वामन महा पुराण
चक्र प्रदान-कथा मे लपमन्यु एव क्षीदाम का वृत्तान्त, शिव द्वारा विष्णु को चक्रदान, हर का विरुपाक्ष होना एव श्रीदामवध
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नारद ने कहा- भगनन् त्रिनेत्र शंकर ने लोकपति विष्णु को लोकपूजित आयुध चक्र क्यों दिया था?
पुलस्त्य ने कहा-आप सावधान होकर चम्प्रदान से ने सम्बद्ध और शिय की महिमा को बढ़ाने वाली इस प्राचीन कथा को सुनिये। (२)
वीतमन्यु नामक एक वेद-वेदांग-पारग, गृहस्थ और महाभाग्यशाली थेट ब्राह्मण थे। (३)
महाभाग्यवती, शीलसम्पन्ना, पतिव्रता एवं पतिप्राणा आनेयी धर्मशीला नामक उनकी पत्नी थी।
ऋतुकाल में उसके साथ समागम करने वाले उन महर्षि को उससे उपमन्यु नामक एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ।
हे मुनिशार्दूल! अत्यन्त दुर्गतिमस्त माता पिसे हुए घायल के रस को दूध कहकर उससे उस ( पुत्र ) का पालन करती थी।
दुग्ध के स्वाद से अनभिज्ञ होने के कारण वह पिसे चावल के रस मे ही दूध की संभावना करता था।
एक दिन पिता के साथ उसने किसी द्विज के गृह में प्राण को पुष्ट करने वाला सुम्वादु खीर का भोजन किया।
उस पिपुत्र ने दूध के अनुपम स्वाद को पाकर दूसरे दिन माता के द्वारा दिए गये पिसे चावल के उस रस को नहीं लिया।
तदनन्तर बाल स्वभाववश दुग्धार्थी बालक तृपित चातक की भाँति रोने लगा। रोती हुई माता ने उससे आँसू से गद्गद वाणी मे कहा।
उमापति पशुपति शूलधारी विरूपाक्ष शंकर के अप्रसन्न रहते क्षीर का भोजन यहाँ से हो साता है ?(११)
हे पुत्र! यदि तुम तत्क्षण पुष्टिकारक दूध पीना चाइते हो तो त्रिशूलधारी विरूपाक्ष महादेव की आराधना करो। (१२)
उन जगत् के आधार सर्पकल्याणदायक शंकर के संतुष्ट
होने पर अमृतपान प्राप्त हो सकता है, दूध पीने की क्या बात है? (१५)
माता के उस यचन को सुनार वीवमन्यु के पुत्र ने कहा- आप जिनकी आराधना घरने को कहती है वे विरूपाक्ष कौन है? (१४)
तद्न तर धर्मशीला ने पुत्र से धमयुक्त वचन कहा- सुनो, मैं तुम्हें बतलाती हूँ कि ये विरपाल कौन है ? (१५)
प्राचीनकाल में श्रीदाम नाम से प्रसिद्ध एक महान असुरपति था। उसने समस्त जगत को आगान्त पर लक्ष्मी को अपनी यशवर्तिनी बना लिया। (१६)
उस दुरात्मा ने तीनों लोकों को श्रीहीन कर दिया। तदनन्तर उस महाग्लशाली असुर ने घासुदय के श्रीवत्स को छीनने की इच्छा की।
उसके उस दूपिन अभिप्राय को जानकर भगवान् जनार्दन उसके वय की कामना से महेश्वर के समीप गए। (१८)
उस समय योगमूर्तिधारी अधिनाशी शम्मु हिमालय के शियर के चिक्ने भूतल पर बैठे थे।
तदनन्तर सहसशीर्प विमु जगन्नाथ के समीप जाकर विष्णु ने अपने द्वारा स्वय अपनी ही आराधना की। (२.)
