नश्रवपुरुपव्रत के वर्णन में नक्षत्रपुरष के स्वरुप, पूजाविधि एव व्रत के माहात्म्य का वर्णन

५४

नारद ने कहा-हे द्विजऽष्ठ ! पुरुरवा ने जिस प्रकार लक्ष्मीपति वामदेय की नअपुरुष नामक व्रत के द्वारा भाराधना की थी उसरा पर्णन करें।

पुलस्त्य ने कहा-हे नारद' में नक्षमपुरुप नत एवं देय के सभी नक्षयरूपी अगों का वर्णन परता हूँ। आप सुनें। (२)

भूटनसत्र भगवान विष्णु के दोनों चरण, रोहिणी दोनों जहा पर्य अरिपनी दोनों लानुओं का रूपधारण फर स्थित है। (३)

पूरांपाद व सरासर नामक दो नाव यामुदेव फे दोनों ऊरु मे, पूर्वाफाल्गुनी एवं उत्तराफाल्गुनी सशक दोनों मश्य गुण प्रदेश में रय वृत्तिमा नभय पटि में । स्थित है। (४)

पूर्वभाद्रपद तथा उत्तरभाद्रपर भगया फे दोनों । पार्ष में, रेयनी दोनों मुशियों में, अनुरापा हदय में सया पनिटा नस्त्र प्रदेश में रिपत।

दोनों गुजाओं के स्थान में पिता है। इन गात्र को भगवान का दोनों पाप कहा गया है। पुनर्पण भगवान श्री गुटियों पोर पारनेश पना नरा। (६)

मीया में ज्येष्टा, दोनों पानों में अवग तथा मुस में पुष्य नक्षत्र स्थित है।माति नक्षत्र दाँत को कहागया है।(७)

शतभिषा नक्षत्र दोनों हनु तथा मघा को नाक कहा गया है। रूपधारी भगवान के दोनों नेत्रों में मृगशिरा या निरास है। (८)

चित्रा ललाट में, भरणी शिर में तथा आद्रा नक्षत्र फेश में रहता है। भगवान विष्णु का यह नशन- शरीर है।

 हे नारद मार! अश में उस कथन करूँगा । जिनके द्वारा विधिपूर्वक पूजित भगवान विष्णु अभिरषित फलों को प्रदान करते हैं। (१०)

पैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में चद्रमा फे मूल नक्षत्र में होने पर भगवान के दोनों चरणों की विधिपन् पूजा करनी पाहिये और सत्र के वर्तमान ने पर भेष्ट वामग को भोजन देना चाहिए।

असिनी नपत्र के योग में मलिक भगवान के दोनों पुटनों की पूजा परनी चाहिए ये विम्यान दोसच्या पूर्वपम् मामलों को भोजन कराना पादिए । (१२)

पूर्वापाड तथा उत्तरापाढा के योग में अरद्वय की विद्वान् पूजा करें तथा दोहद मै शीतल जल का (१३)

विचारवान पुरुप दोनों फाल्गुनी नक्षत्रों में भगवान् के गुह्य प्रदेश की पूजा करके ब्राह्मणों को भोजन कराये एवं पय एव घृत का दोहद दे। (१४)

कृत्तिका नक्षत्र मे उपयास पूर्वक जितेन्द्रिय रहकर भगवान् के कटि देश की पूजा करे एच सुगन्धित कुसुम युक्त जल का दोहद दान करे। (१५)

दोनों भाद्रपदा-युगल में कथित विधान से भगवान् के दोनों पार्थ की पूजा करके दोहद में देव द्वारा प्रशसित लेहयुक्त गुड देना चाहिए।

रेवती नक्षत्र के योग मे भगवान् पी दोनों पुक्षियों की पूजा के अनतर योहद म मूंग के लड्ड प्रदान करना चाहिए। अनुराधा नक्षत्र में जठर की पूजा परके दोहद मे साठी का धावल देना चाहिए। (१७)

घनिष्ठा नक्षत्र में पृष्ठ की पूजा करके दोहद मे शालि का भात देना चाहिए। विशाखा नक्षत्र मै भगवान् की दोनों भुजाओं की पूजा कर दोहद में उत्तम अन्न देना चाहिये। (२८)

हस्त में भगवान के दोनों हाथों की पूजा पर दोहद में जी से पना पक्वान देना चाहिए । पुनर्वसु नक्षत्र

में अंगुलियों की पूजा कर दोहद में पटोल प्रदान करना चाहिए। (१६)

