आप लोगों से कही गई इस स्तुति को पढ़ने वाले भक्तिपरायण श्रेष्ठ मनुष्यों के दुस्वप्नों का निस्सन्देह नाश होगा। आप लोग अन्य अभिलपित पर माँगे। (६१)

देयताओं ने पहा-यदि आप देवताओं को वर देना पाहती हैं तो ग्रामणों, पची और गौओं के हित के लिए यरन कीजिये । हे पारक पे समान शरीरयाली। अन्य देव शत्रुओं को आप पुन ( भविष्य में) भरम करें। (६६)

देयी ने पदा-हे देयो । पुन शहर के मुस के स्वेदजल से उत्पन्न होपर रक्त से रजिन मुसयाली होर संसार में पशिनाम से प्रसिद्ध में अन्धरासुर फायध पगी।(६७)

पुन नन्द के घर में यशोदा से उत्पन्न होकर में प्रपल मुर शव का पथ परंगी । यहाँ अवतार लेकर दांतों के प्रकार से में विप्रचित्ति, व्यगामुर एवं अन्य शुम्भ निशुम्म  दानवों का सहार करूँगी। (६८)

हे देवताओ! कलियुग में भोजन न मिलने से उत्पन्न होने पाली मारी को देसकर मैं पुनः अमितसत्यधामा देवी के साथ इन्द्र के घर शारम्भरी के रूप में प्रकट होकर भरण करूँगी। (६६)

हे देवताओ! पुन मैं शओं के संहार तथा पियों की रक्षा के लिये पिण्याचल में उत्पन्न होऊँगी। हे देवो । यहाँ दुराचारी दैत्यों का नाश करने के उपरान्त पुन स्वर्ग घरी जाऊँगी। (७0)

हे देवताओ! अरगाक्ष नामक महासुर के उत्पा होने पर महाभ्रमर के रूप से पुन उत्पन्न होऊँगी एय उसका यध कर पुन स्वर्ग चली जाऊँगी। (७१)

पुलस्त्य ने कहा-सा कहने के उपरान्त द्विजयरों को प्रणाम कर एवं अन्य प्राणियों को विशारदेवों को पर देनेपाली देवी सिद्धों सहित आश में पली गई। (७२)