उस योगिक्षेय अलक्षण परम ब्रह्मा का जप करते हुए वे एक सहस्र वर्ष पर्यन्त से अधिक समय तक पैर के अँगूठे पर सड़े रहे। (२१)
तदनन्तर श्रीमान् महादेव ने प्रसन्न होकर विष्णु को परमश्रेष्ट प्रत्यक्ष तेजयुक्त दिव्य सुदर्शनचक्र प्रदान (२२)
देवाधिदेव विष्णु को सभी प्राणियों को भय देने वाला मालचक्रतुल्य यह चर देर शङ्कर ने उनसे कहा- (२३)
हे देवेश। मुदर्शन नामक द्वादश अरों, छ नाभियों एव दो युगों से युक्त वेगवाम् यह श्रेष्ठ आयुध समस्त आयुधों का नाशक है। (२४)
सजनी के रक्षणार्थ इसक अरों में देवता, मास, राशियाँ, छ स्तुएं, अग्नि, साम, मित्र, यरुण, शचीपति इन्द्र, आग्न, विश्वय, प्रजापति बलयान् हनूमान, धन्य तरि दव, तप एवं तपस्य य द्वादश तथा चैन से लेकर पाल्गुन तक के द्वादश मास प्रतिक्षित है। (२५-२७)
हे विभो । तुम इस श्रेष्ठ आयुध को लेकर नि शङ्क- भाव से देवों के शत्रु का वध करो। मैंने सुरराज से पूजित इस अमोघ आयुध फो तप के बल से अपने नेत्र में धारण किया था। (२८)
शम्भु के ऐसा कहने पर विष्णु ने शङ्कर से यह वचन क्हा-हे शम्भु! मुझे यह कैसे ज्ञात होगा कि यह अमोघ या मोघ अस्त्र है? (२६)
हे विभो । यदि आपका यह चक अमोघ तथा सर्वत्र अप्रतिहतगति है तो इसको जानने के लिये मैं आपके ही ऊपर इसे चलता हूँ। आप इसे ग्रहण कर । (३०)
चासुदेव के उस वचन को सुनकर पिनाक्धारी ने कहा-यदि ऐसा है तो नि शङ्क भाव से मेरे ऊपर चलाओ। (३१)
महेश के उस वचन को सुनकर विष्णु ने सुदर्शन के तेज को जानने की इच्छा से उसे वेगपूर्वक शङ्कर के उपर (३२)
विष्णु के हाथ से छोड़ा गया वह चक भार के समीप गया और उन विश्वेश, यझेश तथा यज्ञयाजा को तीन भागों में काट पर यिमत कर दिया। (३३)
शहर को तीन राण्डों में कटा हुआ देसार महापाहु हरि लजित हो गये। वे ( शङ्कर को ) प्रणाम करने (३४)
चरणों में प्रणत दामोदर को देसार श्रीमान् भव शहर ने प्रीतिपूर्वक बार बार उटो उठो' कहते हुये कहा-- (३५)
हे महाबाहु । चक्र की नेमि द्वारा मेरा यह प्रायन विकार ही काटा गया है। इसके द्वारा मेरा भाप नहीं खण्डित हुआ है। वह तो अच्छेद्य एवं अदाय है। (३६)
हे केशव। चक्र द्वारा किये गये ये तीनों भाग निस्सन्देह पुण्यदायक होंगे। (३७)
एक भाग हिरण्याक्ष नामधारी, द्वितीय सुवर्णाक्ष नामधारी एव तृतीय विरूपाक्ष नाम होगा। वीनों भाग मनुष्यों के लिये पुण्यदायक होंगे। (३८)
हे विभो । उठो और देव शन को मारने के लिये जाओ। हे विष्णु। श्रीदामा के मारे जाने पर देवता प्रसन्न होंगे। (३६)
शङ्कर के ऐसा कहने पर भगवान् गरुचज ने गिरि- शियर पर जाकर श्रीदामा को देखा। (४०)
देवदर्पनाशक उस दैत्य को देखकर देव श्रेष्ठ विष्णु ने पार घार 'तुम मारे गये' यह कहते हुये वेगयुक्त चक्र (४२)