आश्लेषा नक्षत्र में नख की पूजा कर दोहद मे तित्तिर का मास प्रदान करे। ज्येष्ठा मे प्रोवा की पूजा कर दोइद मे तिल का रड्डू प्रदान करे। (२०)

श्रवण नक्षत्र में दोनों कणों की पूजा कर दोहद मे दही और भात प्रदान करे। पुष्यनक्षत्र में मुख की पूजा करे और दोहद मे धृत-युक्त पायस प्रदान करे । (२१)

स्वाति नक्षत्र के योग मे भगवान् के दातों का पूजन पर तिल और शप्कुली (पूड़ी) का दोहद दे एष केशव को प्रसन्न करने के लिये ब्राह्मण को भोजन कराये । (२२)

शतभिषा नक्षत्र में प्रयत्नपूर्वक भगवान के छुट्टी की पूजा करे एय विष्णु को अतिप्रिय प्रियङ्गु एव रत्तशालि अन्न या दोहद दे। (२३)

मघा म नासिका पी पूजा करनी चाहिए एय दोइद मे मधु देनी चाहिए। मृगशिरा नक्षन में मस्तक में स्थित नेनद्वय की पूजा करके दोहद मे मा या मास देना चाहिए। (२४)

चिना नक्षत्र के योग में स्लाट की पूजा करके दोहर मे सुन्दर भोजन देना पाहिए । भरणी नक्षत्र में गिर की पूजा करनी चाहिए और दोहद में सुन्दर भात प्रदान करे। (२५)

आर्द्रा के योग मे विद्वानों को (भगवान के) केशो की पूजा करनी चाहिए एव भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराना तथा दोहद में गुड़ एवं अदरस का दान करना चाहिए। (२६)

इन नक्षत्रयोगों में जगरपनि (विष्णु) का पूजन परने फे पश्चात् पार पर स्त्री और पुरप को दो सुन्दर वस्न प्रदान करें। (२७)

बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मण को पत्र, एक जोड़ी श्वेत जूता, सप्तधान्य, स्वर्ण एवं घृतपान का दान करे। (२८)

प्रत्येक नक्षत्र के योग में माह्मणों की पूजा करनी चाहिए। यही नक्षतमय शाश्वत पुस्प है। (२९)

नक्षत्र पुरष नामक व्रत सभी प्रतों में श्रेष्ठ है। प्राचीन समय में भृगु ने इस सर्व पापनाशक मत यो (३०)

है देवर्षि । भगवान् के अंगों और उपागों की पूजा करने से (मनुष्य पे) सभी अंग प्रत्यंग मुन्दर होते है। (३१)

सात जन्मों में (मनुष्य के स्वय) पृत पाप फो, पुल. संगवश प्राप्त पाप को एवं माता पिता के कारण प्राप्त पापो को फेशप पूर्णतया नष्ट कर देते हैं। (३२)

यह पूजन करने से रामस्त प्रकार के कल्याण प्राप्त होते है शरीर उत्तम आरोग्य से सम्पन्न होता है, मन मे अनन्त प्रीति की प्राप्ति होती है और रूप भी अत्यन्त शोभन हो जाता है। (३३)

पूजित होने पर नानपुरुप जनार्दन मधुर वाणी, पाति एवं अन्य अभिवाचित पदार्थ प्रदान करते (३४)

हे नारद ! इन नक्षत्रों के योग मे फ्रमश उपास कर महाभागा अरुन्धती ने उत्तम ख्याति प्राप्त की थी।(३५)

आदित्य ने पुत्र की कामना से नक्षत्र पुस्प जनार्दन की पूजा कर रेयन्त नामक पुत्र प्राप्त किया था। (३६)

(नक्षनाग जनार्दन की पूजा करके) रम्भा ने श्रेष्ठ रूप, मेनका ने यागी पी मधुरता, चन्द्र ने उत्तम कान्ति तथा पुरुरवा ने राज्य प्राप्त दिया था। (३७)

हे ब्रह्मन् । इस प्रकार जिसने नक्षवान रूपधारी जनार्दन की पूजा की उसने अपनी कामनाओं की । सुन्दर पूति प्रात की। (३८)

मैंने तुम से भगयान नक्षमपुरुष के परम पवित्र घग्य, यशर और सुन्दररूप को देने याज्ञे प्रत के विधान या पर्णन पिया । अय पयिन सीर्थयात्रा या वर्णन सुनो। (३६)